धीरज खन्ना ने आदित्य बिड़ला हाउसिंग फाइनैंस से 29 लाख रुपये का आवास ऋण (होम लोन) लिया और साथ में लिबर्टी जनरल इंश्योरेंस से ‘हाउस प्रोटेक्शन पॉलिसी’ भी खरीद ली। कुछ समय बाद उनके फ्लैट में काफी परेशानी निकल आईं, जैसे फर्श धंस जाना, छत का रंग-रोगन उड़ जाना और बाथरूम के टाइल्स भी धंस जाना। उन्होंने फ्लैट की मरम्मत कराई और 6.18 लाख रुपये का दावा बीमा कंपनी के पास डाल दिया। उन्होंने चोरी की एक घटना की भी जानकारी दी। मगर जिला आयोग का फैसला उनके खिलाफ आया।
चंडीगढ़ केंद्रशासित क्षेत्र के राज्य उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग ने इस फैसले का कुछ हिस्सा खारिज कर दिया। जिला आयोग ने इस नुकसान को सीपेज (सीलन) कहा था। मगर राज्य आयोग ने कहा कि यह नुकसान फर्श के नीचे पानी के रिसाव (लीकेज) से हुआ है, जो बीमा पॉलिसी के दायरे से बाहर नहीं है। उसने यह भी कहा कि बीमा कंपनी यह साबित करने में नाकाम रही है कि इस मामले में हुआ नुकसान पॉलिसी के दायरे में नहीं आता है। आयोग ने ब्याज, मुआवजे और खर्च के साथ खन्ना को 3.86 लाख रुपये अदा किए जाने का आदेश दिया। लेकिन आयोग ने चोरी का दावा खारिज कर दिया क्योंकि खन्ना ने पुलिस में इसकी शिकायत देर से की थी।
इस फैसले से पता चलता है कि बीमा पॉलिसी की शर्तों में बताया गया बारीक अंतर कितना अहम होता है, जैसे सीपेज और लीकेज के बीच अंतर। घर के बीमा में आम तौर पर सीपेज शामिल नहीं होता मगर लीकेज को बीमा के दायरे में रखा जाता है।
एसकेवी लॉ ऑफिसेज के वकील निहाल भारद्वाज का कहना है, ‘जब बाहर से धीरे-धीरे लंबे अरसे तक नमी भीतर पहुंचती रहती है तो उसे सीपेज कहा जाता है। लीकेज तब कहलाती है, जब ढांचे के भीतर मौजूद पाइप या पानी से जुड़े उपकरण खराब होने या फटने पर अचानक नुकसान होता है।’
सहजमनी डॉट कॉम के संस्थापक और सेबी पर पंजीकृत निवेश सलाहकार अभिषेक कुमार कहते हैं, ‘यदि बीमा कंपनी ने पानी के पाइप या उपकरणों में अचानक आई खराबी को तकनीकी सबूत दिए बगैर सीपेज बता दिया है और दावा खारिज कर दिया है तो गृहस्वामी उसे चुनौती दे सकते हैं।’
फैसले से एक जरूरी कानूनी सिद्धांत भी साबित हो जाता है। एलारा लॉ ऑफिसेज में पार्टनर सुप्रिया मजूमदार बताती हैं, ‘कोई भी दावा बीमा के दायरे से बाहर है, यह साबित करने का जिम्मा केवल बीमा कंपनी का ही है।’
लेजम सॉलिस के संस्थापक शशांक अग्रवाल एक उदाहरण से समझाते हैं, ‘मान लीजिए कि आगजनी को बीमा के दायरे में नहीं रखा गया है तो बीमा कंपनी को साबित करना होगा कि पॉलिसीधारक ने जानबूझकर आग लगाई है।’
अग्रवाल के बताए उदाहरण पर जाएं तो यह समझना वाकई बहुत जरूरी है कि क्या बीमा के दायरे में है और क्या उससे बाहर है। हिंसा के साथ जबरन प्रवेश का सबूत दिया जाए तो डकैती को बीमा के दायरे में रखा जाता है। भारद्वाज कहते हैं, ‘अगर ऐसा नहीं हुआ है तो दावा खारिज कर दिया जाता है।’
लेकिन परिवार का कोई सदस्य या घरेलू कर्मचारी या दफ्तर का कर्मचारी ही घर में चोरी कर ले तो बीमा कंपनी उसकी भरपाई नहीं करती। आनंद राठी इंश्योरेंस ब्रोकर्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट शंकर राम अन्नूर समझाते हैं, ‘मकान मालिक को डकैती या चोरी का पता लगते ही फौरन पुलिस के पास जाकर प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कर देनी चाहिए। इसके बाद तुरंत बीमा कंपनी को भी इस बारे में बताना चाहिए।’
आग से हुआ नुकसान इस बीमा में आता है। इंश्योरेंस समाधान की सह-संस्धापक और मुख्य परिचालन अधिकारी (सीओओ) शिल्पा अरोड़ा बताती हैं, ‘लेकिन अगर पॉलिसीधारक की संपत्ति को किसी सरकारी विभाग के आदेश पर जलाया गया है तो वह नुकसान बीमा के दायरे में नहीं आता।’ अगर मकान मालिक ने ऐड-ऑन नहीं खरीदा है तो बिजली खराब होने के कारण लगी आग भी पॉलिसी से बाहर हो सकती है।
शिल्पा कहती हैं, ‘भूस्खलन या पहाड़ गिरने से होने वाला नुकसान बीमा के दायरे में आता है मगर सामान्य दरारें, चटखन, खराब डिजाइन और काम और घटिया सामग्री के कारण हुआ नुकसान इसमें शामिल नहीं किया जाता।’
घर के बीमा की पॉलिसी में लापरवाही, खराब रखरखाव, लगातार इस्तेमाल और जंग तथा गलन से होने वाले नुकसान को भी शामिल नहीं किया जाता। बीमा खरीदने वाले के द्वारा या उसकी मिलीभगत से जानबूझकर किए गए आपराधिक कृत्यों को भी बीमा से बाहर रखा जाता है। जंग, परमाणु हादसे, हमले या आतंकवाद के कारण हुआ नुकसान भी बीमा में नहीं आता। तय सीमा से अधिक कीमत की नकदी या गहनों को भी बीमा से बाहर रखा जाता है।
ग्राहकों को समझना चाहिए कि कौन से नुकसान पॉलिसी में आ रहे हैं, किनके लिए ऐड-ऑन खरीदने पड़ेंगे और कौन बीमा पॉलिसी से पूरी तरह बाहर हैं। बीमा पॉलिसी कौन ले रहा है, यह भी अहमियत रखता है। मकान के मालिक को ही बीमा पॉलिसी खरीदनी चाहिए। सेक्योर नाउ इंश्योरेंस ब्रोकर के सह-संस्थापक कपिल मेहता कहते हैं, ‘इससे न तो कोई भ्रम बचता है और न ही दावा खारिज करने का आधार कंपनी को मिल पाता है।’ पॉलिसी खरीदने वाले को रीइंस्टेटमेट वैल्यू (मकान को दोबारा बनाने में आने वाला खर्च) और मार्केट वैल्यू (मकान की उम्र के हिसाब से घटी हुई कीमत) के बीच अंतर भी समझना चाहिए। कई लोग मकान का बीमा पुनर्निर्माण की लागत के बजाय मार्केट वैल्यू यानी बाजार मूल्य पर करा देते हैं। अभिषेक कुमार के मुताबिक इस सूरत में प्रो-राटा निपटारा हो सकता है, जिसमें कुल नुकसान का एक हिस्सा ही अदा किया जाता है।
बीमा खरीदते समय सही जानकारी भी देनी चाहिए मसलन मकान के ढांचे में पहले से कोई दिक्कत तो नहीं है और मकान में मरम्मत आदि तो नहीं कराई है। ऐसा नहीं करेंगे तो बीमा पॉलिसी अवैध करार दी जा सकती है। मेहता की सलाह है कि किसी तरह की गलतफहमी से बचने के लिए पॉलिसी खरीदते समय ही बेसमेंट और छत आदि की जानकारी भी दे दी जानी चाहिए।
यदि मकान में कोई व्यावसायिक गतिविधि चल रही है तो उससे दावे पर असर पड़ सकता है, इसलिए उसकी जानकारी भी पहले ही दे दी जानी चाहिए। अगर आप मकान के सामान का बीमा करा रहे हैं तो कीमती सामान की अलग सूची बना लीजिए।
अंत में पॉलिसी खरीदते समय उसे ठीक से पढ़ना चाहिए और उसमें दी गई शर्तों पर ही चलना चाहिए। अग्रवाल समझाते हैं, ‘इससे उन्हें समय पर और बीमा पॉलिसी की शर्तों के अनुसार दावे करने में आसानी रहेगी और दावा खारिज होने की गुंजाइश ही नहीं बचेगी।’