दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में हवा की गुणवत्ता खराब होने की शुरुआत के साथ ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने प्रदूषण फैलाने वालों पर लगाम कसने के लिए 40 दलों को तैनात किया है। यह जानकारी अधिकारियों ने दी।
नवगठित दल दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए बने संशोधित ग्रेडेड रिस्पॉन्स ऐक्शन प्लान (ग्रेप) के एहतियाती उपायों को लागू करने में मदद करेगा। ग्रेप 1 अक्टूबर से लागू हो गया है। यह दल वायु प्रदूषण की स्थिति के अनुसार ग्रेप के एहतियाती उपायों को लागू करेगा। हवा गुणवत्ता प्रबंधन के आयोग के एक सदस्य ने कहा, ‘ इन 40 दलों के अलावा दिल्ली सरकार ने भी ऐसे 300 दलों का गठन किया है।’ अधिकारी ने कहा कि हर दल में 2-3 सदस्य होंगे। प्रदूषण के तीन दिनों के पूर्वानुमान के आधार पर उन पर कार्रवाई की जाएगी जो प्रदूषण फैला सकते हों। ये दल प्रदूषण पर लगाम कसने के लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दलों से समन्वय करेंगे।
संशोधित ग्रेप के तहत पर्यावरण मंत्रालय नई वास्तविक समय स्रोत विभाजन प्रणाली से प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों की पहचान करेगा। इस प्रणाली से जुटाए आंकड़े 20 जुलाई के बाद उपलब्ध होंगे। पर्यावरण मंत्रालय ने जनवरी 2017 को ग्रेप अधिसूचित किया था। ग्रेप के अंतर्गत दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में प्रदूषण रोकने के लिए कदम उठाए जाएंगे। ग्रेप आपातकाल में प्रतिक्रिया देने वाली योजना है। इसे केवल तभी लागू किया जाएगा जब वायु की गुणवत्ता एक निर्धारित स्तर से खराब हो जाएगी।
ग्रेप के तहत प्रदूषण के स्तर के अनुसार कई कदम उठाए जाएंगे। इसके तहत कूड़ा जलाने पर प्रतिबंध, मशीनों से सफाई को बढ़ावा देना, डीजल से चलने वाले जेनरेटर सेट पर प्रतिबंध, निर्माण गतिविधियों पर रोक, स्कूल को बंद करना, डीजल ट्रकों के दिल्ली में प्रवेश पर रोक आदि उपाय शामिल हो सकते हैं। बीते साल ग्रेप 15 अक्टूबर से लागू हुआ था लेकिन इस साल से ग्रेप 1 अक्टूबर से लागू हो गया। बीते साल हवा की गुणवत्ता खराब होकर ‘बहुत खराब’ और ‘गंभीर’ श्रेणी के निर्धारित स्तर पर 48 घंटे रहने पर ही ग्रेप लागू होता था। इस बार ग्रेप ऐसी किसी स्थिति में पहुंचने से तीन दिन पहले लागू हो जाएगा।
प्राधिकारियों ने पिछले साल ये एहतियाती उपाय तब लागू किए थे जब पीएम 2.5 व पीएम 10 के संकेंद्रण के निर्धारित स्तर की सीमा पर पहुंच गया था। लेकिन इस बार प्रतिबंध पीएम 2.5 व पीएम 10 के संकेंद्रण के एक निर्धारित स्तर पर पहुंचने की जगह वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के स्तर पर आधारित होगा। एहतियाती उपायों की अवहेलना और शिकायतों के हल के लिए ग्रीन वॉर रूम गठित किया जाएगा। यह वॉर रूम अपने दायित्वों को अंजाम देने के दौरान बीते दो सालों के दौरान कायदे कानूनों को तोड़ने के तरीकों को भी ध्यान में रखेगा।
ग्रेप ने वायु की गुणवत्ता खराब होने को चार चरणों में बांटा है। चरण 1 ‘खराब’, यदि वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 201-300 के बीच रहता है। दूसरा चरण – ‘बहुत खराब’, यदि एक्यूआई का स्तर 301-400 के बीच होगा। तीसरा चरण ‘गंभीर’, यदि एक्यूआई का स्तर 401-450 के बीच होगा। चौथा चरण ‘गंभीर प्लस’, यदि एक्यूआई का स्तर 450 से अधिक होगा। हालांकि विभाग ने प्रदूषण से निपटने के लिए तैयारी कर ली है लेकिन मुख्य चिंता पंजाब और आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाने से होगी।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी ऐंड क्लीन एयर के विश्लेषक सुनील दहिया ने पंजाब में हुई धान की खेती के स्तर पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसान को पराली जलाने से रोकने और उन्हें इस मामले में संवेदनशील बनाने के लिए मानवश्रम की कमी है। इस संदर्भ में दहिया ने कहा, ‘जब 10 खेतों में आग जल रही हो तो दो खेतों में आग रोकने से कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा। किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए सरकार के पास मानवशक्ति और इच्छा शक्ति की कमी है।’ दिल्ली – एनसीआर में प्रदूषण में प्रदूषण बढ़ाने का एक प्रमुख कारक पराली जलाना है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में विशेष तौर पर धान जलाई जाती है ताकि अगली फसल की बोआई के लिए खेत को तैयार किया जा सके। इस क्रम में विशेष तौर पर अक्टूबर-नवंबर में पराली जलाई जाती है।
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने वायु गुणवत्ता के प्रबंधन के तहत जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई करने की तैयारियों करने के मामले में पंजाब को फटकार लगाई। यादव ने कहा, ‘राज्य सरकार ने तकरीबन 57.5 लाख टन पराली के प्रबंधन के लिए उचित योजना नहीं बनाई। इससे दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना है।’
विशेषज्ञों के मुताबिक वापस लौटते हुए मॉनसून के दौरान बारिश होने के कारण पराली जलाए जाने की आशंका बढ़ गई है। इस बारिश के कारण किसानों के पास रबी की फसल लगाने के लिए कम समय बचा है। अक्टूबर के अंत में धान की कटाई अपने चरम पर होगी। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के मुताबिक नवंबर, 2021 में पराली जलाने के 1,13,304 मामले प्रकाश में आए थे। इनमें से 85048 मामले पंजाब और हरियाणा से उजागर हुए थे।
साल 2021 के अनुमानों के मुताबिक दीपावली के दौरान दिल्ली-एनसीआर में पराली जलाए जाने से प्रदूषण का योगदान 14 से 48 फीसदी के बीच था। वास्तविक समय की निगरानी (आईएआरआई) के मुताबिक 15 सितंबर से 30 सितंबर के बीच पंजाब में पराली जलाने के 192 मामले, उत्तर प्रदेश में पराली जलाने के 12 मामले मिले थे। हालांकि पंजाब में रविवार को पराली जलाने के 45 मामले उजागर हुए हैं।