आज के दौर में हम सभी पागलों की तरह भाग रहे हैं। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, बस एक ही धुन सवार रहती है कि ज्यादा से ज्यादा पैसे बचाया जाए। हम अपने बैंक बैलेंस को बढ़ता देख थोड़ा सुकून तो महसूस करते हैं, लेकिन क्या वाकई वह ‘मन की शांति’ मिल पाती है? शायद नहीं। अक्सर देखा गया है कि अकाउंट में लाखों रुपये होने के बावजूद कई लोग अपने भविष्य को लेकर डरे रहते हैं। वे इस उलझन में रहते हैं कि क्या यह पैसा काफी है? क्या अचानक कोई मुसीबत आई तो यह टिक पाएगा?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह एक कड़वी सच्चाई है कि सिर्फ नोट इकट्ठा कर लेने से ‘फाइनेंशियल सिक्योरिटी’ नहीं आती। असली सुरक्षा का अहसास तब होता है जब आपके पास एक सही सिस्टम और सही सोच हो।
आइए, एक्सपर्ट्स की नजर से समझते हैं कि आखिर बैंक बैलेंस बढ़ने के बाद भी हम खुद को असुरक्षित क्यों महसूस करते हैं।
आजकल की दुनिया ‘दिखावे’ पर ज्यादा और ‘दिखने’ पर कम टिकी है। जैनम ब्रोकिंग लिमिटेड के CBO पुलक कुमार सिंह इस पर एक बहुत गहरी बात कहते हैं। उनके मुताबिक, आजकल हमारी असुरक्षा की भावना केवल हमारी कमाई से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि हम दूसरों से खुद को कितना कंपेयर (तुलना) कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की लाइफस्टाइल देखकर हम अनजाने में ही अपनी बचत को कम आंकने लगते हैं।
पुलक का मानना है कि आज के दौर में जानकारी की कमी नहीं है, बल्कि जानकारी का ‘बोझ’ है। हर हाथ में मोबाइल है और हर मोबाइल में निवेश के ऐप्स। लोग पैसा बचा तो रहे हैं, लेकिन उनमें कॉन्फिडेंस (आत्मविश्वास) की कमी है। वे इस बात को लेकर हमेशा डरे रहते हैं कि क्या उनका निवेश महंगाई को मात दे पाएगा? क्या वे सिर्फ पैसा जमा कर रहे हैं या वाकई वे अमीर बन रहे हैं? जब तक इस सवाल का जवाब स्पष्ट नहीं होता, मन की शांति कोसों दूर रहती है।
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भारतीयों के खून में बचत करना शामिल है। हम दुनिया की उन चुनिंदा आबादियों में से हैं जो मुश्किल वक्त के लिए पैसा बचाकर रखते हैं। लेकिन SBI जनरल इंश्योरेंस के मार्केटिंग और CSR हेड, रथिन लाहिड़ी एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं कि भारत एक युवा देश है जहां औसत उम्र 28 साल है। आज का युवा ‘कल’ से ज्यादा ‘आज’ में जीने और संपत्तियां बनाने पर यकीन रखता है। ऐप्स और ‘अभी खरीदें, बाद में चुकाएं’ (Pay Later) जैसे विकल्पों ने बचत की दर को गिरा दिया है।
रथिन कहते हैं, “लोग बैंक डिपॉजिट के बजाय अब सीधे निवेश (जैसे SIP) की ओर भाग रहे हैं ताकि ज्यादा पैसा कमा सकें। लेकिन यहां एक बड़ी चूक हो रही है, वो है जोखिम का प्रबंधन यानी ‘रिस्क मैनेजमेंट’। अक्सर लोग निवेश तो कर देते हैं, लेकिन अपनी सेहत, अपने एक्सीडेंट या अपनी संपत्ति की सुरक्षा यानी इंश्योरेंस को नजरअंदाज कर देते हैं। जब तक आपके पास सुरक्षा का यह ‘बैकअप’ नहीं होगा, आपका निवेश हमेशा खतरे की जद में रहेगा और आप कभी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाएंगे।”
इसी पर स्क्वायर इंश्योरेंस के फाउंडर और MD राकेश कुमार कहते हैं, “बचत करना केवल एक आदत है, लेकिन असली सुरक्षा एक ढांचा (Structure) है। मान लीजिए एक परिवार हर महीने 15,000 रुपये बचाकर 5 साल में 9 लाख रुपये का फंड बना लेता है। यह सुनने में तो बहुत मजबूत लगता है, लेकिन आज के दौर में कैंसर या दिल की बीमारी का एक ही इलाज 5 से 25 लाख रुपये तक का हो सकता है। बिना इंश्योरेंस की ‘प्रोटेक्शन लेयर’ के, आपकी सालों की मेहनत और अनुशासन वाली बचत महज एक ‘बुरे दिन’ में पूरी तरह खत्म होकर आपको जीरो पर ला सकती है।”
पुलक इस पर एक अलग राय देते हैं। वे कहते हैं कि हमें खुद से यह नहीं पूछना चाहिए कि “मैं कितना बचा रहा हूं?” बल्कि यह पूछना चाहिए कि “अगले 20 साल में मेरा पैसा कैसे बढ़ेगा?” असली सुरक्षा तब आती है जब आपके पास पैसे का एक सिस्टम हो। उन्होंने इसे तीन भाग में बांटने की सलाह दी है:
ज्यादातर लोग सिर्फ ‘सेविंग’ करते हैं, यानी वे सिर्फ पैसा जमा करते हैं, उसे सही ‘बाल्टियों’ में नहीं डालते। यही वजह है कि जब भी मार्केट में हलचल होती है या कोई मेडिकल इमरजेंसी आती है, उनका पूरा सिस्टम हिल जाता है और उनकी मानसिक शांति छिन जाती है।
राकेश कुमार के मुताबिक, महंगाई लोगों की बचत और फाइनेंशियल प्लानिंग के लिए सबसे बड़ा छिपा खतरा बन चुकी है। उनका कहना है कि अगर महंगाई हर साल 6% की रफ्तार से बढ़ती रही, तो आज के 1 लाख रुपये की कीमत 10 साल बाद घटकर करीब 56 हजार रुपये जितनी रह जाएगी। सबसे ज्यादा चिंता हेल्थकेयर खर्चों की है, क्योंकि इलाज और मेडिकल सेवाओं की महंगाई 12 से 14% तक बढ़ रही है। यानी जिस सर्जरी का खर्च आज 3 लाख रुपये है, वही आने वाले 10 साल में 10 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसे में अगर आपकी बचत और हेल्थ कवर उसी हिसाब से नहीं बढ़ रहे, तो भविष्य में आर्थिक दबाव काफी बढ़ सकता है।
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निवेश करना अच्छी बात है, लेकिन बिना किसी लक्ष्य के निवेश करना वैसा ही है जैसे आप बिना नक्शे के सफर पर निकल पड़े हों। रथिन सुझाव देते हैं कि हमें अपनी मानसिकता को ‘साधारण बचत’ से हटाकर ‘लक्ष्य-आधारित निवेश’ (Goal-based Investing) पर ले जाना होगा।
रथिन कहते हैं, “जब आप अपनी बचत को बच्चों की पढ़ाई, घर खरीदने या रिटायरमेंट जैसे खास लक्ष्यों से जोड़ते हैं, तो पैसों को लेकर आपकी सोच ज्यादा साफ और व्यवस्थित हो जाती है। साथ ही अगर आप अपनी बचत का थोड़ा हिस्सा हेल्थ इंश्योरेंस या पर्सनल एक्सीडेंट कवर पर खर्च करते हैं, तो यह आपकी पूरी फाइनेंशियल प्लानिंग को ज्यादा सुरक्षित और मजबूत बना देता है।”
वो आगे बताते हैं कि आज के दौर में AI और बदलती अर्थव्यवस्था की वजह से नौकरियों में काफी उतार-चढ़ाव है। ऐसे में इंश्योरेंस आपको वह मजबूती देता है कि अगर कल को कोई अनहोनी हुई, तो आपके परिवार को दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा। यही वह सुरक्षा का अहसास है जो करोड़ों रुपये के बैंक बैलेंस से भी ऊपर है। असली फाइनेंशियल सिक्योरिटी केवल नोटों की गड्डी में नहीं, बल्कि इस बात के सुकून में है कि “चाहे जो हो जाए, मैं और मेरा परिवार सुरक्षित है।”