देश में निजी क्षेत्र के सबसे बड़े ऋणदाता और भारतीय शेयर बाजारों में सूचीबद्ध दूसरी सबसे बड़ी इकाई एचडीएफसी बैंक को इस वर्ष दूसरी बार संचालन संबंधी चिंताओं का सामना करना पड़ रहा है। ताजा मामले की बात करें तो द इंडियन एक्सप्रेस की पिछले हफ्ते की रिपोर्ट के अनुसार एक आंतरिक जांच में पाया गया कि बैंक ने 2023-24 और 2024-25 के दौरान महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (एमएसआरडीसी) को विपणन खर्चों से लगभग 45 करोड़ रुपये का भुगतान किया जिसे ‘ब्याज अंतर’ के रूप में दिखाया गया।
ऐसा लगता है कि बैंक ने एमएसआरडीसी को थोक जमा प्राप्त करने के लिए उच्च ब्याज दर का वादा किया था, लेकिन राशि को ब्याज के रूप में जमा करने के बजाय विपणन खर्चों के माध्यम से भेजा गया। यह भी रिपोर्ट किया गया कि बैंक का शीर्ष प्रबंधन इस घटनाक्रम से अवगत था। जमा जुटाने में अक्सर तीव्र प्रतिस्पर्धा होती है, विशेषकर चालू खाते और बचत खाते (कासा) के लिए।
नियम यह अनुमति नहीं देते कि जमा करने वालों के साथ ब्याज दरों पर मोलतोल की जाए। भारतीय रिजर्व बैंक के जमा पर ब्याज दरों संबंधी मास्टर निर्देश में कहा गया है कि वाणिज्यिक बैंकों को थोक जमा के लिए ब्याज दर कार्ड बनाए रखने होंगे जिन पर जमाकर्ता और बैंक के बीच मोलतोल नहीं की जा सकती। स्वाभाविक रूप से पिछले सप्ताह की समाचार रिपोर्ट पर शेयर बाजार ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी।
यद्यपि बैंक ने एक बयान जारी किया लेकिन उसने हितधारकों की चिंताओं का पर्याप्त समाधान नहीं किया। बैंक ने तर्क दिया कि सभी मुद्दों का निपटारा स्थापित मानदंडों के अनुसार किया गया है और उसने किसी भी गलत काम की धारणा को खारिज कर दिया।
हालात का तकाजा था कि स्पष्ट रूप से बताया जाए कि रिपोर्ट सही है या नहीं और क्या ऋणदाता ने किसी नियामक मानदंड का उल्लंघन किया है। यदि बैंक ने वास्तव में भुगतान किया है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है, तो यह प्रश्न बना रहता है कि क्या अन्य खातों को प्राप्त करने के लिए भी इसी मॉडल का पालन किया गया या यह एक अलग घटना थी।
वास्तव में, केवल बैंक ही नहीं बल्कि रिजर्व बैंक को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। चूंकि केंद्रीय बैंक समय-समय पर बैंकों के बहीखातों का निरीक्षण करता है तो सवाल उठेगा कि क्या नियामक ने इस तरह की किसी चीज पर ध्यान दिया? यदि नहीं तो उसे अपनी विनियमित संस्थाओं पर पर्यवेक्षण के दायरे का विस्तार करने पर विचार करना चाहिए।
रिपोर्ट की गई घटना गंभीर चिंता पैदा करती हैं क्योंकि बैंक के अंशकालिक अध्यक्ष और स्वतंत्र निदेशक अतनु चक्रवर्ती ने मार्च में इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने अपने इस्तीफे में उल्लेख किया कि बैंक की कुछ प्रथाएं उनके मूल्यों और नैतिक मानकों के अनुरूप नहीं थीं। चक्रवर्ती के इस्तीफे के कुछ दिनों बाद बैंक ने गलत तरीके से उत्पाद बेचने की चिंताओं के चलते कुछ अधिकारियों से पद छोड़ने को कहा। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि चक्रवर्ती की वास्तविक चिंताएं क्या थीं। इस मामले में नियामक की भूमिका पर भी सवाल उठे।
अब नए प्रश्न उठे हैं तो बैंक को सभी संबंधित मुद्दों का समाधान करना चाहिए। यह मानना आवश्यक है कि बैंकिंग कोई साधारण व्यवसाय नहीं है। बैंकिंग व्यवसाय की बुनियादी संरचना विश्वास पर आधारित है और इसे हर समय बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है। संचालन संबंधी चिंताएं हितधारकों के विश्वास को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे बैंक के लिए गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि किसी एक बैंक में भी कमजोरी व्यापक वित्तीय प्रणाली के लिए प्रणालीगत जोखिम पैदा कर सकती है।
इसी कारण से बैंक सख्ती से विनियमित होते हैं और यह जिम्मेदारी नियामक पर भी आती है कि वह सुनिश्चित करे कि प्रणाली सुचारु रूप से कार्य करे। यह समझा जा सकता है कि नियामक किसी विशेष बैंक की कमियों को सार्वजनिक नहीं करना चाहता, क्योंकि इससे घबराहट फैल सकती है। लेकिन नियामक को हितधारकों को आश्वस्त करना चाहिए कि वह विनियमित इकाई के भीतर उन मुद्दों को संबोधित कर रहा है जिनकी व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई है।
वर्तमान संदर्भ में, बैंक प्रबंधन को सामने आकर सभी चिंताओं का समाधान करना चाहिए। यदि लापरवाही हुई है, तो उचित कार्रवाई की जानी चाहिए और प्रणालियों को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि पुनरावृत्ति रोकी जा सके।