इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में वाराणसी के एक जर्जर मकान से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब बात जन सुरक्षा की हो, तो किराएदारी के अधिकारों के मुकाबले लोगों की जान बचाना ज्यादा जरूरी है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि किराएदार के पास कोई अधिकार नहीं हैं। कोर्ट ने दोहराया कि मकान मालिक की यह जिम्मेदारी है कि वह किराएदार को रहने लायक सुरक्षित घर मुहैया कराए।
भारत में किराएदारी कानून (Tenancy Law) बहुत स्पष्ट है। घर की मजबूती (स्ट्रक्चरल सेफ्टी), बिजली के फॉल्ट, और प्लंबिंग जैसी बड़ी समस्याओं को ठीक कराना मकान मालिक का काम है। चैंबर्स ऑफ भारत चुघ के पार्टनर मयंक अरोड़ा बताते हैं कि मकान मालिक अनुबंध (Contract) की अस्पष्ट शर्तों की आड़ लेकर इन जरूरी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते। वहीं, घर की छोटी-मोटी टूट-फूट की जिम्मेदारी किराएदार की होती है।
अगर मकान मालिक जरूरी मरम्मत कराने से मना कर दे, तो किराएदार खुद काम करवा सकता है, लेकिन इसके लिए कानून के बताए रास्ते पर चलना जरूरी है। एकॉर्ड जूरिस के मैनेजिंग पार्टनर अलेय रिज़वी के मुताबिक, किराएदार मरम्मत पर खर्च किए गए पैसे की कटौती तभी कर सकता है जब समस्या घर में रहने की सुविधा को प्रभावित कर रही हो और मकान मालिक ने लिखित अनुरोध को नजरअंदाज कर दिया हो।
गांधी लॉ एसोसिएट्स के पार्टनर राहील पटेल आगाह करते हैं कि अपनी मर्जी से किराए में कटौती करना जोखिम भरा हो सकता है। इसे कानूनन ‘किराया न देना’ माना जा सकता है और किराएदार को घर खाली करना पड़ सकता है।
विवादों से बचने के लिए एक्सपर्ट्स ने कुछ कदम सुझाए हैं:
लेगम सोलिस के संस्थापक शशांक अग्रवाल कहते हैं कि अक्सर किराएदार सिर्फ मौखिक बात करते हैं और खर्चों का कोई ठोस सबूत नहीं रखते। दिल्ली हाई कोर्ट की एडवोकेट प्राची दुबे के अनुसार, बिना अनुमति के घर में बदलाव करना या किराया पूरी तरह रोक देना भारी पड़ सकता है। वहीं, व्हाट्सएप जैसे अनौपचारिक संदेशों के बजाय औपचारिक नोटिस देना कानूनी रूप से ज्यादा मजबूत होता है।