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वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लिए बड़े विदेशी निवेश और गहरे सुधार जरूरी, कैपिटल फ्लो बढ़ाने पर जोर

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वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का महत्त्वाकांक्षी​ लक्ष्य हासिल करने के लिए विदेश से भारी पूंजी लाने और देश से पूंजी निकासी थामने के लिए गहन सुधारों की जरूरत है

Last Updated- May 31, 2026 | 11:20 PM IST
India's 2047
इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

भारत में इस समय राजनीतिक चर्चा वर्ष 2047 तक देश के एक विकसित राष्ट्र, या विकसित भारत बनने की महत्त्वाकांक्षा के इर्दगिर्द केंद्रित हो गई है। मगर इस तमाम चर्चा के बीच हमें इस महत्त्वाकांक्षा से जुड़े गणित का भी विश्लेषण करना होगा। विश्व बैंक की परिभाषा के मुताबिक एक उच्च आय वाला देश उसे माना जाता है जिसकी प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय लगभग 14,000 डॉलर है। भारत के मामले मे यह आंकड़ा फिलहाल लगभग 2,700 डॉलर है।

एक यांत्रिक गणना से पता चलता है कि अगले 20 वर्षों में 2,700 डॉलर से 14,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय तक पहुंचने के लिए देश की अर्थव्यवस्था को 8.5 फीसदी सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर से छलांग लगाते रहनी होगी। इसके साथ ही भारत की जनसंख्या लगभग 1 फीसदी प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही है। जब हम इस गतिशील लक्ष्य और जनसंख्या वृद्धि को ध्यान में रखते हैं तो कुल उत्पादन में आवश्यक वृद्धि दर लगभग 9 फीसदी प्रति वर्ष तक पहुंच जाती है। दो दशकों तक 9 फीसदी की चक्रवृद्धि वृद्धि दर बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।

तेज आर्थिक वृद्धि के लिए दो कारकों का बेहतर तालमेल करना जरूरी है। ये दो कारक हैं, निवेश की मात्रा और उसकी (निवेश की) दक्षता। दक्षता का मापक वृद्धिशील पूंजी उत्पादन अनुपात (आईसीओआर) है। यह उत्पादन की एक अतिरिक्त इकाई (यूनिट) तैयार करने के लिए जरूरी पूंजी की इकाइयों (यूनिट) का आकलन करता है। सुचारु रूप से कार्य करने वाली किसी विकासशील अर्थव्यवस्था में आईसीओआर आम तौर पर लगभग 4 होता है। हाल के आंकड़ों के मुताबिक भारत में आईसीओआर 5 के करीब है। अगर अपेक्षित वृद्धि दर 9 फीसदी है और आईसीओआर 5 है तो गणितीय रूप से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सापेक्ष निवेश का अनुपात लगभग 45 फीसदी होना चाहिए।

शुरू में हमारी अपनी बचत इस निवेश के लिए धन उपलब्ध करा सकती है। भारत की वर्तमान सकल घरेलू बचत (जीडीएस) दर जीडीपी की लगभग 30 फीसदी है। इस संख्या की एक संरचनात्मक सीमा है। एक विकासशील देश मानवीय संकट उत्पन्न किए बिना वर्तमान उपभोग अनिश्चित काल तक सीमित नहीं रख सकता। 45 फीसदी की अपेक्षित निवेश दर में 30 फीसदी की घरेलू बचत दर घटाने पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 15 फीसदी अंक का अंतर आता है। मौजूदा 4 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए इसका तात्पर्य यह है कि प्रति वर्ष 600 अरब डॉलर की पूंजीगत कमी है। जैसे-जैसे कुल उत्पादन बढ़ता है, यह पूर्ण वित्त पोषण या पूंजी की जरूरत भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है।

इन आंकड़ों को देखकर दो अलग-अलग समस्याएं सामने आती हैं। पहली समस्या है निजी क्षेत्र की तरफ से अपेक्षित मात्रा में निवेश करने में हिचकिचाहट। भारतीय और विदेशी दोनों ही कंपनियों को इस पैमाने पर पूंजी लगाने के लिए विशिष्ट शर्तों की आवश्यकता होती है। उन्हें नीतिगत ढांचे में पूर्वानुमान की आवश्यकता होती है। वे निजी कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए समान व्यवहार की मांग करते हैं।

उन्हें केंद्रीय नियोजन से पीछे हटने, एक आधुनिक कर प्रशासन और अर्थव्यवस्था के गहन अंतरराष्ट्रीकरण की आवश्यकता है। सबसे बड़ी बात तो यह कि वे अपनी गणना अर्थव्यवस्था में कानून के शासन के संचालन पर आधारित रखते हैं। मान लीजिए कि सरकार अगले दो वर्षों में यह माहौल हासिल करने के लिए आवश्यक बड़ी सुधार परियोजनाओं को पूरा कर लेती है तो यह बाधा दूर हो सकती है। संसाधन में कमी की भरपाई विदेश से पूंजी लाकर की जानी चाहिए।

वैश्विक वित्तीय प्रणाली में असीमित पूंजी है। यह पूंजी निरंतर रिटर्न और संस्थागत सुरक्षा की तलाश में रहती है। अगर भारत एक सुदृढ़ नीतिगत ढांचा तैयार करता है और व्यवहार्य निवेश परियोजनाएं प्रस्तुत करता है तो वैश्विक पूंजी भारत में अपेक्षित पैमाने पर आसानी से आ पाएगी। अगर भारत को विकसित देश का दर्जा प्राप्त करने के लिए निर्णायक कदम उठाने हैं तो हम विदेशी पूंजी के पारंपरिक प्रवाह पर निर्भर नहीं रह सकते। हमें भारी मात्रा में पूंजी की आवश्यकता है। आवश्यक परिवर्तन क्षेत्रीय नीति में मामूली समायोजन या मार्केटिंग अभियानों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए संस्थागत स्थिरता में मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है।

अब सवाल है कि इस संस्थागत परिवर्तन में क्या शामिल है? सबसे पहले तो पूंजी पर अधिकांश नियंत्रण समाप्त करने होंगे। फिलहाल विदेशी पूंजी आने की राह में कई बाधाएं हैं। हमें पूंजी नियंत्रण प्रणाली से पूंजी प्रोत्साहन प्रणाली की ओर बढ़ना होगा। इसके लिए प्रत्यक्ष पूंजी नियंत्रण, विदेशी निवेश पर कराधान, वित्तीय विनियमन और एएमएल/सीएफटी (मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी और आतंकवाद के वित्तपोषण से निपटने वाले) ढांचों में पूर्ण बदलाव की आवश्यकता होगी। अगर हम भारत की अर्थव्यवस्था को विकसित राष्ट्रों के समूह में शुमार करना चाहते हैं तो सरकार को विदेशी पूंजी को लेकर खुला और उदार रवैया अपनाना होगा।

दूसरी अहम बात विनियामक और कानूनी पूर्वानुमान है। दीर्घकालिक पूंजी के स्रोत जैसे सॉवरिन कैपिटल फंड और पेंशन फंड दशकों के जोखिम को ध्यान में रखकर निवेश करते हैं। वे विदेशी निवेश से जुड़े भारतीय नीतिगत ढांचे से डरते हैं और छिटकते हैं। भारत में नए नीतिगत बदलाव लगातार होते रहते हैं जिससे इन फंडों को भविष्य की निश्चित दशा-दिशा का अंदाजा लगाने में दिक्कत होती है। इसे ध्यान में रखते हुए सरल, आर्थिक रूप से सुदृढ़ नीतिगत ढांचे लागू करने की जरूरत है ताकि कई दशकों तक किसी बड़े बदलाव की दरकार महसूस न हो। गैर-रणनीतिक नीतिगत फैसले विदेशी पूंजी की राह कठिन बना देते हैं।

तीसरी बात, बॉन्ड बाजार का दायरा एवं इसमें परिपक्वता दोनों बहाल करने की जरूरत है। केवल इ​क्विटी पूंजी से जीडीपी का 15 फीसदी पूरा नहीं किया जा सकता। पूंजी का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी ढांचे और कंपनियों के कारोबार विस्तार के लिए जरूरी ऋण के रूप में आना चाहिए। पूंजी नियंत्रण हटाने के अलावा घरेलू ऋण बाजार को बेहतर ढंग से काम करना होगा।

चौथी अहम बात है पूंजी पर लागत कम करना। विदेशी निवेशक भारतीय परिसंपत्तियों पर दांव लगाने में अधिक जोखिम देखते हैं जिससे वे मूल्यांकन (जोखिम प्रीमियम) भी अपने हिसाब से तय करते हैं। यह स्थिति व्यापक आर्थिक अनिश्चितता के कारण उत्पन्न होती है। जब सरकार विवेकाधीन मुद्रा नीति, ढीली राजकोषीय नीति और अपारदर्शी ऋण प्रबंधन लागू करती है तो जोखिम प्रीमियम बढ़ जाता है।

निरंतर राजकोषीय सुदृढ़ीकरण, औपचारिक मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण और विनिमय दर में उतार-चढ़ाव के प्रति परिपक्व दृष्टिकोण आवश्यक है। ये वे आवश्यक तंत्र हैं जो भारतीय परियोजनाओं के जोखिम प्रीमियम को कम करते हैं। स्वतंत्र और तकनीकी रूप से सक्षम सरकारी नीति एजेंसियों द्वारा प्रबंधित एक स्थिर वृहद अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश की नींव होती है।

यहां से वर्ष 2047 तक का सफर पूंजी की जरूरतों से भरा पड़ा है। ग​णितीय आकलन से पता चलता है कि हमारे घरेलू विकास के साधन मजबूत जरूर हैं मगर अपेक्षित स्तर तक पहुंचने के लिए अपर्याप्त हैं। घरेलू बचत और आवश्यक निवेश के बीच का अंतर एक संरचनात्मक वास्तविकता है। एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए भारतीय राज्य को अपना स्वरूप बदलना होगा। उसे विदेशी पूंजी अवरुद्ध करने वाली संशयपूर्ण प्रणाली से पूंजी प्रवाह बढ़ावा देने वाली प्रणाली अपनानी होगी। इसके लिए घरेलू संस्थाओं के पुनर्गठन की आवश्यकता है ताकि भारत उभरती वैश्विक व्यवस्था में पूंजी के लिए सबसे कुशल, निश्चित और अधिक स्थिर नीतिगत व्यवहार वाला स्थान बन सके।


(लेखक आइजक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में मानद वरिष्ठ फेलो और पूर्व अफसरशाह हैं)

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First Published - May 31, 2026 | 11:20 PM IST

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