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संपादकीय: उच्च शिक्षा के लिए फंडिंग

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उच्च शिक्षा में शामिल लागत को देखते हुए खासकर स्टेम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) पाठ्यक्रमों की तो छात्रों को अक्सर अधिक राशि चुकानी होती है।

Last Updated- November 08, 2024 | 9:10 PM IST
Higher education

उच्च शिक्षा की फंडिंग में सरकारी धन के उपयोग को लेकर बहस नई नहीं है। उच्च शिक्षा के अधिकांश लाभ जहां इसे हासिल करने वाले व्यक्ति को होते हैं, वहीं इसके कुछ बाहरी लाभ भी हैं, मसलन प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ, उच्च शोध एवं नवाचार और अर्थव्यवस्था में अधिक कुशल श्रम शक्ति की उपलब्धता।

उच्च शिक्षा में शामिल लागत को देखते हुए खासकर स्टेम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) पाठ्यक्रमों की तो छात्रों को अक्सर अधिक राशि चुकानी होती है। इस संदर्भ में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में पीएम विद्यालक्ष्मी योजना को मंजूरी दी है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

22 लाख से अधिक विद्यार्थियों को अपने दायरे में लेने वाली इस वित्तीय सहायता योजना के अंतर्गत उन प्रतिभाशाली और उत्कृष्ट विद्यार्थियों को शैक्षिक ऋण प्रदान किया जाएगा जिन्हें उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिला मिला हो लेकिन वे वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहे हों। शुरुआत में यह योजना देश के शीर्ष 860 गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा संस्थानों पर लागू होगी।

सेंट्रल सेक्टर ब्याज सब्सिडी (सीएसआईएस) और शैक्षणिक ऋण के लिए ऋण गारंटी फंड योजना (सीजीएफएसईएल) के पूरक के रूप में पीएम विद्यालक्ष्मी योजना स्थगन अवधि के दौरान 4.5 लाख रुपये तक की पारिवारिक आय वाले विद्यार्थियों को पूर्ण ब्याज अनुदान प्रदान करेगी।

इसके अलावा 8 लाख रुपये तक की पारिवारिक आय वाले विद्यार्थियों को स्थगन अवधि के दौरान 10 लाख रुपये तक के ऋण के लिए 3 फीसदी की ब्याज सब्सिडी दी जाएगी। 7.5 लाख रुपये तक के ऋण की पात्रता रखने वाले विद्यार्थियों को बकाया देनदारी पर 75 फीसदी की ऋण गारंटी मिलेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि गारंटर मुक्त शिक्षा ऋण गरीब छात्रों को उच्च शिक्षा हासिल करने में मदद करेगा।

देश में शिक्षा ऋण का बाजार बीते कुछ वर्षों में काफी विकसित हुआ है। शिक्षा ऋण के तहत बकाया पोर्टफोलियो 2022-23 में 17 फीसदी बढ़कर 96,847 करोड़ रुपये हो गया। बहरहाल देश के शिक्षा ऋण का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा विदेशों में पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा 2022-23 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा वितरित कुल शिक्षा ऋण का करीब 8 फीसदी फंसे हुए कर्ज में तब्दील हो गया। यह बैंकिंग क्षेत्र के औसत फंसे हुए कर्ज से अधिक है। औसत डिफॉल्ट दर भी प्रमुख संस्थानों के छात्रों के शिक्षा ऋण की डिफॉल्ट दर से बहुत अधिक है।

इससे संकेत मिलता है कि शिक्षा ऋण के क्षेत्र में ऐसे छात्रों का योगदान अधिक है जो दूसरे दर्जे के संस्थानों में पढ़ते हैं। इस संदर्भ में योजना न केवल गरीब विद्यार्थियों को ऋण तक आसान पहुंच मुहैया कराएगी बल्कि कुछ हद तक बैंकों को भी बचाएगी।

बहरहाल, यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि आसान ऋण की मदद से उच्च शिक्षा को सब्सिडी देना जरूरी हो सकता है लेकिन यह वांछित परिणाम पाने के लिए पर्याप्त नहीं है। देश में समस्या न केवल ऋण के किफायती होने या वित्तीय मदद के विकल्पों की है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण संस्थानों की उपलब्धता भी एक अहम मुद्दा है।

राष्ट्रीय पात्रता सह अर्हता परीक्षा समेत शीर्ष परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक होने, कोचिंग सेंटरों का विस्तार और शीर्ष संस्थानों में प्रवेश की तैयारी कर रहे बच्चों द्वारा आत्महत्या करने जैसी घटनाएं अच्छे उच्च शिक्षा संस्थानों की कमी की एक बड़ी समस्या का संकेत हैं। इस वजह से अधिकांश शैक्षणिक ऋण विदेशों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं द्वारा लिए जाते हैं।

ऐसे में जहां उच्च शिक्षा के ऋण की उपलब्धता में सुधार का स्वागत किया जाना चाहिए, वहीं सरकार को अधिक गहरी समस्या पर भी नजर रखनी चाहिए। भारत को अगर तेजी से बदलती दुनिया में अगली पीढ़ी को प्रासंगिक रखना है तो उसे बड़ी संख्या में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा संस्थान तैयार करने होंगे।

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First Published - November 8, 2024 | 9:05 PM IST

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