Indian equities: भारतीय शेयर बाजार को लेकर विदेशी निवेशकों का नजरिया अब पहले जैसा उत्साह भरा नहीं रहा। दुनिया की बड़ी ब्रोकरेज फर्मों के सुर बदलते दिख रहे हैं। जेफरीज के ग्लोबल इक्विटी स्ट्रैटेजी हेड क्रिस्टोफर वुड ने भारत में अपना दांव घटा दिया है। उन्होंने अपने एशिया पैसिफिक पोर्टफोलियो में भारतीय शेयरों का वजन कम कर दिया है। इसके साथ ही UBS और बर्नस्टीन ने भी साफ कर दिया है कि फिलहाल भारत उनकी प्राथमिकता नहीं है।
क्रिस्टोफर वुड ने निवेशकों को भेजे अपने वीकली नोट GREED & Fear में बताया कि एशिया पैसिफिक (जापान को छोड़कर) पोर्टफोलियो में बदलाव किया गया है। इस बदलाव के तहत कोरिया और ताइवान में निवेश बढ़ाया गया है, जबकि भारत और चीन में निवेश घटा दिया गया है। भारत का वजन अब घटकर 13 फीसदी रह गया है। वुड का कहना है कि ज्यादातर निवेशक अभी भी नॉर्थ एशिया के टेक शेयरों से निकलकर भारत की ओर आने को तैयार नहीं हैं।
वुड के मुताबिक, हाल ही में एक उभरते बाजार के निवेशक से बातचीत में सामने आया कि वह पिछले 14 सालों में सबसे ज्यादा भारत में अंडरवेट है। इसके उलट वह कोरिया में सबसे ज्यादा निवेश किए बैठा है। वुड का मानना है कि जब तक कोई बहुत बड़ा और चौंकाने वाला बदलाव नहीं होता, तब तक निवेशकों की यह सोच बदलना मुश्किल है।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह से निराशाजनक भी नहीं है। वुड ने कहा कि जेफरीज इकोनॉमिक इंडिकेटर के ताजा आंकड़ों में कुछ राहत देने वाले संकेत जरूर हैं। पिछले साल असामान्य रूप से लंबी और भारी बारिश के बाद अब ऊर्जा की मांग में सुधार देखने को मिल रहा है। इससे उम्मीद जगी है कि इस साल नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ फिर से 10 फीसदी तक पहुंच सकती है। लेकिन वुड का साफ कहना है कि भारतीय बाजार में दोबारा दम तभी आएगा, जब कुछ चुनिंदा सेक्टरों पर टिके निवेश का दबाव कम होगा।
इधर, बर्नस्टीन ने भी भारतीय शेयरों को लेकर अपना रुख बदला है। ब्रोकरेज फर्म ने भारत की रेटिंग घटाकर न्यूट्रल कर दी है। बर्नस्टीन का कहना है कि पिछले कई सालों से भारत की कहानी बड़े और दमदार फैक्टर्स पर टिकी रही। रिकॉर्ड एसआईपी निवेश, सरकार का आक्रामक कैपेक्स और चीन प्लस वन की थीम ने बाजार को ऊंचाइयों पर पहुंचाया। लेकिन 2026 में यह कहानी अब उतनी दमदार नहीं दिख रही।
बर्नस्टीन के मुताबिक यह कोई संकट की घड़ी नहीं है, बल्कि भारत अपने ही शानदार अतीत के बोझ तले दबा हुआ है। 2026 में ब्याज दरों में कुछ कटौती, निजी निवेश में हल्की वापसी और संभावित ट्रेड डील जैसी बातें जरूर होंगी। लेकिन ये सभी मिलकर भी बाजार में पहले जैसी तेजी लौटाने के लिए काफी नहीं लगतीं। इसी वजह से भारत को न्यूट्रल किया गया है।
अगर बाजार के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2026 में अब तक सेंसेक्स और निफ्टी में सीमित तेजी देखने को मिली है। वहीं मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में साफ कमजोरी दिख रही है। इस बीच बर्नस्टीन ने निफ्टी के लिए 28,100 का टारगेट रखा है, जो मौजूदा स्तर से करीब 11 फीसदी ऊपर है।
दूसरी ओर UBS भी भारतीय शेयरों को लेकर सतर्क बना हुआ है। ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि भारत में नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ कमजोर है। MSCI इंडिया के फंडामेंटल्स दूसरे उभरते बाजारों के मुकाबले पिछड़ते नजर आते हैं। साथ ही लिस्टेड कंपनियों में एआई से जुड़े साफ विजेता भी दिखाई नहीं देते। ऊपर से ऊंचा वैल्यूएशन विदेशी निवेशकों को और सतर्क बना रहा है।