कृषि कानूनों पर बवाल और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खत्म होने की आशंकाओं के बीच उत्तर प्रदेश में इस खरीफ सीजन में 36 लाख टन से ज्यादा धान की सरकारी खरीद हो चुकी है। इस साल के लिए तय 55 लाख टन लक्ष्य का यह करीब तीन चौथाई है। खरीद का यह सीजन खत्म होने में अभी महीने भर से ज्यादा बाकी है। दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन में पूर्वी उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी नहीं के बराबर होने या पश्चिम के किसानों की ही भागीदारी होने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि देश की सबसे अधिक किसान आबादी वाले उत्तर प्रदेश में क्या कृषि कानूनों से कोई परेशानी हैं या किसानों को कानून की जानकारी ही नहीं है?
असलियत यह है कि उत्तर प्रदेश में 80 फीसदी से ज्यादा किसानों के पास दो एकड़ से कम जमीन है। ऐसे छोटे और सीमांत किसान सरकारी खरीद में शामिल नहीं हो पाते। प्रदेश के 75 जिलों की 248 सरकारी मंडियों में या तो बड़े किसान फसल बेचने आते हैं या बिचौलियों का ही बोलबाला रहता है। इसलिए मंडी रहे या न रहे, किसानों को कोई फिक्र नहीं। उन्हें केवल एमएसपी से मतलब है। सरकारी खरीद के बाद भी प्रदेश के 90 फीसदी किसान अपनी उपज बेचने आढ़तियों के पास ही जाते हैं ताकि उन्हें प्रशासनिक दिक्कतों, भुगतान में देर, ढुलाई के खर्च और गुणवत्ता के पचड़े में नहीं उलझना पड़े। कोरोना महामारी के दौरान सरकारी खरीद के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की शर्त ने आम किसान को सरकारी खरीद से और भी दूर कर दिया है।
तकनीक में पिछड़ी मंडियां
प्रदेश में मंडी व्यवस्था से किसानों को ज्यादा मतलब इसलिए भी नहीं है क्योंकि तकनीकी रूप से ये बेहद पिछड़ी हैं। इसी साल उत्तर प्रदेश की 25 मंडियों को ई राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) से जोड़ा गया। अब सरकारी खरीद की व्यवस्था ऑनलाइन है मगर आम किसानों को इसका कोई फायदा नहीं मिल रहा। ई-नाम में उत्तर प्रदेश के किसानों की भागीदारी तो नहीं के बराबर है। मंडी के भाव ऑनलाइन मिलना हो या एसएमएस पर, प्रदेश के छोटे और सीमांत किसानों को किसी का फायदा नहीं मिलता। भारतीय किसान यूनियन के हरनाम सिंह का कहना है कि गांवों में इंटरनेट की दिक्कत है और छोटे किसान उसका इस्तेमाल भी नहीं जानते। यही वजह है कि ज्यादातर किसान सरकारी खरीद के लिए ऑनलाइन पंजीकरण ही नहीं करा पा रहे हैं। सिंह ने बताया कि इस कारण बिचौलियों की नई जमात पैदा हो गई है, जो ऑनलाइन पंजीकरण, बैंक खाते जुड़वाने जैसे काम किसानों के लिए करती है।
मगर एमएसपी की फिक्र
इन्हीं सब वजहों से किसानों के लिए एमएसपी ही सबसे बड़ा मुद्दा है। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के किसान और कृषि उत्पादन मंडी समिति के निदेशक रहे कर्ण सिंह बताते हैं कि एमएसपी मनरेगा की तरह किसानों के लिए मानक का काम करता है यानी उन्हें एमएसपी या उसके आसपास का दाम जरूर मिलेगा। मगर उनका कहना है कि सरकारी खरीद व्यवस्था और मंडी होने के बाद भी कुल उपज का 10 फीसदी वहां बिकना मुश्किल हो जाता है। ज्यादातर किसान खुले बाजार में ही फसल बेचते हैं। बेशक उत्तर प्रदेश में समय-समय पर मंडी अधिनियम में संशोधन के जरिये उसे किसानों के लिए बेहतर बनाया गया है मगर आम किसानों को उसका फायदा कम ही मिला है। इसलिए किसान मानते हैं कि खरीद चाहे सरकारी हो या निजी, सरकार गारंटी दे कि वह एमएसपी पर ही होगी।
हरदोई के किसान नेता अजय त्रिवेदी कहते हैं कि एमएसपी नहीं रहे या सरकारी खरीद की बची-खुची व्यवस्था खत्म होने पर किसानों की उपज औने-पौने दाम पर ही बिकेगी। उन्होंने कहा कि इस बार धान का एमएसपी 1,868 रुपये प्रति क्विंटल है मगर खुले बाजार में किसानों को 800 से 1,100 रुपये के भाव बेचना पड़ा है। त्रिवेदी आलू का उदाहरण देते हैं कि पिछले दो साल से बेभाव बिक रही फसल के गिरते दाम तभी थमे, जब प्रदेश सरकार ने समर्थन योजना के तहत इसकी खरीद शुरू की।
निजी क्षेत्र का तजुर्बा अच्छा
करीब 14 साल पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने निजी क्षेत्र को मंडी लाइसेंस देकर गेहूं खरीद की इजाजत दी थी। आईटीसी, कारगिल जैसी जानी-मानी कंपनियों ने कई इलाकों में सीधे किसानों से गेहूं खरीदा था। किसानों को अच्छा भाव भी मिला था और तोहफे भी। शाहजहांपुर के किसान आशीष बाजपेयी बताते हैं कि निजी कंपनियों ने एमएसपी से भी ज्यादा भाव दिया था और सीधे खलिहान से खरीद हुई थी। इस वजह से उस साल प्रदेश के बड़े गेहूं उत्पादक जिलों में सरकारी खरीद केंद्रों पर सन्नाटा ही पसरा रहा था।
उस अनुभव को याद कर किसान मानते हैं कि खरीद में निजी क्षेत्र का आना उनके हित में होगा मगर कंपनियों को भी नियम-कायदों में बांधा जाना चाहिए। एमएसपी की गांरटी होने पर दाम भी मिलेगा और सहूलियत भी होगी। किसानों का कहना है कि ज्यादातर उपज खुले बाजार में ही बिकती है और कुछ शर्तें लगा दी जाएं तो वहां बड़ी कंपनियों के होने से किसानों को ही फायदा होगा। उनका मत यह भी है कि निजी क्षेत्र को मंडी लाइसेंस के साथ ही खरीद की इजाजत दी जानी चाहिए। इससे सरकार को कर के जरिये राजस्व मिलेगा और किसानों का शोषण नहीं हो पाएगा।
मंडियों से अच्छा राजस्व
उत्तर प्रदेश राज्य कृषि उत्पादन मण्डी परिषद की स्थापना मण्डी समितियों की गतिविधियों और कल्याणकारी योजनाओं के नियंत्रण तथा मार्गदर्शन के लिए 1973 में की गई थी। पहले साल मंडियों में कुल 37.90 लाख टन आवक हुई थी, जो पिछले साल बढ़कर 626.45 लाख टन तक पहुंच गई। 1973 में प्रदेश की सभी मंडियों की कुल आय 1.92 करोड़ रुपये थी, जो 2018-19 में बढ़कर 1835.14 करोड़ रुपये हो गई। कोरोना महामारी के कारण इसी साल नवंबर में मंडी शुल्क 2 फीसदी के बजाय 1 फीसदी कर दिया गया। मंडियों के विकास के लिए 0.5 फीसदी विकास शुल्क भी लिया जाता है। इस तरह नए आदेश के बाद मंडी परिसर के भीतर व्यापार करने पर 2.5 फीसदी के बजाय 1.5 फीसदी शुल्क ही चुकाना पड़ रहा है। इससे पहले कोरोना महामारी के दौरान किसानों के लिए फलों-सब्जियों के कुल 45 उत्पादों को मई में गैर अधिसूचित कर दिया गया था। उनके कारोबार पर अब मंडी शुल्क नहीं लगता।