कृषि कानूनों पर होहल्ला तो अब मच रहा है मगर महाराष्ट्र में शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और कांग्रेस की महाविकास आघाड़ी सरकार ने संसद में इनके पारित होने से पहले ही इन्हें राज्य में लागू कर दिया था। यह बात अलग है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दखल के बाद इनके अमल पर रोक लगा दी गई। मगर नए कानूनों के जिन प्रावधानों का विरोध हो रहा है, उनमें से ज्यादातर महाराष्ट्र में पहले ही लागू हैं और कारोबारी तथा किसान उनका फायदा भी उठा रहे हैं। शायद यही वजह है कि राज्य में इन कानूनों का मुखर विरोध नहीं हो रहा है।
मामला सियासी रंगत ले रहा है। महाराष्ट्र के बड़े किसान नेता किशोर तिवारी कहते हैं, ‘एपीएमसी नहीं रहे तो अनाज बेचना मुश्किल होगा। सरकार बिचौलियों के नाम पर एपीएमसी खत्म करना चाह रही है, इसलिए जिन राज्यों में गेहूं-चावल जैसे मोटे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है वहां नए कानूनों का विरोध ज्यादा है। महाराष्ट्र में निजी मंडियों में खरीद की जाती है, लेकिन उत्पादन ज्यादा होने पर खरीद बंद कर दी जाती है। ऐसे में एपीएमसी खत्म हुई या कमजोर पड़ी तो निजी बाजार संचालकों की मनमानी शुरू हो जाएगी। किसानों के मन में पनप रही आशंकाएं दूर की जानी चाहिए।’
दूसरी ओर कृषि मामलों के जानकार हर्षल जोशी कहते हैं कि केंद्र सरकार के कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन व सरलीकरण) कानून-2020 की नींव महाराष्ट्र में करीब 15 साल पहले पड़ चुकी थी। वर्ष 2005-06 में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने निजी बाजार और कलेक्शन सेंटर की स्थापना के लिए डायरेक्ट मार्केटिंग लाइसेंस (डीएमएल) को हरी झंडी दी थी। निजी बाजार वास्तव में थोक मंडी हैं, जिनकी स्थापना निजी कारोबारियों न की है। कलेक्शन सेंटर के संचालन में बिग बास्केट व रिलायंस फ्रेश जैसी बड़ी कंपनियों ने प्रवेश किया और खेत से ही किसानों के उत्पादों की खरीद की शुरुआत हुई।
महाराष्ट्र में जो व्यवस्था है, उसके तहत कारोबारियों को निजी बाजार की स्थापना के लिए राज्य सरकार के विपणन निदेशक लाइसेंस जारी करते हैं। निजी बाजार की स्थापना में करीब 5 करोड़ रुपये की लागत आती है। इसके लिए कम से कम 5 एकड़ जमीन, नीलामी हॉल, शेड, प्रतीक्षालय की व्यवस्था अनिवार्य है। निजी बाजारों को हर साल अपने लाइसेंस का नवीनीकरण कराना पड़ता है। डीएमएल धारक को 1.05 फीसदी उपकर का भुगतान उस कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) को करना पड़ता है, जिसके क्षेत्र में वह कारोबार करता है। केंद्र का नया कानून पारित होने से डीएमएल धारकों को फायदा हुआ क्योंकि उन्हें अब सेस (मंडी कर) का भुगतान नहीं करना पड़ेगा। एफपीसी का कहना है कि सितंबर से अक्टूबर के बीच उन्होंने किसानों से तेल का कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए करीब 2,600 टन सोयाबीन की खरीद की है, जिसकी कीमत 10 करोड़ रुपये से ज्यादा होती है। उपकर या मंडी कर होता तो ऐसा नहीं हो सकता था।
महाराष्ट्र में अब तक 18 निजी बाजारों की स्थापना हो चुकी है, जिनमें रुई, सोयाबीन, चना आदि की खरीद-बिक्री होती है। कुछ में सभी प्रकार के अनाज एवं दूसरे कृषि उत्पादों की भी खरीद होती है। वर्ष 2019-20 में इन 18 निजी बाजारों में 100.88 लाख क्विंटल अनाज की खरीद हुई और 4,357.88 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ। किसानों से सीधे उत्पाद खरीदने के लिए राज्य सरकार ने कुछ साल पहले फार्मर प्रोड्यूसर्स कंपनी (एफपीसी) को करीब 1,100 डीएमएल जारी किए हैं। इन्हें बड़े पैमाने पर छूट प्रदान की गई है, जिससे वे बड़े बड़ी कंपनियों को टक्कर दे सकें। राज्य में निजी बाजारों को किसानों से सीधे माल खरीदने की आजादी है, लेकिन एमएसपी में तय दाम से नीचे अनाज की खरीद नहीं कर सकते हैं। इसलिए अक्सर देखा गया है कि बाजार में जब अनाज की कीमत कम होती है तो कई डीएमएल धारक किसानों से खरीद बंद कर देते हैं, क्योंकि उन्हें एमएसपी पर भुगतान करना पड़ता है। जानकारों की मानी जाए तो राज्य में बाजार समितियां का सालाना कारोबार करीब 48 हजार करोड़ रुपये का है जबकि निजी मंडियों का कुल कारोबार लगभग 11 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है।
नए कानून का विरोध कर रहे महाराष्ट्र के सबसे बड़े किसान संगठन स्वाभिमान शेतकारी संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी इन्हें मंडी खत्म करने की साजिश मानते हैं। वह कहते हैं कि सरकार किसानों के ऊपर जबरदस्ती नए कृषि कानून थोपना चाह रही है, जो विरोध की सबसे बड़ी वजह है। यह बात सही है कि राज्य में पहले से किसानों को मंडी के बाहर सब्जी एवं माल उत्पाद बेचने की छूट है लेकिन अनाज के लिए अभी भी एपीएमसी सबसे बेहतर विकल्प है। किसानों को एमएसपी से नीचे दाल व दूसरे उत्पाद बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है यह कारोबार निजी हाथों में जाने पर ये लोग किसानों को और मजबूर करेंगे।
किसानों को फायदा
दिलचस्प बात है कि किसान इसके विरोध में नहीं हैं क्योंकि उन्हें इसका फायदा हो रहा है। एपीएमसी के बाहर अपनी उपज बेचने, निजी बाजार और ठेका खेती के कारण ही मुंबई की हाउसिंग सोसायटियों को किसान सीधे अपनी उपज बेच पा रहे हैं। नासिक के किसान हर्ष हेवले कहते हैं कि वे प्याज लोगों के घरों तक पहुंचा रहे हैं। बिचौलिया नहीं होने से उन्हें बेहतर दाम मिलता है और लोगों को सस्ता प्याज मिलता है। इस समय मुंबई में दुकानदार करीब 60 रुपये किलो प्याज बेच रहे हैं जबकि किसान ग्राहकों को 35 रुपये किलो में प्याज बेच रहे हैं। नासिक के नांदुर शिंगोटे गांव के विनायक कहते हैं कि चार एकड़ में तैयार हरा धनिया उनके खेत से ही व्यापारी खरीद ले गए, जिससे मंडी के चक्कर नहीं लगाने पड़े। मगर किसानों को फायदा है तो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या क्यों करते हैं। इसके जवाब में जोशी कहते हैं कि किसान मंडी की वजह से आत्महत्या नहीं कर रहे हैं। साहूकारों के कर्ज के चंगुल के चलते जान देते हैं। सरकार को उपज बढ़ाने और कृषि सुविधाएं बढ़ाने पर जोर देना होगा क्योंकि पैदावार होगी और बचेगी तभी किसान बेच पाएंगे।
सियासत का पेच
अगस्त में लागू हुए ये कानून महाराष्ट्र के लिए नए नहीं हैं। यहां की सबसे बड़ी कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) नवी मुंबई में ये पूरी तरह लागू हैं। यहां किसान अपने उत्पाद मंडी के बाहर बेचता है तो उससे मंडी शुल्क नहीं दिया जाता। शायद यही देखकर कृषि मंत्री दादासाहेबल भुसे ने किसानों के हित में बताकर कृषि कानून लागू करने का आदेश दिया था। अध्यादेश जारी होने के बाद विपणन निदेशक सतीश सोनी ने तीनों अधिनियम सख्ती से लागू करने का निर्देश जारी किया। मगर मामला सियासी झोल में फंस गया। ठेके पर खेती के मुद्दे पर उत्तरी राज्यों के किसान विरोध कर रहे हैं मगर महाराष्ट्र में यह कानून वर्षों से लागू है। कांग्रेस-राकांपा सरकार के समय पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार इसके पक्ष में थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा (लोक माझे सांगाती) में लिखा है कि बारामती से पुणे या मुंबई की मंडी तक माल ले जाने में कमाई का 17 फीसदी खर्च हो जाता है। इसलिए हर साल 50,000 करोड़ रुपये की बरबादी कराने वाली मंडी की बध्यता खत्म होनी चाहिए।