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हमारे सामने घटित होती एक और त्रासदी

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 1:51 AM IST

तालिबान अफगानिस्तान पर काबिज हो चुका है। बीते एक-दो सप्ताह से दुनिया भर में अफगानिस्तान खबरों में है और उसे लेकर टिप्पणियां लिखी जा रही हैं। ध्यान रहे कि तमाम टिप्पणियों और बहसों का 90 फीसदी हिस्सा इस बात पर आधारित है कि अमेरिका से लेकर भारत और चीन से लेकर पाकिस्तान तक इसका क्या असर होगा। उस देश के बारे में सबसे कम बात हो रही है जिसके लिए यह सबसे अधिक मायने रखता है यानी अफगानिस्तान और उसकी चार करोड़ अवाम।
वास्तव में इसमें चकित होने जैसा कुछ भी नहीं है। जब अमेरिका ने अपने विशेष दूत जलमे खलीलजाद के न्यूनतम संभव सौदे को लागू किया तो तालिबान की जीत होनी ही थी। न्यूनतम इस तरह कि अमेरिकी सैनिक तालिबान से गोलियां खाए बगैर वापस लौट सकें। अफगान लोगों की परवाह किसी को नहीं। परंतु अब वह न्यूनतम भी सुनिश्चित नहीं है क्योंकि अमेरिका तालिबान से गुजारिश कर रहा है कि कम से कम उसके दूतावास को छोड़ दिया जाए। खलीलजाद का जन्म अफगानिस्तान के शहर मजार-ए-शरीफ में हुआ था और वह नूरजई कबीले के पश्तून हैं। उन्होंने अपने मूल देश के इतिहास, जातीयता और उसके लोगों की तकदीर को अमेरिकी शिक्षा के नजरिये से देखने का प्रयास नहीं किया। उन्हें पता है कि उनके साथी अफगानों की तकदीर क्या होनी है। वही जो वह छोड़कर अमेरिका लौट सकते थे। अंतहीन संघर्ष, अराजकता, इस्लामवाद की एक न एक छाया और समय के साथ एक और जंग। इसलिए यहां से बाहर निकलो। जैसा कि उन्होंने बतौर एक किशोर अंतर-सांस्कृतिक स्कूल विद्यार्थी विनिमय योजना के तहत अमेरिका जाकर किया था। समझदार लोग यहां नहीं रहते। अच्छी शिक्षा आपको बौद्धिकता दे सकती है, संवेदनशीलता नहीं। यह या तो भगवान आपको देता है या नहीं देता। तथ्य यह है कि अफगानिस्तान में बड़ी तादाद में समझदार लोग हैं। उनकी शानदार क्रिकेट टीम को ही देख लीजिए। लेकिन अगर आप उसके इतिहास से वाकिफ हों तो खलीलजाद की तरह अगर आपने उसका एक हिस्सा जिया हो तो आप आसानी से संवेदनहीन हो सकते हैं। अपने इतिहास के दौरान या कम से कम दो सदियों से जबसे बड़ी शक्तियों ने उसे और अपने भू-सामरिक हितों के लिए उसकी भौगोलिक अहमियत को पहचाना है, अफगानिस्तान और उसके लोगों के साथ ऐसा ही होता रहा है। साम्राज्यवादी ब्रिटेन के लिए वह उसके और शक्तिशाली जारशाही/स्टालिनवादी साम्राज्य के बीच बफर स्टेट (ऐसा राज्य जो दो शत्रु देशों के बीच होता है) था। उसके शुरुआती सैन्य प्रयासों को नाकामी हाथ लगी लेकिन वे लगे रहे।

आखिरकार, 19वीं सदी में दो एंग्लो-अफगान युद्धों में बड़ी तादाद में अफगानों के मारे जाने के बाद उन्होंने ऐसी संधि पर हस्ताक्षर किए जो प्राय: औपनिवेशिक शक्तियां पराजितों के सामने रखती हैं। उसकी विदेश और सामरिक नीतियों पर नियंत्रण के बदले सांकेतिक संप्रभुता। मॉर्टिमर डूरंड ने औपनिवेशिक भारत के साथ खींची गई सीमा पर अफगान शासक से हस्ताक्षर करा लिए जिसे डूरंड रेखा कहा गया। कागज पर अफगान शासक संप्रभु था लेकिन हकीकत में दूसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के बाद ब्रिटेन ने उसकी सेना और विदेश नीतियों पर नियंत्रण कर लिया। यह ऐसा था मानो डूरंड स्वयं से ही वार्ता कर रहे हों। आश्चर्य नहीं कि किसी विश्वसनीय अफगान शासक या शासन ने इस सीमा को मान्यता नहीं दी।
सन 1947 के बाद 75 वर्षों  से पाकिस्तान अफगानिस्तान के मामलों में गहराई से शामिल है। करीब चार दशक तक अफगानिस्तान दक्षिण-पूर्व के लिए उसका बफर स्टेट बना रहा। खासतौर पर मध्य एशिया के संवेदनशील क्षेत्र को लेकर। यदि अपने सामरिक हित को लेकर आपका नजरिया एकपक्षीय हो जैसा कि पाकिस्तान करता है तो यह ऐतिहासिक अवसर था क्योंकि अगर अफगानिस्तान सोवियत बफर स्टेट था तो पाकिस्तान अमेरिका का स्वाभाविक सहयोगी था। एक मात्र पहले जो पाकिस्तान के लिए सामरिक दृष्टि से अहम है वह है भारत के विरुद्ध बढ़त हासिल करना। उसने वामपंथी विस्तार के खिलाफ अग्रणी देश की भूमिका निभाने का आर्थिक लाभ उठाया और अपनी अर्थव्यवस्था और सेना को भारत के समक्ष मजबूत करने में इसका लाभ लिया। लेकिन इसका लाभ नहीं हुआ। उसने भारत के साथ दो आत्मघाती जंग लड़ीं और 1971 में उसके दो टुकड़े हो गए।
सन 1954 और 1971 के बीच पाकिस्तान ने मुसीबत को खुद न्योता दिया लेकिन अफगानिस्तान के लिए राहत लंबी नहीं रही। जल्दी ही पाकिस्तान और उसकी एजेंसियों ने पश्चिमी साझेदारों के साथ मिलकर काबुल में सोवियत समर्थक सरकारों को गिराने और उनकी जगह इस्लामिक सरकार के गठन का खेल शुरू कर दिया। सन 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में सीधा दखल दिया जिसके खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देश, इस्लामी दुनिया और चीन ने मुजाहिदीन को धन और हथियार देना शुरू कर दिया। लाखों अफगान मारे गए और करीब एक करोड़ शरणार्थी बन गए। पाकिस्तान एक बार फिर उभरकर सामने आया और उसके लिए आर्थिक और अन्य सहायता के द्वार खुल गए। सन 1989 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान छोड़ दिया। चूंकि पाकिस्तान मानता था कि उसने एक महाशक्ति को पराजित किया है इसलिए वह सोवियत और भारत के मित्र नजीबुल्ला शासन को बने रहने देना नहीं चाहता था। उसने नजीबुल्ला को हटाने के लिए मुजाहिदीन की मदद जारी रखी। आखिरकार उन्होंने काबुल पर नियंत्रण कर लिया लेकिन उनका काम समाप्त नहीं हुआ था। मुजाहिदीन बंटे हुए थे। कई नेताओं की अपनी सोच थी और पाकिस्तान चाहता था कि काबुल में मजबूत और एकजुट नेतृत्व चाहिए था जो उसकी सुने। यही कारण है कि बड़ी तादाद में मदरसा स्थापित किए गए जहां तालिबान को इस्लाम का सबसे रूढि़वादी संस्करण पढ़ाया गया और उन्हें केवल जंग लडऩे का प्रशिक्षण दिया गया। एक बार पुन: अनेक अफगान मारे गए क्योंकि तालिबान ने मुजाहिदीन को बाहर करके शरिया का अपना संस्करण लागू कर दिया। बड़ी तादाद में प्रतिभाशाली युवा अफगानों ने देश छोड़ दिया। देश प्रतिभाविहीन हो गया। उसकी पूंजी और संस्कृति भी नष्ट हुई। बदले में उसे अल कायदा तथा अन्य धार्मिक चरमपंथी मिले और 9/11 के बाद अमेरिका एक बार फिर आ धमका। सन 1979 और 2021 के बीच अमेरिका ने अफगानिस्तान को, भले ही उसमें खामियां थीं, तीन बार बांट दिया और लाखों लोग मारे गए। उसने सोवियत को पराजित किया लेकिन अपना काम निकलने के बाद अफगानिस्तान को त्याग दिया। 2001 में वे तालिबान को समाप्त करने और ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम के नाम पर एक आधुनिक, नया लोकतांत्रिक अफगानिस्तान बनाने वापस लौटे। 2021 में एक बार फिर अफगानिस्तान को त्याग दिया। इसलिए क्योंकि अब उन्होंने एक ऐसी वापसी के बारे में सोचा जो पराजय न लगे। अमेरिका ने तीन बार अफगानिस्तान को नष्ट किया और पाकिस्तान उसका सहयोगी रहा। एक बार फिर कई अफगान मरेंगे। शिक्षित कुलीन एक बार फिर भागेंगे और महिलाओं को एक बार फिर तालिबान अपनी मर्जी से इस्तेमाल करेंगे। वे सुरक्षित तो होंगी लेकिन उन्हें तालिबानी शरिया के तहत जीना होगा। नए शिक्षित अफगान कुलीनों के उभार की वजह यह है कि इस बार अमेरिकियों ने केवल जंग नहीं लड़ी। उन्होंने राष्ट्र निर्माण में समय, पैसा और खुद की भावनाएं झोंकीं। भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन अब कह रहे हों कि अमेरिका का ऐसा विचार कभी नहीं था। बीते 20 वर्ष में जब तक अमेरिका वहां रहा, अफगान आबादी ने काफी तरक्की की।

मेरी नजर वॉशिंगटन के सामरिक विद्वान ध्रुव जयशंकर के एक ट्वीट पर पड़ी जिसमें उन्होंने अफगानिस्तान में 2000 और 2018 के बीच आए बदलाव को लेकर विश्व बैंक के आंकड़े पेश किए थे। इस अवधि में वहां जीवन संभाव्यता 56 वर्ष से बढ़कर 65 वर्ष हो गई। प्राथमिक विद्यालयों में पंजीयन 21 फीसदी से बढ़कर 104 हो गया जबकि वयस्क महिला साक्षरता 17 से बढ़कर 30 फीसदी हो गई। बिजली तक पहुंच 22 से बढ़कर 99 फीसदी हो गई और प्रति व्यक्ति जीडीपी 1190 डॉलर से बढ़कर 2034 डॉलर यानी करीब दोगुना हो गया।
अमेरिकियों ने यह सब हासिल करने में मदद की लेकिन केवल इसलिए क्योंकि अफगान लोगों में आधुनिकता और बदलाव की चाह और उसे पाने की काबिलियत थी। अब 9/11 की बीसवीं वर्षगांठ पर अफगानिस्तान में वही शासन वापस आया है जिसे उसने 2001 में उखाड़ा था। कह सकते हैं कि दक्षिण एशिया के शीर्ष पर एक सीरिया बनने को है और इसमें असहाय अफगान नागरिकों की कोई भूमिका नहीं है।

First Published : August 17, 2021 | 1:03 AM IST