बीते 25 वर्षों से हमारा कर-जीडीपी अनुपात 16-17 फीसदी के बीच अटका रहा है। इसके चलते कम निवेश वाले क्षेत्रों मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य की मदद कर पाने की हमारी राजकोषीय क्षमता काफी प्रभावित हुई है। भारत जैसे बड़े देश में सरकार इतनी कम राजकोषीय क्षमता के साथ विकास संबंधी कार्य नहीं कर सकती। हमारे स्तर की प्रति व्यक्तिआय के साथ कर-जीडीपी अनुपात करीब 20 फीसदी होना चाहिए। उभरते बाजारों के मानक तो यही कहते हैं। मुझे उम्मीद है कि ऐसा हो सकता है।
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) सुधारों की बदौलत कर-जीडीपी अनुपात में कम से कम दो फीसदी अंक का सुधार संभव नजर आता है, बशर्ते कि हम इसके सूचना प्रौद्योगिकी मंच में चरणबद्ध सुधार करना जारी रखें और शुल्क बढ़ाने के मुद्दे का समाधान करें। इसमें दो राय नहीं कि जीएसटी राजस्व में हालिया इजाफा इनवॉइस के मिलान के कारण बेहतर हुए अनुपालन और परिसर के भौतिक सत्यापन तथा आयकर भुगतान के अतीत के रिकॉर्ड के आकलन के बाद पंजीयन की इजाजत की बेहतर निगरानी की वजह से हुआ है। इससे फर्जी इनपुट इनवॉइस के मामले कम हुए हैं। इसका एक संकेतक होगा शुल्क चुकाने वाली इकाइयों का नकदी-ऋण अनुपात। एक मोटा-मोटा अनुमान बताता है कि हर महीने जीएसटी शुल्क चुकाए जाने लायक राशि करीब 5 लाख करोड़ रुपये होती है। इसमें से 4 लाख करोड़ रुपये की राशि उधार के जरिये और एक लाख करोड़ रुपये की राशि नकद चुकाई जाती है। यानी नकदी-ऋण अनुपात 20:80 रहता है। अब यह मानने की वजह है कि अनुपालन में सुधार ने नकद हिस्सेदारी को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया है और इससे 25,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्तमासिक राजस्व हासिल हो रहा है। यही कारण है कि जीएसटी राजस्व का हमारा नया सामान्य आंकड़ा 1.25 लाख करोड़ रुपये है जबकि पहले यह एक लाख करोड़ रुपये था। इस सुधार का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए। एनालिटिक्स महा निदेशालय, वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क के साथ मिलकर यह काम कर सकता है क्योंकि उसके पास तमाम आंकड़े हैं।
राजस्व में दूसरा लाभ व्यक्तिगत आय कर संग्रह से आया है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड तथा केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के बीच बेहतर तालमेल ने संग्रह बढ़ाने में मदद की है। आयकर रिटर्न में जीएसटी टर्नओवर की घोषणा बहुत उपयोगी साबित हुई है। इससे राजस्व समन्वय संभव हुआ है। इसके कारण छोटी इकाइयां दायरे में आईं और पारिवारिक इकाइयों का कर भुगतान बढ़ा। इन इकाइयों द्वारा चुकाया जाने वाला कर व्यक्तिगत आय कर राजस्व में नजर आता है और इस श्रेणी का राजस्व सुधर रहा है। यहां तक कि कोविड के कठिन दौर में भी यह बरकरार रहा। बेहतर अनुपालन ने जहां जीएसटी राजस्व सुधारने में मदद की, वहीं अभी भी कई कदम उठाए जाने की जरूरत है।
सबसे पहले बड़ी तादाद में दी जाने वाली रियायतों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की जरूरत है। जब जीएसटी लागू किया गया था तब राज्य मूल्यवर्धित कर में 90 से अधिक रियायतें थीं जबकि केंद्रीय उत्पाद की रियायतों की तादाद 390 से अधिक थी। हमें जीएसटी रियायतों को उन वस्तुओं तक सीमित करने की आवश्यकता है जिन्हें जीएसटी से पहले की अवधि में वैट रियायत हासिल थी। केंद्र और राज्यों की विभिन्न समितियां इसी सहमति पर पहुंचीं।
जरूरत यह भी है कि तंबाकू और सोने पर लगने वाली जीएसटी दर पर पुनर्विचार किया जाए। पारंपरिक रूप से तंबाकू क्षेत्र में कराधान सिगरेट तक सीमित है। कुल मिलाकर 80 करोड़ किलो तंबाकू के उत्पादन में से 25 करोड़ किलोग्राम ही सिगरेट उत्पादन में लगता है। तंबाकू पर जीएसटी दर बढ़ाने की आवश्यकता है। यह रिवर्स चार्ज के आधार पर फिलहाल 5 फीसदी की दर से लगता है। रिवर्स चार्ज का अर्थ यह है कि कर चुकाने का दायित्व वस्तु या सेवा के प्राप्तकर्ता पर होगा। इससे यह संकेत भी निकलेगा कि जीएसटी कराधान का इस्तेमाल तंबाकू का इस्तेमाल नियंत्रित करने में किया जा रहा है। सोने की बात करें तो तीन फीसदी की जीएसटी दर को संशोधित करने की आवश्यकता है क्योंकि 80 फीसदी से अधिक सोना तथा स्वर्णाभूषण आबादी के शीर्ष 10 फीसदी हिस्से द्वारा खरीदे जाते हैं।
जरूरत इस बात की भी है कि कपड़ा एवं फुटवियर जैसे क्षेत्रों में लगने वाले व्युतक्रम कर ढांचे (जहां कच्चे माल लगने वाला कर तैयार माल पर लगने वाले कर से अधिक होता है) से भी निपटा जाए। अचल संपत्ति क्षेत्र को भी जीएसटी के दायरे में लाए जाने की आवश्यकता है। इससे भूमि बाजार में सुधार होगा और प्रत्यक्ष कर संबंधी राजस्व में इजाफा होगा।
जीएसटी से हासिल होने वाले राजस्व को लेकर तमाम आशावाद के बीच कुछ प्रमाण इस बात के भी हैं कि औपचारिक क्षेत्र छोटे और मझोले क्षेत्र से अपनी बाजार हिस्सेदारी में इजाफा कर रहा है। यह बात एफएमसीजी और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों के लिए खासतौर पर सही है। कोविड के हालात ने इस पर नए सिरे से जोर दिया है। छोटे और मझोले उद्योग अर्थव्यवस्था का अहम घटक हैं और ये लाखों लोगों को रोजगार देते हैं। इस तबके के आर्थिक हितों का बचाव करना जरूरी है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि बड़ी इकाइयां छोटी इकाइयों से खरीद करें, छोटे कारोबारियों से बड़े कारोबारियों को की जाने वाली आपूर्ति पर रिवर्स चार्ज शैली में कर लगे ताकि बड़ी इकाइयों को छोटी इकाइयों से खरीद करने पर इनपुट शुल्क क्रेडिट का लाभ मिले। जीएसटी क्रियान्वयन के शुरुआती दिनों में यह प्रावधान उपलब्ध था लेकिन बाद में इसे कुछ क्षेत्रों तक सीमित कर दिया गया। इस प्रावधान को दोबारा लागू करने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष यही निकलता है कि जीएसटी राजस्व में हाल में आई तेजी के लिए बेहतर अनुपालन वजह है लेकिन दरों में बदलाव के माध्यम से इसे स्थायी बनाया जा सकता है और 24 फीसदी की राजस्व पूर्ति दर तक ले जाया जा सकता है। ऐसे में यह संभावना भी बनती है कि भारत मध्यम अवधि में जीडीपी के 16-17 फीसदी के चक्रव्यूह को तोड़ सके। इस बीच जीएसटी राजस्व में आने वाली तेजी, अल्पावधि में स्वास्थ्य क्षेत्र में होने वाले उच्च व्यय को झेल सकती है जो अपने आप में बहुत बेहतर बात है।
(लेखक केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के सेवानिवृत्त सदस्य हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)