‘प्रमुख साझेदारों व राज्यों की भागीदारी के बिना कृषि सुधार विफल होना तय’

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 4:23 AM IST

दिल्ली की सीमा के बाहर सबसे बड़े किसान प्रदर्शनों में से एक को 6 महीने पूरे हो गए। विशेषज्ञों व नीति पर नजर रखने वालों का कहना है कि तीन कृषि कानूनों को लेकर चल रहे प्रतिरोध से सभी को सीख मिलती है कि सभी हिस्सेदारों और राज्यों की सहमति के बगैर कृषि क्षेत्र में कोई भी बड़ा सुधार करने पर उसे लागू करने की राह में व्यवधान आना तय है। विरोध प्रदर्शन से न सिर्फ 3 कृषि कानूनों के भविष्य को लेकर सवाल उठ खड़ा हुआ है, बल्कि कृषि क्षेत्र के सुधारों की किस्मत को लेकर संदेह पैदा हुआ है।
हालांकि कोरोना की दूसरी लहर और आंशिक रूप से विरोध प्रदर्शन करने वालों की थकान की वजह से बाद के दिनों में मीडिया में आंदोलन को उतनी जगह नहीं मिल पाई, जितनी शुरुआती दिनों में मिली। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और प्रदर्शनकारी किसान जब तक बातचीत शुरू नहीं कर देते, त्वरित और स्वीकार्य समाधान कठिन नजर आता है। पिछले साल जून महीने में संसद में पारित किए गए 3 कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब के कुछ गांवों में विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था। समय बीतने के साथ यह तमाम नए इलाकों में फैलता गया और उसके बाद पड़ोसी राज्यों हरियाणा, पश्चिमी उत्तर और राजस्थान सहित देश के कई इलाकों में फैल गया। प्रदर्शनकारी किसानों की मुख्य मांग 3 कृषि कानूनों को वापस लिया जाना और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी देना है।
विरोध प्रदर्शन उस समय चर्चा में आया, जब पंजाब के हजारों किसानों ने राजधानी दिल्ली की ओर कूच किया और दिल्ली में प्रवेश न मिलने की स्थिति में मुख्य प्रवेश मार्गों को बंद करने का फैसला किया।
केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से 11 दौर की बातचीत की और अधिनियम के कुछ  प्रावधानों में संशोधन की पेशकश की, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिली। प्रदर्शनकारी कृषि कानून वापस लिए जाने की मांग पर अड़े रहे।
किसानों ने 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली निकाली, तब हिंसक घटनाएं हुईं। ट्रैक्टर रैली से इतर मार्ग पर किसानों के जाने से पुसिल के साथ झड़प हुई और उसके बाद आंदोलन को झटका लगा। लेकिन भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत से जबरी जगह खाली कराने की कवायद के बाद उठे भावनात्मक ज्वार ने आंदोलन को फिर से जीवित कर दिया।  
आईआईएम अहमदाबाद में सेंटर फार मैनेजमेंट इन एग्रीकल्चर के चेयरपर्सन प्रोफेसर सुखपाल सिंह ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘मुझे लगता है कि कोविड संकट खत्म होते ही विरोध प्रदर्शन तेज हो जाएगा, क्योंकि केंद्र सरकार बातचीत को लेकर जल्दबाजी में नहीं दिख रही है। लेकिन अब बड़ा अंतर यह हो सकता है कि किसान आंदोलन उन राज्योंं तक पहुंच जाए, जो अब तक पंजाब के किसानों से सहानुभूति रखते थे।’
सिंह ने कहा, ‘कृषि क्षेत्र को खोलने में कोई हानि नहीं है, जैसा कि कृषि कानूनों में किया गया, लेकिन प्राथमिक साझेदारों की कीमत पर यह नहीं होना चाहिए, जो किसान हैं।’
मुंबई के इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट रिसर्च (आईजीआईडीआर) के कुलपति और निदेशक एस महेंद्र देव ने कहा कि पिछले 6 महीने में हुई गतििवधियां साफ संदेश देती हैं कि कृषि विपणन में सुधार के मामले को राज्यों के हवाले कर देना ही बेहतर तरीका है।  
इंटरनैशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) के दक्षिण एशिया के पूर्व निदेशक पीके जोशी ने कहा कि  मौजूदा गतिरोध दूर करने का एकमात्र तरीका यह है कि प्रदर्शनकारी किसान और सरकार बातचीत के लिए एक मेज पर आएं और सभी मसलों का समाधान करें।

First Published : May 26, 2021 | 11:19 PM IST