ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर काफी हो-हल्ला हो रहा है। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तो इस विषय पर प्रधानमंत्री को एक पत्र भी लिखा है। अपने पत्र में उन्होंने इसे एक किस्म की जबरन वसूली करार दिया है। परंतु इतिहास और अर्थशास्त्र को लेकर उनकी समझ बल्कि कहें तो आर्थिक इतिहास को लेकर उनकी समझ के बारे में हम कह सकते हैं कि वह कुछ खास नहीं है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के उलट कम से कम हम आराम से उनकी बात की अनदेखी कर सकते हैं।
परंतु हमें चार आसान तथ्यों की एकदम अनदेखी नहीं करनी चाहिए। निश्चित तौर पर ऐसा इसलिए कि अर्थशास्त्री जानते हैं कि इस मसले पर ये तथ्य विपक्ष के साथ नहीं हैं। उन्हें पता है कि इस विषय पर सरकार का रुख एकदम सही है।
जिन चार तथ्यों को स्मरण करना आवश्यक है वे इस प्रकार हैं:
पहला, यह एक प्रवृत्ति रही है जिसके तहत हर 10 वर्ष में भारत में पेट्रोल की कीमतें दोगुनी हो ही जाती हैं। आप चाहें तो स्वयं इसकी पड़ताल कर सकते हैं।
दूसरा, बीते 50 वर्ष से अधिक समय में कराधान की दर (पेट्रोल के मामले में उत्पाद शुल्क) 48 फीसदी की नीची और 58 फीसदी की ऊंची दर के बीच ही रही है। इस दर में केंद्र की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रूप से 40 प्रतिशत के करीब स्थिर बनी रही है।
तीसरा, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुताबिक दुनिया के अधिकांश देशों ने हमेशा से पेट्रोलियम करों का इस्तेमाल अपना राजस्व बढ़ाने में किया है। इसका कारण यह है कि इसकी मांग हमेशा बनी रहती है और इसके बिना काम चलना मुश्किल है।
निश्चित तौर पर यह व्यवहार सार्वजनिक वित्त के निर्धारक तत्त्वों में से एक है। दुनिया में कुछ ही ऐसे देश हैं जहां पेट्रोलियम उत्पादों पर भारी भरकम कर नहीं लगाया जाता है। अमेरिका में यह शुल्क अत्यंत कम है और वह कोई उदाहरण नहीं पेश करता। जहां तक चीन की बात है तो चीन जो कुछ करता है वह केवल वही जानता है।
चौथी बात, सन 1947 के बाद यह चौथा अवसर है जब पेट्रोल की कीमतें इतनी तेजी से बढ़ी हैं। हर बार प्रतिक्रिया ऐसी ही रही है और जमकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। पहला मौका सन 1973 में आया था जब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक ने प्रति बैरल तेल कीमतें चार गुना कर दी थीं। दूसरा मौका इसके छह वर्ष बाद यानी ईरान की क्रांति के बाद सामने आया। तीसरा अवसर था सन 1990 जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर आक्रमण किया। चौथी बार ऐसा मौका तब आया जब सन 2003 में अमेरिका ने इराक पर चढ़ाई की।
हर बार जब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफा हुआ तब-तब इसका मुखर विरोध भी देखने को मिला। कीमतें बढऩे के बाद कुछ महीनों तक खपत में कमी देखने को मिली लेकिन इसके बाद उसमें वापस इजाफा हो गया और खपत तब तक बढ़ती रही जब फिर से इसकी कीमतों में इजाफा नहीं हो गया।
रहस्य की बात यही है कि आखिर हम आयात पर कर लगाने के लिए विनिमय दर का इस्तेमाल क्यों नहीं करते। शायद ऐसा कदम राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय साबित होगा।
यह कहने में कोई संशय नहीं कि एक ऐसी वस्तु पर कर नहीं लगाना नितांत बेवकूफाना होगा जिसकी मांग मूल्य निरपेक्ष है। यानी कीमतें चाहे जितनी हों, उसकी मांग और उसकी खपत में कभी कमी नहीं होती। यही वजह थी कि जब तक गांधीजी ने विरोध नहीं किया तब तक नमक पर कर लगाया जाता रहा। नमक कर तभी समाप्त हुआ जब देश आजाद हो गया।
मूल बात से परे मुझे यह कह लेने दीजिए कि मैं आज भी इस पक्ष में हूं कि इस पर पुन: कर लगाया जाना चाहिए। बेहतर सार्वजनिक वित्त व्यवहार के लिए ऐसा करना आवश्यक है। इस पर कम से कम 5 फीसदी जीएसटी लगाया जाना चाहिए। या फिर कोई भी दर लगाई जाए लेकिन राज्यों को इस पर कर लगाने का तरीका तलाश करना चाहिए। कोई और नहीं तो कम से कम चिकित्सक जरूर इसकी हिमायत करेंगे। हालांकि मैं यह भी जानता हूं कि यह केवल एक स्वप्र के समान है इसलिए इसे यह सोचते हुए यहीं छोड़ देते हैं कि कराधान के सुदृढ़ सिद्धांतों के उल्लंघन का यह भी एक उदाहरण है।
यह बात मुझे इस आलेख के केंद्रीय बिंदु की ओर ले आती है: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुधारों की अपनी अगली बड़ी शृंखला में कराधान के मजबूत सिद्धांतों को बहाल करने की दिशा में काम करना चाहिए क्योंकि हमारे देश में कर व्यवहार काफी बड़े पैमाने पर अनुत्पादक है।
सन 1956 के बाद से कमेटी दर कमेटी ऐसे बेशुमार तरीके सुझाए गए जिनके कारण देश में कराधान व्यवहार ऐसा होता गया जिससे हमें बेहद खराब आर्थिक नतीजे हासिल हुए। इतना ही नहीं इससे राजस्व लक्ष्य हासिल करने में भी कठिनाई हुई। ऐसे में मोदी के लिए बात यह है कि कर लगाने का अधिकार भले ही संप्रभु अधिकार हो लेकिन नासमझी से कर लगाना राजनेताओं का विशेषाधिकार है जिसे समाप्त किया जाना चाहिए।