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Editorial: IIP का नया रूप, 2022-23 आधार वर्ष के साथ औद्योगिक माप प्रणाली में बड़ा बदलाव

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सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय देश की अर्थव्यवस्था का आकलन करने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण संकेतकों की समीक्षा कर रहा है

Last Updated- May 28, 2026 | 10:34 PM IST
IIP Data

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय देश की अर्थव्यवस्था का आकलन करने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण संकेतकों की समीक्षा कर रहा है। उसने राष्ट्रीय लेखा और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के लिए नई श्रृंखला मुहैया करा दी हैं। अगले सप्ताह वह औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के लिए नई श्रृंखला जारी करने वाला है। ये महत्त्वपूर्ण बदलाव हैं क्योंकि नए सूचकांक अर्थव्यवस्था में हुए बदलावों को दर्शाते हैं।

आईआईपी के आधार वर्ष को 2011-12 से हटाकर 2022-23 किया जा रहा है। पिछले एक दशक में देश में औद्योगिक गतिविधियां बहुत अधिक बदली हैं और नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, डिजिटल तकनीक और अहम खनिजों के क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है।

मंत्रालय के मुताबिक नई श्रृंखला में दुर्लभ खनिज, लघु खनिज, गैस और बिजली आपूर्ति, गंदे जल और कचरे का प्रबंधन आदि शामिल हैं। केरोसिन, सिलाई मशीन,फ्लूरोसेंट ट्यूब्स आदि को इससे बाहर कर दिया गया है। कुल वस्तुओं की संख्या 407 से बढ़ाकर 463 कर दी गई है। विनिर्माण में ही संख्या 405 से बढ़कर 455 कर दी गई है। 64 वस्तु समूह हटाए गए हैं और 120 नए शामिल कर दिए गए हैं। बढ़ी हुई बास्केट सूचकांक को नीति निर्माताओं, कारोबारों और निवेशकों के लिए अधिक प्रासांगिक बनाएगी।

इस कवायद के लिए गठित तकनीकी सलाहकार समिति (टीएसी) ने औद्योगिक मापन को आधुनिक बनाने का प्रयास भी किया। इसमें पद्धतियों में सुधार और अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाएं शामिल की गईं। उन्नत अर्थव्यवस्थाएं तेजी से ऐसी गतिशील औद्योगिक मापन प्रणालियों का उपयोग कर रही हैं, जिनमें भार और उत्पादन के पैटर्न लगातार अपडेट होते रहते हैं।

टीएसी की रिपोर्ट में आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) तथा संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी प्रभाग की औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, 2010 से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सिफारिशों का उल्लेख किया गया है जो कठोर तयशुदा आधार प्रणालियों के बजाय श्रृंखला से जुड़े सूचकांकों का समर्थन करती हैं।

ऐसी प्रणालियों में प्रतिस्थापन पर पक्षपात कम होता है और औद्योगिक भार को पुराना नहीं होने पाता, विशेषकर तब जब पुराने उद्योगों का पतन होता है और नए उद्योग तेजी से उभरते हैं। फिर भी इस बड़े बदलाव ने कुछ खामियों को उजागर किया है। भारत की सांख्यिकीय प्रणाली अब भी विलंबित सर्वेक्षणों, राज्यों से असमान सूचना, पुरानी प्रशासनिक प्रणालियों और कमजोर डिजिटल डेटा प्रणालियों पर निर्भर हैं।

विनिर्माण का बड़ा हिस्सा अब भी असंगठित क्षेत्र में है, जहां उत्पादन छोटे पैमाने पर तथा अनौपचारिक होता है और जिसकी निगरानी करना कठिन होता है। हालांकि टीएसी ने असंगठित क्षेत्र के लिए सूचकांक बनाने की दूरदर्शी सिफारिश की है लेकिन देखना होगा कि यह लागू कैसे किया जाए। इसके अलावा मशीनरी और उपकरणों की मरम्मत तथा स्थापना जैसी गतिविधियां अब भी कठिन हैं क्योंकि वे मुख्यतः सेवा उन्मुख हैं और विश्वसनीय मापदंड विकसित करने की आवश्यकता होती है जो फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं।

इसी तरह दुर्लभ पृथ्वी खनिजों का समावेश उभरती प्रौद्योगिकियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्रों में भारत की महत्त्वाकांक्षाओं को दर्शाता है। यद्यपि भारत के पास विश्व के तीसरे सबसे बड़े दुर्लभ पृथ्वी खनिज भंडार हैं, लेकिन देश में प्रसंस्करण क्षमता अब भी सीमित है। मूल्य अपस्फीतक मूल्य-आधारित उत्पादन आंकड़ों को मात्रा आधारित उत्पादन अनुमान में बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इस संदर्भ में उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) की अनुपस्थिति एक बड़ी कमी बनी हुई है।

यही वजह है कि संशोधित आईआईपी श्रृंखला को अधिक आधुनिक औद्योगिक मापन प्रणाली की ओर बढ़ना माना जा सकता है। हमारी फौरी प्राथमिकता डेटा की गुणवत्ता में सुधार करना, डिजिटल रिपोर्टिंग प्रणालियों को मजबूत करना, अपस्फीतकों को परिष्कृत करना और असंगठित तथा खंडित क्षेत्रों को पकड़ने के लिए बेहतर तरीकों का विकास करना होना चाहिए। निरंतर संस्थागत सुधारों और पद्धतिगत सुधारों के साथ आईआईपी भारत के औद्योगिक और आर्थिक परिवर्तन का अधिक भरोसेमंद संकेतक बन सकता है।

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First Published - May 28, 2026 | 10:34 PM IST

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