पिछले दो दिनों के दौरान इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के शेयरों में खरीदारी बढ़ी है। वित्त मंत्री द्वारा विद्युत संयंत्रों, सड़क और रेलवे जैसी सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की बिक्री के लिए 6 लाख करोड़ रुपये की योजना शुरू किए जाने के बाद इन शेयरों में तेजी दिखी है। निफ्टी इन्फ्रास्ट्रक्चर सूचकांक पिछले दो दिनों में 1.2 प्रतिशत चढ़ा है।
अदाणी पोटï्र्स ऐंड सेज, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और ओएनजीसी के शेयरों में दो दिनों के दौरान 7.8 प्रतिशत, 5 प्रतिशत और 3.5 प्रतिशत की तेजी आई। जहां रैमको सीमेंट्स, अंबुजा सीमेंट्स और अल्ट्राटेक जैसी सीमेंट कंपनियों के शेयरों में 0.4 प्रतिशत से 2.5 प्रतिशत के बीच तेजी आई, वहीं समान अवधि में लार्सन ऐंड टुब्रो में 0.8 प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई। नैशनल मोनेटाइजेशन प्लान (एनएमपी) का उद्देश्य नई परियोजनाओं के वित्त पोषण के मकसद से सरकार के पुराने इन्फ्रास्ट्रक्चर की बिक्री करना है। एनएमपी योजना के पीछे मुख्य उद्देश्य मौजूदा पुरानी इन्फ्रास्ट्रक्चर परिसंपत्तियों की बिक्री कर ज्यादा राजस्व जुटाना और इस अतिरिक्त राजस्व का इस्तेमाल नए इन्फ्रास्ट्रक्चर ढांचे के निर्माण पर करना है। विश्लेषकों का कहना है कि महामारी शुरू होने के बाद से ही पूंजीगत खर्च पर जोर दिया गया है और खासकर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निवेश सरकार की प्राथमिकता में शामिल है।
निर्मल बांग में शोध विश्लेषक टेरेसा जॉन ने एक रिपोर्ट में कहा है, ‘अनुभवी इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेशकों को बिक्री कार्यक्रम का लाभ मिलने की संभावना है, जबकि घरेलू ईपीसी कंपनियों, विद्युत पारेषण कंपनियों, सीमेंट निर्माताओं आदि को सरकार द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च से फायदा होने की संभावना है।’
हालांकि इन कंपनियों के लिए लाभ तुरंत नहीं मिल सकता है और यह योजना के सफल क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। सरकार ने वित्त वर्ष 2022 में 88,190 करोड़ रुपये, वित्त वर्ष 2023 में 162,422 करोड़ रुपये, वित्त वर्ष 2024 में 179,544 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2025 में 167,345 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियों की बिक्री करने की योजना बनाई है।
मोतीलाल ओसवाल सिक्योरिटीज में खुदरा शोध प्रमुख सिद्घार्थ खेमका ने कहा, ‘यह सरकार के नजरिये में बड़ा बदलाव है और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए एक सकारात्मक घटनाक्रम है। हालांकि स्थिति पूरी तरह इस पर निर्भर करेगी कि कैसे इस योजना पर अमल किया जाए। हमें नियम और शर्तें, राजस्व विभाजन और अन्य विवरण देखने होंगे।’
भारत और एशिया (जापान को छोड़कर) के लिए नोमुरा की मुख्य अर्थशास्त्री सोनल वर्मा ने अरोदीप नंदी के साथ एक रिपोर्ट में कहा है, ‘हमें यह भी भरोसा है कि निजी क्षेत्र की दिलचस्पी भी रियायत की अवधि, विवाद समाधान के संस्थागत व्यवस्था, परियोजनाएं वाणिज्यिक दरों पर संचालित करने की क्षमता, नियामकीय और कराधान समस्याओं जैसे अन्य कारकों पर भी निर्भर करेगी।’