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बड़े बदलावों और आर्थिक झटकों का साल: कैसे 2025 ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की पुरानी नींव हिला दी

दुनिया की कारोबारी व्यवस्था और ढांचे को नए सिरे से आकार दिया जा रहा है। एआई में निवेश वैश्विक वृद्धि का वाहक बन चुका है। साल के अहम बदलावों की समीक्षा कर रहे हैं मिहिर शर्मा

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मिहिर एस शर्मा   
Last Updated- December 30, 2025 | 10:46 PM IST

आर्थिक नीतियों में बड़े बदलाव या किसी अर्थव्यवस्था की प्रमुख तकनीक में परिवर्तन का आंतरिक राजनीतिक गतिशीलता, संपत्ति वितरण और असमानता पर दीर्घकालिक और कभी-कभी अप्रत्याशित प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, धन की सहज उपलब्धता के युग ने परिसंपत्ति मूल्यों को अत्यधिक बढ़ा दिया और संपत्ति असमानताओं को गहराई से जड़ें जमाने दीं, जिससे लोक केंद्रित राजनीति और पीढ़ियों तथा शैक्षिक स्तरों के बीच राजनीतिक विभाजन पैदा हुए। अधिक स्वतंत्र व्यापार ने औद्योगिक देशों में भौगोलिक असमानताओं को जन्म दिया और भारत जैसे देशों में पारंपरिक तौर पर जमीन पर कब्जा रखने वाली जातियों और वर्गों द्वारा उपभोग की जाने वाली सामाजिक और राजनीतिक शक्ति को कम कर दिया। उस आर्थिक बदलाव की शुरुआत के दशकों बाद राजनीतिक प्रवृत्तियों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।

वर्ष 2025 कई मायनों में बहुत बड़े बदलाव वाला रहा। दुनिया भर में नीतिगत स्तर पर दो बड़े बदलाव हुए। इसके अलावा तकनीकी क्षेत्र में भी एक बड़ी घटना सामने आई। दुनिया की कारोबारी व्यवस्था और ढांचे को नए सिरे से आकार दिया जा रहा है। राजनीति लोगों के प्रवासन के विरुद्ध हो गई है और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस में निवेश वैश्विक वृद्धि का वाहक बन चुका है। इनमें से हर बात महत्त्वपूर्ण है लेकिन कई बार इनमें टकराव भी उत्पन्न हो जाता है।

डॉनल्ड ट्रंप के दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने से वैश्विक आर्थिक संरचना एक अधिक लेन-देन आधारित और कम जुड़ाव वाले दौर में पहुंच गई है। चीन के उदय ने पहले ही भारत, यूरोपीय संघ और अन्य जगहों पर व्यापार की गति पर कुछ प्रतिबंध लगाए थे, ताकि दूरसंचार और ऊर्जा जैसी महत्त्वपूर्ण अधोसंरचना की रक्षा की जा सके, या ऑटोमोबाइल जैसे रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण विनिर्माण क्षेत्रों को बनाए रखा जा सके। लेकिन ट्रंप ने यह तय कर दिया है कि व्यापारिक झड़पें द्विपक्षीय और स्थानीय न रहकर एक वैश्विक संघर्ष बन जाएं। अब यह एक विश्व युद्ध है, जिसमें हर महीने अप्रत्याशित विरोधी सामने आ रहे हैं। पिछले दिसंबर तक यह अनुमान लगाना कठिन होता कि एक वर्ष के भीतर मेक्सिको भारतीय कारों पर 50 फीसदी शुल्क लगा देगा।

कारोबारी स्वरूप का मूल सिद्धांत किफायत से सुरक्षा की ओर बदलने के भी कई बड़े प्रभाव पड़ेंगे। कीमतों में वृद्धि की प्रवृत्ति होगी। चूंकि केंद्रीय बैंक मध्यम स्तर की मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाए रखेंगे तो इसका अर्थ यह है कि कुछ व्यापार योग्य वस्तुएं अपेक्षाकृत महंगी हो जाएंगी। यानी कह सकते हैं कि अन्य व्यापार योग्य और गैर-व्यापार योग्य वस्तुएं अपेक्षाकृत सस्ती हो जाएंगी, और जो लोग उनका उत्पादन करते हैं उनकी क्रय शक्ति घट जाएगी। इसमें निम्नस्तरीय उद्यमशील सेवाओं के प्रदाता शामिल हो सकते हैं। उदाहरण के लिए पश्चिमी देशों में नाई, भारत में पकौड़ा बनाने वाले आदि।

समय के साथ, यह निर्धनता उन राजनीतिक गुटों की वृद्धि का कारण बनेगी जो सस्ती वस्तुओं तक पहुंच की मांग करेंगे। या अधिक संभावना है कि विशिष्ट क्षेत्रों पर केंद्रित कल्याण योजनाओं की मांग करेंगे। व्यापार अवरोध निश्चित रूप से नौकरियां पैदा करते हैं, लेकिन प्रत्येक नौकरी अन्य नागरिकों की आय और कल्याण की कीमत पर अत्यधिक महंगी होगी। समय के साथ, यह अपनी असंतुष्टि पैदा करेगा। इसके अतिरिक्त, यदि व्यापार अवरोधों से पैदा हुई नौकरियां कुछ विशेष क्षेत्रों में केंद्रित होंगी, तो यह भौगोलिक क्षेत्रों के बीच राजनीतिक असंतोष को और तीव्र करेगा।

पश्चिम के कई देशों में राजनीति लोगों की आवाजाही के भी उतनी ही खिलाफ हो गई है जितनी कि वस्तुओं की आवाजाही के। अमेरिका, जापान और यूरोप के कुछ हिस्सों में अब ऐसी सरकारें हैं जो प्रवासियों के विरुद्ध हैं। बहुत संभव है कि 2029 के समाप्त होते-होते ब्रिटेन, कनाडा और जर्मनी जैसे देशों में भी ऐसी सरकारें काबिज हो जाएं। ट्रंप प्रशासन ने जिस आक्रामक ढंग से लोगों को अपने देश से बाहर निकाला है वह व्यवहार पूरे पश्चिमी विश्व में सामान्य हो सकता है। इससे मध्यम अवधि में प्रवासन में कमी आएगी लेकिन इससे घरेलू स्तर पर भी असंतोष पैदा होगा।

आर्थिक दृष्टि से देखें तो यह उन क्षेत्रों को सीधे प्रभावित करेगा जो विदेशी श्रमिकों पर निर्भर हैं। इनमें स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र, कृषि और छोटी मोटी शहरी सेवाएं मसलन आपूर्ति करना आदि शामिल हैं। इन सेवाओं की लागत बढ़ेगी जिससे शहरी क्षेत्रों में असंतोष का भाव पैदा होने लगेगा। यूरोप में जहां ध्यान कम कौशल वाले कामों से प्रवासियों को दूर करने तथा उच्च कौशल वाले प्रवासियों के साथ छेड़छाड़ नहीं करने पर रहा है, वहीं बात यह भी है कि अमेरिका में एच-1बी वीजा जैसे कायक्रमों को निशाना बनाने वाले धुर दक्षिणपंथी जातीय राष्ट्रवादी शायद इससे संतुष्ट नहीं होंगे। उच्च कौशल वाले प्रवासियों को भी निशाने पर लिया जाएगा। यह तकनीकी विकास के लिए शुद्ध हानि होगी, क्योंकि उच्च-कौशल वाले समूह विकास के लिए आवश्यक हैं।

हालांकि स्थानीय स्तर पर प्रवासी स्रोत देशों में ऐसे केंद्र समृद्ध हो सकते हैं। उदाहरण के लिए भारत में बेंगलुरु। लेकिन उच्च कौशल वाले विकासशील देशों के संभावित प्रवासियों की औसत अपेक्षित आय घट जाएगी, क्योंकि पश्चिम में अवसर बंद हो रहे हैं। समृद्ध क्षेत्रों में होने वाली अतिरिक्त आय कंपनियों और निवेशकों को प्राप्त होगी, न कि इंजीनियरों या उद्यमियों को। वस्तुओं, तकनीक और लोगों की सीमाओं के पार आवाजाही पर आगे चलकर प्रतिबंध लग सकते हैं, लेकिन पूंजी की आवाजाही स्पष्ट रूप से बिना किसी बाधा के जारी रहेगी।

दूसरे शब्दों में, उत्पादक और कुशल श्रमिक अपने बाजारों को सीमित पाएंगे, जबकि वित्तीय क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए ऐसा नहीं होगा। इस असमानता का तार्किक परिणाम यह होगा कि वित्त पर मिलने वाले रिटर्न उत्पादन या मानव पूंजी में निवेश पर मिलने वाले रिटर्न की कीमत पर बढ़ेंगे। सामूहिक स्तर पर, यह कुछ अर्थव्यवस्थाओं को और असंतुलित कर सकता है, जो पहले से ही वित्तीय सेवाओं पर अत्यधिक निर्भर हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटेन।

अन्य अर्थव्यवस्थाओं में आंतरिक दबाव तब तक बढ़ते रहेंगे जब तक कि घरेलू बचतकर्ताओं को उन वित्तीय रिटर्न तक पहुंच नहीं प्रदान की जाती, जो अधिक गतिशील पूंजी को मिल रहे हैं। भारत जैसे देशों में, जहां सावधानी संबंधी मानदंड इसे रोकते हैं और अन्य भ्रामक नियामक चिंताएं विदेश में सूचकांकों में निवेश करने की क्षमता को भी सीमित करती हैं, इसे नियमित बचतकर्ताओं के शोषण या दमन के रूप में देखा जाएगा।

इन नीतिगत बदलावों के वैश्विक और घरेलू राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अपेक्षाकृत अनुमानित हैं, लेकिन उनके परस्पर संबंध नहीं। पश्चिमी देशों के डिलीवरी ऐप्स में निवेशक पूंजी के मुक्त प्रवाह के कारण अधिक पैसा कमा सकते हैं, भले ही उनकी विशिष्ट सेवाएं प्रवासन पर प्रतिबंधों के कारण अंतिम उपभोक्ताओं के लिए महंगी हो जाएं, जबकि ऐसी सेवा-आधारित क्षेत्रों की कीमत अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती है। हालांकि व्यापार गतिरोधों के कारण पहुंचाया जाने वाला वास्तविक भोजन महंगा हो सकता है। इस अस्थिर मिश्रण का अंतिम घटक आर्टिफिशल इंटेलिजेंस है।

सच तो यह है कि एआई में निवेश कई अर्थव्यवस्थाओं में विकास का प्रमुख घटक है। जब सहायक अधोसंरचना तैयार हो जाएगी, तो यह कुछ सेवाओं और प्रक्रियाओं की लागत को कम कर देगी, साथ ही उन सेवाओं की आपूर्ति श्रृंखला में कुछ मानव भूमिकाओं की जगह भी ले लेगी। लेकिन हम अभी तक नहीं जानते कि यह उत्पादकता को किस हद तक बढ़ाएगी, किन क्षेत्रों को अप्रासंगिक बना देगी, और इस निवेश से दीर्घकालिक रिटर्न का भौगोलिक और वर्गीय वितरण कैसा होगा।

First Published : December 30, 2025 | 9:40 PM IST