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मकान मालिक सिक्योरिटी मनी लौटाने से मना कर रहा है? जानें क्या कहता है देश का नया किराया कानून

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देश के मेट्रो शहरों में भारी सिक्योरिटी डिपॉजिट बड़ी समस्या है। कानून होने के बावजूद घर खाली करते वक्त मकान मालिक किरायेदार को परेशान करते हैं

Last Updated- May 11, 2026 | 7:16 PM IST
Tenancy
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

देश के बड़े शहरों में घर तलाशना किसी जंग जीतने से कम नहीं है, लेकिन घर मिलने के बाद जो सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है, वह है भारी-भरकम ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे मेट्रो शहरों में मकान मालिक आज भी छह से दस महीने तक का किराया एडवांस के तौर पर मांग रहे हैं। यह स्थिति तब है जब केंद्र सरकार आदर्श किराया कानून (Model Tenancy Act, 2021) के जरिए इस बोझ को कम करने की कोशिश कर चुकी है।

क्या कहता है कानून और क्या है हकीकत?

केंद्र सरकार के ‘मॉडल टेनेंसी एक्ट 2021’ के मुताबिक, रिहायशी घरों (Residential Properties) के लिए मकान मालिक अधिकतम दो महीने का किराया ही सिक्योरिटी डिपॉजिट के रूप में ले सकते हैं। वहीं कमर्शियल प्रॉपर्टी के लिए यह सीमा छह महीने तय की गई है।

लेकिन पेंच यह है कि यह कानून केवल एक ढांचा (फ्रेमवर्क) है। यह तभी लागू होता है जब राज्य सरकारें इसे अपने यहां अपनाती हैं। लेगम सोलिस के सीनियर एसोसिएट साहिल शर्मा बताते हैं, “मॉडल टेनेंसी एक्ट के नियमों के अनुसार, आवासीय परिसर के मामले में सिक्योरिटी डिपॉजिट दो महीने के किराए से अधिक नहीं होनी चाहिए। हालांकि, कई राज्यों ने अभी तक इसे पूरी तरह लागू नहीं किया है।”

PSL एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के पार्टनर सोयिब कुरैशी के मुताबिक भारत में सिक्योरिटी डिपॉजिट के लिए पूरे देश में एक जैसी कोई तय सीमा नहीं है, क्योंकि मकान मालिक और किरायेदार के नियम हर राज्य के हिसाब से अलग-अलग होते हैं। इसी वजह से बेंगलुरु जैसे शहरों में आज भी मकान मालिक 10 महीने तक का डिपॉजिट मांग लेते हैं और यह आम बात बन चुकी है।

Also Read: लाखों की बचत के बाद बना रहता है डर? एक्सपर्ट से समझें फाइनेंशियल सिक्योरिटी का सीक्रेट

मकान मालिक कब और कितनी कटौती कर सकता है?

अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जब किरायेदार घर खाली करता है, तो मकान मालिक सिक्योरिटी डिपॉजिट का बड़ा हिस्सा काट लेते हैं। लेकिन कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक मकान मालिक अपनी मनमर्जी से पैसे नहीं काट सकता। डिपॉजिट से कटौती सिर्फ तभी की जा सकती है जब कोई असली नुकसान हुआ हो या फिर कोई बकाया रकम हो।

कानूनी तौर पर इन चीजों के लिए पैसे काटे जा सकते हैं:

  • बकाया किराया या बिजली-पानी के बिल।
  • घर की फिटिंग या फर्नीचर को हुआ नुकसान।
  • सामान्य टूट-फूट से अलग कोई बड़ी टूट-फूट।
  • रेंट एग्रीमेंट में लिखी गई विशेष शर्तें।

एकॉर्ड जुरिस के मैनेजिंग पार्टनर अलय रजवी के मुताबिक, मकान मालिक सिर्फ वही रकम काट सकता है जो सही हो, समझौते के अनुसार हो और असली नुकसान पर आधारित हो।

यहां सबसे अहम बात यह है कि ‘नॉर्मल वियर एंड टियर’ यानी सामान्य घिसावट, जैसे दीवारों का हल्का रंग फीका पड़ जाना या सामान का समय के साथ पुराना हो जाना, इसका खर्च किरायेदार पर नहीं डाला जा सकता।

सोयिब कुरैशी का कहना है कि सिर्फ पेंटिंग के नाम पर पूरी सिक्योरिटी डिपॉजिट रख लेना या मनमर्जी से कटौती करना कानून के हिसाब से गलत है।

विवाद होने पर किरायेदार क्या करें?

अगर मकान मालिक सिक्योरिटी डिपॉजिट लौटाने में टालमटोल करे या गलत तरीके से पैसे काट ले, तो किरायेदार को चुप नहीं रहना चाहिए। बी. शंकर एडवोकेट्स एलएलपी के मैनेजिंग पार्टनर बी. श्रवणथ शंकर के मुताबिक, नुकसान साबित करने की जिम्मेदारी मकान मालिक की होती है। उन्हें बिल, रसीद, फोटो या अन्य सबूत दिखाकर यह साबित करना होगा कि नुकसान किरायेदार की वजह से हुआ है।

विवाद की स्थिति में अपनाएं ये कदम:

  1. कानूनी नोटिस: सबसे पहले मकान मालिक को एक औपचारिक कानूनी नोटिस भेजें। इसमें डिपॉजिट की वापसी और कटौती का हिसाब मांगें।
  2. रेंट अथॉरिटी: जिन राज्यों ने नए कानून अपना लिए हैं, वहां आप रेंट कोर्ट या ट्रिब्यूनल जा सकते हैं।
  3. सिविल सूट: अन्य राज्यों में सिविल रिकवरी सूट फाइल किया जा सकता है।
  4. ब्याज और मुआवजा: किरायेदार देरी से मिले रिफंड पर ब्याज और मानसिक परेशानी के लिए मुआवजे की मांग भी कर सकते हैं।

डी. एम. हरीश एंड कंपनी LLP की एडवोकेट प्रिया गडा का कहना है कि अगर मकान मालिक गलत तरीके से पैसे काटता है, तो किरायेदार को पहले एक औपचारिक कानूनी नोटिस भेजकर हर कटौती का पूरा और साफ-साफ हिसाब (itemised explanation) मांगना चाहिए।

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बिना नए कानून वाले राज्यों में क्या है सुरक्षा?

जहां अभी नया मॉडल टेनेंसी एक्ट लागू नहीं हुआ है, वहां भी किरायेदार पूरी तरह असुरक्षित नहीं हैं। ऐसे मामलों में पुराने कानून अभी भी लागू रहते हैं, जैसे दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट, महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट और कर्नाटक रेंट एक्ट। इसके अलावा इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 और ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 के तहत भी किरायेदारों को कानूनी सुरक्षा मिलती है।

एक्सपर्ट की सलाह: सावधानी ही बचाव

जानकारों का मानना है कि किरायेदार को घर लेते समय और छोड़ते समय कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए:

  • लिखित समझौता: हमेशा रजिस्टर्ड रेंट एग्रीमेंट करवाएं।
  • फोटोग्राफी: घर में घुसते वक्त और उसे खाली करते वक्त की फोटो और वीडियो जरूर लें ताकि बाद में नुकसान के दावों को चुनौती दी जा सके।
  • डॉक्यूमेंट: हर भुगतान की रसीद रखें और बातचीत को ईमेल या मैसेज (लिखित) पर रखें।

शंकर के मुताबिक, अदालतें आम तौर पर बहुत ज्यादा या मनमाने तरीके से लिए गए सिक्योरिटी डिपॉजिट को सही नहीं मानतीं। इसलिए भले ही बाजार में 10 महीने तक का डिपॉजिट लेने का चलन हो, लेकिन किरायेदार कानून और सही बातचीत के जरिए अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं।

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First Published - May 11, 2026 | 7:16 PM IST

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