भारत में किसान अपनी खेती की पद्धतियों को मुख्यतः पारंपरिक तरीकों में सुधार करके आगे बढ़ा रहे हैं। इसके लिए वे बेहतर बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं, खेती के कामों में मशीनों का सहारा ले रहे हैं और कुछ मामलों में नई फसलों को भी अपना रहे हैं। कई किसान उर्वरकों पर मिलने वाली सरकारी सब्सिडी और सरकार द्वारा खाद्यान्न की खरीद पर भी काफी हद तक निर्भर हैं।
सरकार द्वारा खरीदे जाने वाले अधिकांश खाद्यान्न तथा उर्वरक और खाद्य सब्सिडी का बड़ा हिस्सा धान और गेहूं की खेती पर खर्च होता है। वर्ष 2023-24 में इन दोनों प्रमुख फसलों का कुल उत्पादन मूल्य लगभग 7.5 लाख करोड़ रुपये था जबकि उर्वरक और खाद्य सब्सिडी पर सरकार का बजटीय व्यय लगभग 4 लाख करोड़ रुपये रहा। इसके अलावा, 80 करोड़ से अधिक लोगों को केंद्र सरकार की ओर से यही खाद्यान्न निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है।
यदि वर्ष 2011-12 से 2023-24 के बीच कृषि क्षेत्र की वृद्धि पर नजर डालें तो धान और गेहूं का उत्पादन केवल 27 फीसदी बढ़ा। इसके विपरीत, फल और सब्जियों का उत्पादन 52 फीसदी तथा दूध का उत्पादन 85 फीसदी बढ़ गया। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन क्षेत्रों को सरकार की ओर से न तो विशेष सब्सिडी मिली और न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बड़े पैमाने पर सरकारी खरीद का लाभ मिला। इससे स्पष्ट होता है कि कृषि के वास्तविक विकास वाले क्षेत्र वे हैं, जो प्रत्यक्ष सरकारी सहायता के दायरे से बाहर हैं और मुख्य रूप से किसानों की उद्यमशीलता तथा उनके अपने प्रयासों पर आधारित हैं।
दूध उत्पादन में हुई बेहतरीन वृद्धि इसका सबसे प्रेरक उदाहरण है। इस सफलता के पीछे दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इसकी शुरुआत गुजरात के आणंद जिले से हुई, जहां दूध उत्पादकों ने अपने जिले ‘कैरा’ के नाम पर सहकारी संस्था बनाई और अपने उत्पाद को ‘अमूल’ नाम दिया, जो ‘आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड’ का संक्षिप्त रूप है।
इस आंदोलन का नेतृत्व त्रिभुवनदास पटेल ने किया जबकि वर्गीज कुरियन ने इसके कार्यकारी प्रमुख के रूप में इसे नई दिशा दी। आगे चलकर यही पहल गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन के रूप में विकसित हुई जो आज देश की सबसे बड़ी खाद्य उत्पाद विपणन संस्थाओं में से एक है और जिसके 36 लाख दुग्ध उत्पादक सदस्य इसके मालिक हैं।
उत्पादन पर किसानों के नियंत्रण की यही सोच वर्ष 1965 में स्थापित राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) की आधारशिला बनी। यह क्षेत्र, जो किसानों और सहकारी संस्थाओं के नियंत्रण में है तथा सरकारी खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर निर्भर नहीं है, कृषि के उन हिस्सों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ा है, जो सरकारी सहायता पर आधारित हैं, खासतौर पर धान और गेहूं का उत्पादन। वर्ष 2023-24 में जहां मुख्यतः धान और गेहूं जैसे अनाजों का उत्पादन मूल्य 8.5 लाख करोड़ रुपये का था, वहीं सहकारी ढांचे पर आधारित दूध क्षेत्र का उत्पादन मूल्य 12.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
किसानों और सहकारी संस्थाओं द्वारा संचालित इस मॉडल की सफलता भविष्य के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण संकेत देती है। यही मॉडल किसानों की आय बढ़ाने के नए अवसर दे सकता है और जलवायु परिवर्तन जैसी दीर्घकालिक चुनौती से निपटने में भी सहायक हो सकता है। इसका एक प्रमुख विकल्प, कृषि भूमि से बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करना है जो आने वाले समय में किसानों के लिए आय का एक बड़ा स्रोत बन सकता है।
कृषि क्षेत्र में बिजली की दरों पर भारी सब्सिडी दी जाती है। अधिकांश किसान बिजली की वास्तविक लागत का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही चुकाते हैं जबकि कई राज्यों में उन्हें बिजली पूरी तरह निःशुल्क भी मिलती है। इसका परिणाम यह होता है कि बिजली वितरण कंपनियों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है। इन नुकसानों को कम करने का एक उपाय यह हो सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों की बिजली की आवश्यकताओं को स्थानीय स्तर पर ही पूरा किया जाए।
वास्तव में, कृषि भूमि को सौर ऊर्जा उत्पादन का स्रोत बनाकर जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। इसी मकसद से एग्रीवोल्टेइक्स (एग्री-पीवी) नाम की एक नई प्रणाली विकसित की गई है। इसमें उन खेतों के ऊपर पर्याप्त ऊंचाई पर सौर पैनल लगाए जाते हैं जहां ऐसी फसलें उगाई जाती हैं जो कम धूप में भी अच्छी तरह बनी रह सकती हैं। इस प्रकार एक ही भूमि का उपयोग खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन दोनों कामों के लिए किया जा सकता है।
केंद्र सरकार ने कुसुम योजना शुरू की है, जिसका मुख्य उद्देश्य किसानों को सिंचाई पंपों के लिए सौर ऊर्जा अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। हालांकि, इस योजना को उन राज्यों में चुनौती का सामना करना पड़ता है, जहां राज्य स्तरीय बिजली वितरण कंपनियां, किसानों को अत्यधिक रियायती दरों पर या मुफ्त बिजली उपलब्ध कराती हैं।
फिर भी, कुसुम योजना में एग्री-पीवी परियोजनाओं को भी सहायता देने का प्रावधान है। इन परियोजनाओं के अंतर्गत कृषि भूमि का दोहरा उपयोग किया जाता है। एक ओर उसी भूमि पर खेती जारी रहती है और दूसरी ओर सौर पैनलों के माध्यम से बिजली का उत्पादन कर उसे बाजार में बेचा जाता है। इस व्यवस्था से किसान अपनी भूमि से पहले की तुलना में अधिक आमदनी हासिल कर सकते हैं। कृषि भूमि का दोहरा उपयोग किसानों की आय बढ़ाने का एक प्रभावी और आकर्षक विकल्प बनकर उभर सकता है।
हाल ही में इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनैशनल इकनॉमिक रिलेशंस (इक्रियर) द्वारा किए गए एक अध्ययन में मध्य प्रदेश और राजस्थान में एग्रीवोल्टेइक मॉडल के क्रियान्वयन का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन के संयुक्त उपयोग से किसानों की आय में अच्छी वृद्धि हुई है।
अध्ययन का एक अन्य महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित करने के लिए बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में 15 एकड़ भूमि पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की लागत लगभग18.5 करोड़ रुपये आई जबकि राजस्थान में 3 एकड़ भूमि पर इसकी लागत लगभग 2 करोड़ रुपये रही। इतनी अधिक लागत को देखते हुए यदि इस मॉडल को केवल किसानों के भरोसे छोड़ दिया जाए तो इसका प्रभाव सीमित ही रहेगा।
इस स्थिति में कुछ सुधार निजी या व्यावसायिक डेवलपर के माध्यम से संभव है, जो किसानों की भूमि पर सौर परियोजनाएं स्थापित कर, उनसे होने वाली आय का एक हिस्सा भूमि मालिकों के साथ साझा करें। लेकिन वास्तविक परिवर्तन तभी संभव होगा, जब छोटे और मध्यम किसानों को सहकारी समितियों या उत्पादक कंपनियों के रूप में संगठित किया जाए। ऐसे सामुदायिक संगठन अपनी भूमि और संसाधनों को मिलाकर एग्री-पीवी मॉडल को अधिक प्रभावी ढंग से लागू कर सकते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में औसतन प्रत्येक किसान के पास केवल 1.08 हेक्टेयर कृषि भूमि है। इसलिए यदि केवल व्यक्तिगत किसानों पर निर्भर रहा जाए तब एग्री-पीवी की संभावनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा।
वर्तमान में एग्री-पीवी को बढ़ावा देने का कार्य मुख्यतः केंद्र सरकार की कुसुम योजना के माध्यम से किया जा रहा है जिसका संचालन सरकारी तंत्र करता है। लेकिन इतनी बड़ी पूंजी की आवश्यकता वाले इस मॉडल में सामुदायिक स्तर पर सहयोग अनिवार्य है। ऐसे में बेहतर होगा कि एग्री-पीवी परियोजनाओं के संचालन की व्यवस्था ऐसी संस्थाओं के हाथों में हो जिनमें किसानों की प्रत्यक्ष भागीदारी हो न कि केवल यह सरकारी अफसरशाही के नियंत्रण में हो।
इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण भी है। देश के विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु, मिट्टी और कृषि परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं। इसलिए एग्री-पीवी मॉडल को हर स्थान की स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाना होगा। साथ ही, यह तय करना कि कौन-सी फसलें कम धूप में भी अच्छी पैदावार दे सकती हैं। ऐसा निर्णय स्थानीय किसान ही बेहतर ढंग से ले सकते हैं न कि दूर बैठे सरकारी अधिकारी।
दूध से जुड़े क्षेत्र में सहकारी संस्थाओं की सफलता इस बात का प्रमाण है कि किसानों द्वारा संचालित संस्थाएं बड़े परिवर्तन ला सकती हैं। यही मॉडल केवल एग्री-पीवी के लिए ही नहीं बल्कि फल, सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों के उत्पादन एवं विपणन को बढ़ावा देने में भी उपयोगी हो सकता है जिनका उत्पादन अक्सर छोटे किसान करते हैं।
ऐसे में कृषि के आधुनिकीकरण और उत्पादन वृद्धि के लिए आवश्यक है कि सरकार अफसरशाही-आधारित योजनाओं पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय किसानों द्वारा संचालित सहकारी समितियों और उत्पादक कंपनियों जैसे संगठनों को अधिक महत्व दे। यही संस्थाएं किसानों की वास्तविक आवश्यकताओं को समझते हुए कृषि क्षेत्र में टिकाऊ और व्यापक परिवर्तन ला सकती हैं।