अपोलो हॉस्पिटल्स ने कहा है कि सितंबर में ऑक्युपेंसी स्तर बढ़कर करीब 60 फीसदी हो गया जो जून में 38 फीसदी रहा था। देश की प्रमुख अस्पताल शृंखला ने यह भी कहा कि लागत बचाने के लिए किए गए विभिन्न उपायों से कंपनी को चालू वित्त वर्ष के दौरान करीब 200 करोड़ रुपये बचाने में मदद मिलेगी।
अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप की प्रबंध निदेशक सुनीता रेड्डी ने आज निवेशकों से बातचीत में कहा कि पिछले छह महीने अपोलो के इतिहास में सबसे चुनौतीपूर्ण रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस दौरान वाह्यरोगी की आवक प्रभावित हुई और शल्य चिकित्सा में भी उल्लेखनीय गिरावट आई क्योंकि कोविड की आशंका और लॉकडाउन के करण अस्पतालों तक लोगों की आवाजाही काफी घट गई। अप्रैल से जून तिमाही के दौरान कंपनी का परिचालन राजस्व समेकित आधार पर 16 फीसदी घटकर 2,172 करोड़ रुपये रह गया। तिमाही के दौरान कंपनी ने 226 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा दर्ज किया जबकि एक साल पहले की समान तिमाही में कंपनी ने 49 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया था।
रेड्डी ने कहा, ‘अब रुझान काफी बेहतर दिख रहे हैं और हमें उम्मीद है कि कंपनी इस साल के अंत तम मुनाफे में लौट आएगी।’ उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ महीनों के दौरान स्थितियों में सुधार दिखने लगा है क्योंकि सरकार ने लॉकडाउन को खत्म किया है और लोगों की गतिविधियां शुरू हो गई हैं।
अगस्त में ऑक्युपेंसी अनुपात 55 फीसदी से बढ़कर करीब 60 फीसदी हो गया जो जुाई में 47 फीसदी और जून में 38 फीसदी रहा था। रेड्डी ने कहा कि आसपास के देशों से अंतरराष्ट्रीय रोगियों की आवक भी शुरू हो गई है और अपोलो ने उनके लिए कुछ चार्टर की भी व्यवस्था की है।
अपोलो हॉस्पिटल्स के मुख्य वित्तीय अधिकारी ए कृष्णन ने कहा कि कुल 7,200 बिस्तरों में से 30 फीसदी यानी लगभग 2,250 बिस्तर कोविड रोगियों के लिए हैं जहां ऑक्युपेंसी लगभग 65 फीसदी है। गैर-कोविड बिस्तरों में ऑक्युपेंसी 55 फीसदी है।