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सभी के लिए यूनिवर्सल रिटायरमेंट अकाउंट बनाकर स्वामित्व आधारित समाज का निर्माण

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क्या भारत सभी भारतीयों को शामिल करने वाले स्वामित्व वाले समाज का निर्माण करने के लिए पर्याप्त समय से पहले पूंजी स्वामित्व को शामिल करने के लिए तैयार है

Last Updated- March 02, 2026 | 9:56 PM IST
universal retirement account
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जिसमें डिजिटल अवसंरचना, एल्गोरिद्म सिस्टम और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से बढ़ते रिटर्न के कारण आर्थिक लाभ की संरचना पूंजी का स्वामित्व रखने वालों के पक्ष में झुक सकती है। पूंजी लंबे समय तक बढ़ती रहेगी और अर्थव्यवस्था में मूल्य सृजन में इसका योगदान बढ़ता जाएगा। ऐसी स्थिति में, परिसंपत्ति के स्वामित्व का समय महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि पांच या छह दशकों तक संचय से ऐसे परिणाम प्राप्त होते हैं जो करियर की मध्य अवधि में शुरू की गई बचत से संभव नहीं हैं। इसलिए यह संस्थागत प्रश्न है कि क्या भारत सभी भारतीयों को शामिल करने वाले स्वामित्व वाले समाज का निर्माण करने के लिए पर्याप्त समय से पहले पूंजी स्वामित्व को शामिल करने के लिए तैयार है।

इस उद्देश्य से हम प्रत्येक बच्चे के लिए जन्म के समय ही एक सार्वभौमिक सेवानिवृत्ति खाता (यूआरए) बना सकते हैं, जिसका प्रबंधन कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) द्वारा किया जाए और जिसमें जमा रकम पूर्णतः कम लागत वाले भारतीय इक्विटी इंडेक्स फंडों में निवेश किया जाए। इसमें बच्चे के जन्म से लेकर छह वर्ष की आयु तक सरकार द्वारा प्रतिवर्ष 1,500 रुपये का योगदान किया जाए। यह खाता 60 वर्ष की आयु तक बंद रहेगा, जिसके बाद निकासी प्रति वर्ष मसलन लगभग 4 फीसदी तक सीमित रखी जा सकती है, ताकि यह मानते हुए कि दीर्घकालिक वास्तविक रिटर्न लगभग 4 फीसदी रहेगा, वास्तविक मूलधन को संरक्षित किया जा सके।

इस निधि में उत्तराधिकार का प्रावधान होगा, जिसमें असामयिक मृत्यु की स्थिति में नामित लाभार्थी होंगे। इसमें माता-पिता, दादा-दादी, नियोक्ता, राज्य सरकारों, परोपकारी संस्थाओं या व्यक्ति द्वारा जीवन के किसी भी चरण में स्वैच्छिक रूप से योगदान किया जा सकेगा। सार्वजनिक अंशदान प्रांर​​भिक पूंजी के साथ आधार स्थापित करेगा, यूआरए स्वयं एक स्थायी सेवानिवृत्ति योजना के रूप में कार्य करेगा जिसमें समय के साथ अतिरिक्त बचत जमा की जा सकेगी। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये खाते पूरी तरह से कर मुक्त होंगे, जिससे छह दशकों तक बिना किसी नुकसान के संचयन होता रहेगा।

हिसाब बिल्कुल सीधा है। भारत में हर साल लगभग 2.5 करोड़ बच्चे पैदा होते हैं। हर साल पैदा होने वाले बच्चों के समूह पर प्रति बच्चे 1,500 रुपये की दर से लगभग 3,750 करोड़ रुपये खर्च होंगे। चूंकि पात्रता शून्य से छह साल की उम्र तक है, इसलिए कार्यक्रम के पूरी तरह लागू होने के बाद सात समूहों को एक साथ वित्त पोषित किया जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 26,250 करोड़ रुपये का स्थिर वार्षिक व्यय होगा। पहले सात वर्षों के दौरान, जैसे-जैसे प्रत्येक नया समूह जोड़ा जाएगा, व्यय में धीरे-धीरे वृद्धि होगी और सातवें वर्ष के अंत तक निवेश पर रिटर्न को ध्यान में रखे बिना सरकार का कुल अंशदान लगभग 1.05 लाख करोड़ रुपये होगा।

किसी बच्चे के लिए 60 वर्ष की आयु तक 4 फीसदी की वास्तविक दर पर चक्रवृद्धि ब्याज के साथ 1,500 रुपये के सात वार्षिक अंशदान से आज की क्रय शक्ति के अनुसार लगभग 1,00,000 रुपये की राशि जमा हो जाएगी। यह राशि 4 फीसदी ब्याज दर के नियम के तहत वास्तविक रूप से प्रति वर्ष लगभग 4,000 रुपये की निकासी को वहन करने के लिए पर्याप्त है, बशर्ते दीर्घकालिक रिटर्न इसी स्तर के आसपास बना रहे। भले ही सरकार का अंशदान वर्तमान मूल्य के हिसाब से मामूली लगे लेकिन दीर्घकालिक चक्रवृद्धि ब्याज से पूंजी बढ़ेगी।

पहले दशक के भीतर 4 फीसदी की वास्तविक चक्रवृद्धि ब्याज दर और बिना किसी निकासी के, कुल प्रबंधित परिसंपत्तियां लगभग 2.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएंगी। ईपीएफओ का वर्तमान इक्विटी आवंटन 2.7 से 3 लाख करोड़ रुपये के बीच है, इसलिए 10 वर्षों के भीतर, इस तरह के बाल खाते बाजार की क्षमता को प्रभावित किए बिना दीर्घकालिक घरेलू इक्विटी पूंजी का एक पर्याप्त अतिरिक्त स्रोत बन जाएंगे।

लंबी अवधि में संचित पूंजी का महत्त्व बढ़ जाता है। यदि वार्षिक अंशदान को प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से बढ़ाया जाए और प्रति व्यक्ति आय और पोर्टफोलियो दोनों लंबी अवधि में वास्तविक रूप से लगभग 4 फीसदी की दर से लाभ कमाते हैं, तो संचित पूंजी अर्थव्यवस्था के साथ बढ़ती है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 10-15 फीसदी तक पहुंच जाती है, न कि जीडीपी बढ़ने पर घटती है। इस परिमाण की पूंजी, जो पूरी तरह से बढ़त के आधार पर आवंटित हो और संरचनात्मक रूप से लंबी अवधि की हो, देश में घरेलू इक्विटी पूंजी के सबसे बड़े स्रोतों में से एक होगी।

व्यापक नीतिगत तर्क सेवानिवृत्ति के गणित से कहीं आगे तक जाता है। भारत में पुनर्वितरण अक्सर तात्कालिक हस्तांतरण के रूप में होता रहा है, जिनका उद्देश्य वर्तमान उपभोग को सुचारु बनाना है। इन साधनों का अपना महत्त्व है। फिर भी, समय के साथ दीर्घकालिक सुरक्षा सामयिक नकदी प्रवाह से कम और बैलेंस शीट से अधिक निर्धारित होती है। एक ऐसा पुनर्वितरण जो आधी सदी तक बढ़ता रहता है, वार्षिक हस्तांतरण की तुलना में वित्तीय लचीलेपन को अधिक मजबूत बनाता है। यहां उद्देश्य केवल एक वर्ष में परिवारों के बीच आय का हस्तांतरण करना नहीं है, बल्कि पीढ़ियों तक जनसंख्या में संपत्ति के स्वामित्व को स्थापित करना है।

व्यावहारिक रूप से ऐसी संरचना भारत को एक स्वामित्व समाज के करीब ले जाएगी जिसमें प्रत्येक नागरिक, अपने माता-पिता की आय या व्यावसायिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन में एक छोटा लेकिन स्थायी हिस्सा रखता है। जैसे-जैसे बाजार मजबूत होते हैं और उद्यम बढ़ते हैं, यह हिस्सा स्वतः ही बढ़ता जाता है। देश के दीर्घकालिक विकास में भागीदार होने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत गहरा होता है और इससे भारतीय उद्यमों के शेयरधारकों का आधार भी व्यापक होगा।

आवश्यक संस्थागत ढांचा पहले से ही मौजूद है। ईपीएफओ एक स्थापित नियामक ढांचे के भीतर बड़े सेवानिवृत्ति निधि कोषों का प्रबंधन करता है। यहां महत्त्वपूर्ण बात है अनुशासित सरलता, यानी कम लागत वाला इंडेक्स आवंटन, 60 वर्ष की आयु तक सख्त लॉक-इन नियम, पारदर्शी प्रशासन और स्पष्ट लाभार्थी नामांकन। पांच या छह दशकों में सुनियोजित समायोजन की तुलना में शुल्क अनुशासन और निरंतरता अधिक मायने रखेगी।

हजारीबाग जैसे मेरे अपने जिले में, जहां परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर है और बचत अनियमित है, जन्म के समय स्थापित पेंशन योजना अगली पीढ़ी के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है। यह असमानता को समाप्त नहीं करती, न ही शिक्षा, रोजगार या बुनियादी ढांचे का विकल्प है। लेकिन यह सुनिश्चित करती है कि भारत की भावी समृद्धि में भागीदारी केवल वेतन-मजदूरी पर निर्भर न होकर स्वामित्व पर आधारित हो।

इसमें वार्षिक राजकोषीय लागत कुल व्यय के सापेक्ष नियंत्रण में है, दशक-स्तरीय वित्तीय प्रभाव मौजूदा पूंजी बाजारों के भीतर प्रबंधनीय है, और पीढ़ी दर पीढ़ी संचय पर्याप्त हो जाता है, जिसके लिए किसी एक समय में बड़े हस्तांतरण की आवश्यकता नहीं होती है। केवल तात्कालिक उपभोग के बजाय दीर्घकालिक सुरक्षा बढ़ाने के लिए पुनर्वितरण की योजना बनाना भारत के व्यापक विकास पथ के अनुरूप है।

ऐसे समय में जब आर्थिक लाभ में श्रम के बजाय पूंजी की भूमिका तेजी से महत्त्वपूर्ण होती जा रही है, जन्म से ही सार्वभौमिक पूंजी स्वामित्व को स्थापित करना एक परिवर्तनकारी पहल साबित हो सकता है।


(लेखक एवरस्टोन ग्रुप के अध्यक्ष और एलएसई में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। वह केंद्रीय मंत्री और लोक सभा सदस्य भी रह चुके हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - March 2, 2026 | 9:53 PM IST

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