वित्तीय क्षेत्र में सबसे जरूरी सुधारों की बात की जाए तो ‘बॉन्ड बाजार का एकीकरण’ उनमें एक होगा। इससे सरकारी प्रतिभूतियों (जी-सेक) और कॉरपोरेट बॉन्ड के लिए नियामक व्यवस्था का एकीकरण हो जाएगा। इससे निवेशकों, कारोबारियों एवं अन्य हितधारकों को काफी सहूलियत होगी, साथ ही जी-सेक में खुदरा भागीदारी बढ़ेगी और कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार का तेजी से विकास होगा।
जी-सेक में खुदरा भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने नवंबर 2021 में स्वयं अपनी डिपॉजिटरी प्रणाली और एनडीएस-ओएम ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से जी-सेक में प्रत्यक्ष खुदरा भागीदारी के लिए एक योजना शुरू की। मगर इस कदम के नतीजे उत्साहजनक नहीं रहे हैं। खुदरा भागीदारी को बढ़ावा देने की आरबीआई की योजना सही विकल्प नहीं है। इससे केवल विभिन्न प्रकार की प्रतिभूतियों में निवेशक बेवजह बंट जाते हैं।
जी-सेक अन्य प्रतिभूतियों की तरह ही हैं। व्यापार में सुगमता लाने और निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से जी-सेक को स्टॉक एक्सचेंज प्रणाली के माध्यम से जारी करना चाहिए और इनका कारोबार किया जाना चाहिए। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा विनियमित ऑनलाइन बॉन्ड ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म (जो 2022 में शुरू किए गए थे) कॉरपोरेट बॉन्ड का कारोबार बढ़ाने में काफी सफल रहे हैं।
कारोबार एवं निपटान सेबी द्वारा विनियमित बाजार अवसंरचना संस्थानों के माध्यम से होते हैं। ये प्लेटफॉर्म जी-सेक में ट्रेडिंग की सुविधा भी प्रदान करते हैं मगर इनसे ज्यादा मदद नहीं मिली है क्योंकि अधिकांश जी-सेक कारोबार एनडीएस-ओएम प्लेटफॉर्म पर और निपटान क्लियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के माध्यम से होता है। ये दोनों ही आरबीआई के नियामक निरीक्षण के अंतर्गत आने वाले संस्थान हैं। सवाल यह उठता है कि कॉरपोरेट बॉन्ड और जी-सेक के लिए दो अलग-अलग कारोबार प्रणालियां क्यों हैं?
सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों और वैधानिक निकायों के शेयर और बॉन्ड निवेशकों के एक ही डीमैट खाते में प्रतिभूति बाजार डिपॉजिटरी के माध्यम से रखे जा सकते हैं जबकि जी-सेक के लिए आरबीआई के सार्वजनिक ऋण कार्यालय (पीडीओ) में एक अलग खाता आवश्यक होता है जो केवल जी-सेक रखता है।
पीडीओ के उलट प्रतिभूति बाजार डिपॉजिटरी का भौगोलिक विस्तार काफी व्यापक है और यह देश के 99 फीसदी पिन कोड को अपनी जद में ले लेता है। जी-सेक और अन्य प्रतिभूतियों के लिए एक ही परिचालन डीमैट खाता होने से सभी प्रतिभूतियों में निवेश करना आसान हो जाएगा जिससे ऋण प्रतिभूतियों के लिए निवेशकों का आधार बढ़ेगा। सरकार को जी-सेक को डीमैट प्रारूप में जारी करना चाहिए ताकि डीमैट धारक (वर्तमान में 21 करोड़ से अधिक और लगातार बढ़ रहे हैं) आसानी से और सुचारू रूप से जी-सेक में निवेश कर सकें। वास्तव में, खुदरा निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए जी-सेक आधारित एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) विकसित किए जा सकते हैं।
भारत के ऋण बाजार में जी-सेक की व्यापक मौजूदगी है। दिसंबर 2025 तक लगभग 115 लाख करोड़ रुपये के बकाया जी-सेक थे जबकि 58 लाख करोड़ रुपये मूल्य के कॉरपोरेट बॉन्ड थे। कॉरपोरेट बॉन्ड का मूल्य निर्धारण जी-सेक में यील्ड कर्व के लगातार बने रहने पर निर्भर करता है। वर्तमान में जी-सेक और कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार अलग-अलग नियामक व्यवस्थाओं का पालन करते हैं।
इन बाजारों को एकीकृत करने से जी-सेक से कॉरपोरेट बॉन्ड तक मूल्य निर्धारण संबंधी जानकारी का निर्बाध प्रसारण संभव हो सकेगा। कॉरपोरेट बॉन्ड और जी-सेक के कारोबार, समाशोधन और निपटान के लिए समान नियामक व्यवस्था और जी-सेक एवं कॉरपोरेट बॉन्ड का सुचारू हस्तांतरण सुनिश्चित करने वाली स्वामित्व (होल्डिंग) संरचना से ‘पैमाने और दायरे की अर्थव्यवस्था’ प्राप्त होगी जिससे बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्धा, दक्षता और तरलता बढ़ेगी।
कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में तरलता बढ़ाने के लिए सक्रिय रेपो बाजार एक महत्त्वपूर्ण शर्त है। इसका मुख्य कारण यह है कि सक्रिय कारोबारी, विशेष रूप से बाजार निर्माता बेहतर दो-तरफा क्वोट (बिड-ऑफर स्प्रेड) देेने में सक्षम होते हैं बशर्ते वे एक सक्रिय रेपो बाजार के माध्यम से अपने बॉन्ड के लिए धन का इंतजाम कर पाएं।
बाजार निर्माताओं की मदद करने के अलाव एक सक्रिय रेपो बाजार के कई अन्य फायदे भी हैं। इससे अंतर्निहित ऋण प्रतिभूतियों की तरलता में सुधार होता है और ऋण धारकों के पास अंतर्निहित प्रतिभूतियों को बेचे बिना ऋण प्रतिभूतियों के मुद्रीकरण की क्षमता होती है। इसका एक और फायदा यह है कि अल्प से मध्यम अवधि में जारीकर्ताओं को भी लाभ होता है क्योंकि बेहतर तरलता के कारण बॉन्ड की कीमतों में सुधार हो सकता है।
कॉरपोरेट बॉन्ड के निर्गम और कारोबार के नियम बनाने के अधिकार सेबी के पास हैं मगर कॉरपोरेट बॉन्ड में रेपो के लिए ऐसे अधिकार आरबीआई के पास हैं। सही दृष्टिकोण यह होगा कि कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार के सभी पहलुओं को विनियमित करने के लिए एक एकल नियामक हो। इसके लिए आरबीआई अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता होगी।
दशकों से विभिन्न सरकारें भारत में बॉन्ड बाजार को गहरा करने की आवश्यकता के बारे में बात करती रही हैं। दिसंबर 2025 में संसद में पेश प्रतिभूति बाजार संहिता (एसएमसी) विधेयक अन्य बातों के अलावा बॉन्ड बाजार की नियामक संरचना में तालमेल बैठाने का एक अवसर था। मगर अफसोस की बात है कि एसएमसी ने स्वयं को प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) अधिनियम (एससीआरए), सेबी अधिनियम और डिपॉजिटरी अधिनियम के समेकन तक ही सीमित रखा।
सरकार को सरकारी प्रतिभूति अधिनियम, 2006, आरबीआई अधिनियम, 1934 और भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 सहित सभी संबंधित कानूनों में बॉन्ड बाजार से संबंधित प्रावधानों का व्यापक रूप से अध्ययन करना चाहिए था ताकि समग्र दृष्टिकोण अपनाकर उचित संशोधन सुझाए जा सकें। सरकार को बॉन्ड बाजार को एकीकृत करने और कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार के विनियमन के सभी पहलुओं को एक ही नियामक के अधीन लाने के लिए एसएमसी विधेयक में आवश्यक संशोधन करने के लिए कदम उठाने चाहिए।
(त्यागी सेबी के चेयरमैन रह चुके हैं और प्रसाद एसपीआरवी कंसल्टेंट्स में पार्टनर हैं)