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आर्थिक समीक्षा की दो-टूक: वैश्विक अनिश्चितता में स्वदेशी पर फोकस अब अनिवार्य

मीक्षा में चेतावनी देते हुए कहा गया है कि न तो सभी आयात वांछनीय हैं और न ही वे दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता का समर्थन करते हैं

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श्रेया नंदी   
Last Updated- January 29, 2026 | 10:50 PM IST

विकसित देशों द्वारा निर्यात पर नियंत्रण करने, कार्बन नियमन और तकनीक देने की मनाही बढ़ रही है ऐसे में आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि स्वदेशी की अवधारणा पर ध्यान केंद्रित करना ‘अपरिहार्य और आवश्यक’ है।

समीक्षा में कहा गया, ‘नीतिगत सवाल अब यह नहीं है कि राज्य को स्वदेशी को प्रोत्साहित करना चाहिए बल्कि यह है कि दक्षता, नवाचार या वैश्विक एकीकरण को कम किए बिना यह कैसे होना चाहिए।’ समीक्षा में चेतावनी देते हुए कहा गया है कि न तो सभी आयात वांछनीय हैं और न ही वे दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता का समर्थन करते हैं।

स्वदेशी की अवधारणा का आकलन केवल आयात में कमी से नहीं किया जाना चाहिए जिसका अर्थ सबसे कम संभव कीमत पर उच्चतम गुणवत्ता वाले सामान का उत्पादन करना है। बल्कि इसका आकलन एक ऐसी दुनिया में निर्यात क्षमता के निर्माण से किया जाना चाहिए, जहां पूंजी प्रवाह तेजी से बदलते भू-राजनीतिक तालमेल और राष्ट्रीय हितों के हिसाब से होता है।

इसमें कहा गया है, ‘स्वदेशी एक सधी हुई रणनीति है न कि एक व्यापक नियम।’ स​मीक्षा में यह भी कहा गया है कि जिन क्षेत्रों में भारत पहले से ही कम कीमत पर सामान बना सकता है या जहां सामान आपूर्ति श्रृंखला में आमतौर पर इस्तेमाल होता है या जहां श्रम पर आधारित उद्योगों के लिए कच्चा माल जरूरी है वहां स्थायी सुरक्षा देना उपयुक्त नहीं है।

समीक्षा में यह भी कहा गया है कि हमें घरेलू उद्योगों को सुरक्षा देने के लिए बहुत अधिक कर और पाबंदियां लगाने से बचना चाहिए। दूसरे देशों से सामान मंगाने की जगह, खुद ही बनाना तभी व्यवहारिक है जब हम अपने देश में सही कीमत पर सामान बना सकते हों और जब किसी उद्योग को एक तय समय के लिए सुरक्षा दी जाए ताकि वो सीख सके, बढ़ सके और अधिक सामान बना सके। ये सुरक्षा कुछ शर्तों के साथ होनी चाहिए, ऐसा नहीं कि हम बिना सोचे-समझे अपने देश की कंपनियों को बचाते रहें।

समीक्षा में कहा गया है, ‘भारत को एक ही समय पर आयात करने की जगह खुद बनाना, मुश्किल समय में भी काम करने की क्षमता और रणनीतिक अपरिहार्यता कि जिसके बिना काम न चल सके, ऐसे कामों को करना होगा। अब देर करने का समय नहीं है। ये ऐसा है जैसे एक ही समय पर लंबी दौड़ को पूरा करते हुए तेज दौड़ना है या मैराथन पूरा करना पड़े!’ समीक्षा में यह भी चेतावनी दी गई है कि खराब गुणवत्ता का सामान बनाने वालों को उल्टे-सीधे कर लगाकर बचाने से कोई फायदा नहीं है।

समीक्षा में कहा गया है, ‘इससे सबक ये मिलता है कि अगर आप उत्पादकता बढ़ाने के लिए निवेश नहीं करते और अपनी क्षमता नहीं बढ़ाते तथा सामान को दूसरे देशों में निर्यात करने पर ध्यान नहीं देते तब इससे असुरक्षा बढ़ती है न कि ताकत मिलती है।’

First Published : January 29, 2026 | 10:23 PM IST