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सर्वोच्च न्यायालय का फैसला: दूरसंचार कंपनियों पर लाइसेंस शुल्क का बढ़ेगा बोझ

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यह निर्णय दूरसंचार क्षेत्र के लिए चुनौती पेश कर सकता है क्योंकि वह पहले ही वित्तीय तंगी से जूझ रहा है।

Last Updated- October 19, 2023 | 11:35 PM IST
Supreme Court on Telecom Industries

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने हाल ही में निर्णय दिया है कि दूरसंचार कंपनियों द्वारा जुलाई 1999 के बाद चुकाए गए लाइसेंस शुल्क को पूंजीगत व्यय माना जाए, न कि राजस्व व्यय। यह निर्णय दूरसंचार क्षेत्र के लिए चुनौती पेश कर सकता है क्योंकि वह पहले ही वित्तीय तंगी से जूझ रहा है।

Supreme Court ने अपने इस निर्णय के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय, बंबई उच्च न्यायालय और कर्नाटक उच्च न्यायालय के उन फैसलों को उलट दिया है जो दूरसंचार कंपनियों के पक्ष में गए थे। बीते वर्षों के दौरान लाइसेंस शुल्क कैसे चुकाया जाए और उसे किस मद में शामिल किया जाए, इसे लेकर कई तरह के बदलाव सामने आए हैं।

इसकी वजह से नीतिगत अनिश्चितता आई है और कारोबार में अनिश्चितता पैदा हुई है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय से क्षेत्र के लिए मामला और जटिल हो सकता है। यह क्षेत्र पहले से ही दो कंपनियों के दबदबे के खतरे से जूझ रहा है। पहले की अवधि के लिए आय कर की मांग की संभावना के कारण सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने पुरानी तारीख से कर भुगतान की आशंका उत्पन्न कर दी है क्योंकि लाइसेंस शुल्क को पूंजीगत व्यय माना जाएगा, न कि राजस्व व्यय।

विश्लेषकों ने संकेत दिया है कि अतीत के बकाये का आकलन करना मुश्किल होगा। उन्होंने संकेत किया कि अगर कर अधिकारी अतीत की किसी कंपनी के लिए मांग करते हैं तो भारती एयरटेल और वोडाफोन इंडिया जैसी पुरानी कंपनियों को एकबारगी काफी धनराशि चुकानी पड़ सकती है। लाइसेंस शुल्क की परिभाषा में बदलाव दिक्कतदेह हो सकता है क्योंकि फिलहाल दूरसंचार कंपनियां लाइसेंस शुल्क को राजस्व व्यय के खाते में डालकर मुनाफे का आकलन करती हैं।

अगर लाइसेंस शुल्क को पूंजीगत व्यय माना जाने लगा तो इसे लाइसेंस की अवधि यानी 20 वर्षों में चुकाना होगा और मुनाफे का आकलन भी उसी के मुताबिक किया जाएगा। इस स्थिति में लाइसेंस के शुरुआती वर्षों में कर का स्तर अधिक होगा। बीते वर्षों के दौरान नीतिगत बदलाव तथा न्यायालयीन निर्णयों से इस विषय की जटिलता को समझा जा सकता है।

सन 1999 की नई दूरसंसचार नीति में कहा गया कि दूरसंचार कंपनियों को एकमुश्त प्रवेश शुल्क देना होगा और उसके बाद अपने राजस्व के प्रतिशत के रूप में वे लाइसेंस शुल्क चुकाएंगी। सात वर्ष बाद 2006 में एक आकलन आदेश पारित करके कहा गया कि राजस्व व्यय को लाइसेंस अवधि के दौरान चरणबद्ध तरीके से चुकता किया जाएगा।

अगले वर्ष यानी 2007 में लाइसेंस शुल्क को राजस्व व्यय के रूप में श्रेणीबद्ध कर दिया गया। ऐसा नई दिल्ली के आयकर आयुक्त के निर्णय के मुताबि​क किया गया। छह वर्ष बाद यानी 2013 में दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद यह मुद्दा फिर उठा। न्यायालय के निर्णय में सन 1999 के पहले और 1999 के बाद के लाइसेंस शुल्क में भेद किया गया।

कहा गया कि 31 जुलाई, 1999 तक चुकाए जाने वाले लाइसेंस शुल्क को पूंजीगत व्यय माना जाए और 1 अगस्त, 1999 के बाद राजस्व साझेदारी के आधार पर चुकाए जाने वाले लाइसेंस शुल्क को राजस्व व्यय माना जाए। दिल्ली उच्च न्यायालय ने दलील दी कि लाइसेंस शुल्क व्यय को पूंजीगत व्यय नहीं माना जा सकता है क्योंकि इसे समायोजित सकल राजस्व के मुताबिक राजस्व के रूप में चुकाया जाता है।

ठीक एक दशक बाद सर्वोच्च न्यायालय ने आयकर विभाग की दलील स्वीकार कर ली। उसने कहा कि हालांकि लाइसेंस शुल्क किस्तों में चुकाया जाता है, लेकिन इसे राजस्व व्यय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का मुख्य बिंदु यह था कि एकबारगी भुगतान को केवल भुगतान के तरीके के आधार पर कृत्रिम ढंग से पूंजीगत भुगतान और राजस्व भुगतान में नहीं बांटा जा सकता है।

पूंजीगत व्यय को आमतौर पर किसी कंपनी द्वारा इमारत, वाहन, उपकरण और जमीन आदि पर किए गए व्यय के रूप में परिभाषित किया जाता है। दूरसंचार कंपनियों के लाइसेंस शुल्क को पूंजीगत व्यय मानने को लेकर नए वाद उत्पन्न हो सकते हैं। यह क्षेत्र जहां स्थिरता की तलाश कर रहा है, वहीं इस निर्णय ने अनिश्चितता बढ़ा दी है।

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First Published - October 19, 2023 | 11:25 PM IST

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