इस बार जून तिमाही यानी Q1-FY26 में भारतीय कंपनियों के नतीजे कमजोर रहने के आसार हैं। निफ्टी कंपनियों की सालाना मुनाफा ग्रोथ सिर्फ 5% रहने की संभावना जताई जा रही है, जबकि यदि मेटल और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को छोड़ दिया जाए तो यह ग्रोथ गिरकर 4% के करीब रह जाएगी। Valentis Advisors के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर, ज्योतिवर्धन जयपुरिया के अनुसार, यह हालात ऐसे समय में सामने आ रहे हैं जब बैंकिंग और ऑटो जैसे बड़े सेक्टर खुद दबाव में हैं, और पूरी निफ्टी की कमाई को पीछे खींच रहे हैं।
सबसे बड़ा झटका प्राइवेट बैंकिंग सेक्टर से आने वाला है, जो लगातार दूसरी तिमाही में मुनाफा गिरावट दर्ज कर सकता है। मार्च 2020 के बाद यह पहला मौका है जब यह सेक्टर दो तिमाहियों तक निगेटिव ट्रेंड दिखाएगा। इसी के साथ PSU यानी सरकारी बैंकों के मुनाफे में भी सिर्फ 5% की ग्रोथ की उम्मीद है, जो पिछले 20 क्वार्टर्स में सबसे कम मानी जा रही है। वहीं, ऑटो सेक्टर की हालत भी कमजोर बनी हुई है। अनुमान है कि जून तिमाही में ऑटो सेक्टर का मुनाफा 10% घटेगा, जो सेक्टर की मांग और लागत के संतुलन में कमजोरी को दर्शाता है।
कमजोर नतीजों के बीच राहत की बात है कि फार्मा और केमिकल जैसे सेक्टर अभी भी कुछ मजबूती दिखा सकते हैं। फार्मा सेक्टर से 11% सालाना ग्रोथ की उम्मीद है, हालांकि यह भी बीते 8 तिमाहियों के औसतन 15%+ ग्रोथ से नीचे है। वहीं केमिकल सेक्टर में 10% ग्रोथ की संभावना है, और यह इस सेक्टर के लिए लगातार दूसरी सकारात्मक तिमाही होगी, जो इससे पहले 7 तिमाहियों तक गिरावट में था।
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इस बात को ध्यान में रखते हुए, आने वाले क्वार्टर्स में कंपनियों की कमाई (earnings growth) को प्रभावित करने वाले छह बड़े कारण कौन होंगे, आइए जानते हैं।
जयपुरिया बताते हैं कि मौजूदा समय में कम मुद्रास्फीति (Low Inflation) भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राहत की बात जरूर है, लेकिन यह नाममात्र GDP ग्रोथ (Nominal GDP) को धीमा कर देती है। और जब Nominal GDP घटती है, तो कंपनियों की रेवेन्यू ग्रोथ भी प्रभावित होती है। FY26 में भारत की वास्तविक GDP ग्रोथ मजबूत रहने की संभावना है, लेकिन Nominal GDP ग्रोथ सिर्फ 9% रहने का अनुमान है, जो बीते 20 सालों में सबसे निचले स्तरों में से एक है। FY20 को छोड़ दें और कोविड से प्रभावित FY21 को अलग रखें तो यह काफी कमजोर आंकड़ा है।
निफ्टी इंडेक्स में बैंकिंग सेक्टर की हिस्सेदारी एक-तिहाई से ज्यादा है। ऐसे में अगर इस सेक्टर का प्रदर्शन कमजोर हो तो यह पूरे इंडेक्स की ग्रोथ को नीचे खींच लेता है। पिछले कुछ सालों में बैंकिंग सेक्टर के अच्छे प्रदर्शन के पीछे कम NPA, कम provisioning और अच्छे Net Interest Margin (NIM) थे। लेकिन अब ब्याज दरें नीचे जा रही हैं, जिससे NIMs दबाव में हैं और बैंकों की कमाई कमजोर हो रही है। इस वजह से पूरी निफ्टी की मुनाफा ग्रोथ सुस्त दिखाई दे रही है।
FY26 में कंपनियों की औसत EBITDA मार्जिन 21.8% रहने की उम्मीद है, जो पिछले 10 सालों का सबसे ऊंचा स्तर है। इसका मतलब है कि अब मुनाफा बढ़ाने के लिए मार्जिन में ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। जयपुरिया कहते हैं कि अब आगे मुनाफा ग्रोथ का बोझ रेवेन्यू ग्रोथ को उठाना होगा, जो कि Nominal GDP स्लोडाउन के चलते और मुश्किल बन सकता है।
अमेरिका में 1 अगस्त से डोनाल्ड ट्रंप अगर फिर से टैरिफ लागू करते हैं, तो यह पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नेगेटिव हो सकता है। इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ सकती है और वहां की अर्थव्यवस्था स्लो डाउन की ओर जा सकती है। लेकिन भारत पर इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौता (Trade Pact) किस रूप में होता है। जयपुरिया का मानना है कि अगर भारत पर टैरिफ 15% के आसपास रहता है और बाकी प्रतिस्पर्धी देशों पर 20-30% तक है, तो यह भारत के लिए तुलनात्मक रूप से फायदेमंद स्थिति बन सकती है।
आने वाले महीनों में उपभोग (Consumption) में सुधार देखने को मिल सकता है। जयपुरिया बताते हैं कि इसके पीछे तीन प्रमुख कारण होंगे। पहला – अच्छा मानसून। इसकी वजह से बुआई बेहतर हुई है और ग्रामीण आय में इजाफा हो सकता है। दूसरा – ₹1 लाख करोड़ का टैक्स ब्रेक जो फरवरी 2025 के बजट में दिया गया था, वह शहरी उपभोग को सहारा देगा। तीसरा – कम ब्याज दरें, जिससे EMI कम होगी और लोग अधिक खर्च करने में सक्षम होंगे।
जहां आम राय यह है कि भारत में सिर्फ सरकार ही पूंजीगत खर्च (Capex) कर रही है, वहीं जयपुरिया इससे अलग राय रखते हैं। उनका कहना है कि सरकार ने FY26 की शुरुआत में ही तेजी से कैपेक्स खर्च किया है — लेकिन इससे भी ज्यादा सकारात्मक संकेत यह है कि निजी क्षेत्र (Private Sector) ने भी बीते दो वर्षों में अपने Capex को तेज किया है। FY22 में लिस्टेड कंपनियों का कैपेक्स नॉमिनल GDP का 2.7% था, जो FY25 तक बढ़कर 3.3% हो चुका है। FY22 से FY26 के बीच लिस्टेड कंपनियों का कैपेक्स लगभग दोगुना हो सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख ज्योतिवर्धन जयपुरिया के निजी विचारों पर आधारित है। निवेश से पहले वित्तीय सलाहकार से सलाह लें।