प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
जब दो युवा भाई-बहन, रिशिता और सुचेत कपूर, ने अपने पिता को कोर्ट में घसीटा ताकि उनकी PHD और बीटेक की पढ़ाई के लिए पैसे मिल सकें, तो ये बात मध्यमवर्गीय भारत के दिल को छू गई। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला, जो कुछ दिन पहले आया, ने एक बार फिर इस सवाल को हवा दी कि बच्चे बड़े होने के बाद माता-पिता की आर्थिक जिम्मेदारी कहां तक रहती है।
कोर्ट ने आंशिक रूप से भाई-बहन के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने सुचेत को 18 साल की उम्र तक हर महीने करीब 8,000 रुपये का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। याचिका दायर करने के समय वह नाबालिग था। लेकिन रिशिता को कोई राहत नहीं मिली, क्योंकि वह पहले से ही बालिग थी।
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और सुशील कुकरेजा की बेंच ने कहा कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 125 (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 144) के तहत, एक पिता की कानूनी जिम्मेदारी बच्चे के बालिग होने पर खत्म हो जाती है, बशर्ते बच्चा शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम न हो।
हालांकि, हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956 की धारा 20(3) के तहत, एक अविवाहित बेटी, जो अपनी आय या संपत्ति से खुद का खर्च न उठा सके, अपने पिता से गुजारा भत्ता मांग सकती है, चाहे उसकी उम्र कुछ भी हो। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि भले ही कानूनी जिम्मेदारी खत्म हो जाए, लेकिन बच्चों की पढ़ाई में मदद करना एक पिता का नैतिक कर्तव्य बना रहता है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील बी. श्रवंत शंकर का कहना है कि यह फैसला ‘न तो पुराने कानून से अलग है और न ही कोई खतरनाक मिसाल कायम करता है।’ कोर्ट ने कानून को ‘सटीकता के साथ’ लागू किया और सुचेत को सिर्फ नाबालिग रहने तक राहत दी।
शंकर बताते हैं, “बालिग बच्चों की मदद करने की जिम्मेदारी सिर्फ नैतिक है, कानूनी नहीं।”
वो कहते हैं कि भले ही HAMA के तहत अविवाहित बेटी गुजारा भत्ता मांग सकती है, लेकिन ‘हमारे समाज में अक्सर एक महिला की आर्थिक निर्भरता पिता से पति तक चली जाती है। सच्ची आजादी का रास्ता अभी लंबा है।’
वो परिवारों को सलाह देते हैं कि नैतिक और आर्थिक जिम्मेदारियों को पहले से संतुलित करें। “सही निवेश और लंबी अवधि की प्लानिंग से ऐसी मुश्किलें टाली जा सकती हैं, जिससे परिवार में रिश्ते खराब न हों।”
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लिगम सोलिस के संस्थापक शशांक अग्रवाल कहते हैं कि यह फैसला ‘HAMA, हिंदू विवाह अधिनियम और CrPC के तहत गुजारा भत्ता के प्रावधानों में अंतर को साफ करता है।’
वो एक पुराने फैसले का जिक्र करते हैं, “पिता ने अगर अपनी मर्जी से, कानूनी हक से ज्यादा पैसे दिए, तो वो बच्चों से वापस नहीं मांग सकता। ये उसका नैतिक कर्तव्य है, भले कानूनी न हो।”
अकॉर्ड जुरिस के मैनेजिंग पार्टनर अले रजवी बताते हैं, “कोई बच्चा CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के तहत 18 साल तक गुजारा भत्ता मांग सकता है। अगर शारीरिक या मानसिक अक्षमता हो, तो ये उम्र सीमा बढ़ सकती है। अविवाहित बेटी HAMA की धारा 20(3) के तहत पढ़ाई या शादी के लिए पैसे मांग सकती है, अगर वो खुद का खर्च न उठा सके।”
रजवी कहते हैं, “याचिकाकर्ता को रिश्ता, उम्र, पढ़ाई में दाखिला और खुद का खर्च न उठा पाने का सबूत देना होगा।” कोर्ट पिता की आय और महंगाई को भी ध्यान में रखता है।
कपूर भाई-बहन का मामला भले ही कानून में नया न हो, लेकिन इसने कानूनी हक और नैतिक जिम्मेदारी के बीच की बारीक लकीर को उजागर किया है। भारतीय परिवारों के लिए ये एक सही वक्त पर आया सबक है कि कोर्ट गुजारा भत्ता लागू कर सकता है, लेकिन आपसी समझ और आर्थिक प्लानिंग ही ऐसे विवादों को रोक सकती है।