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देश में 2013 और 2024 के बीच हाई स्कूल स्टेम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित) में दाखिला लेने वाली लड़कियों की संख्या में 1.7 गुना वृद्धि हुई जबकि 2015 से 2025 के दौरान जेईई का फॉर्म भरने वाली छात्राओं की संख्या में भी 2 गुना इजाफा हुआ है। आज स्टेम स्नातकों में महिलाओं की अच्छी-खासी हिस्सेदारी है, लेकिन जब बात फंड जुटाने की आती है, तो पुरुषों की तुलना में अंतर बहुत अधिक नजर आता है।
कलारी सीएक्सएक्सओ इनिशिएटिव की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के मजबूत स्टार्टअप नेटवर्क में शामिल संस्थापकों द्वारा जुटाए गए प्रत्येक 100 रुपये में केवल 4 रुपये ही महिलाओं द्वारा अर्जित किए जाते हैं। इससे पता चलता है कि भले ही महिलाएं स्टेम और प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं, लेकिन स्टार्टअप संस्थापक के रूप में उभरने की उनके संभावना सिर्फ 0.6 गुना ही है।
कलारी कैपिटल की प्रबंध निदेशक और संस्थापक वाणी कोला ने कहा, ‘यह केवल क्षमता से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि अवसर कितने मिलते हैं। जब पूंजी स्कूल, कंपनियां और नेटवर्क जैसे समान परिचितता-पैटर्न के आसपास केंद्रित होती है, तो यह खाई बढ़ती है। इस तरह की खामियां अक्षमता को बढ़ाते हैं। और जो लोग इसके पक्षधर होते हैं, उनके लिए अवसर खुलते जाते हैं। फंडिंग अंतर सिर्फ समानता का सवाल नहीं है। यह बेहतर की खोज की विफलता भी है। जब स्टार्टअप संस्थापकों की एक पूरी कतार को कम आंका जाता है, तो अंतर बढ़ता जाता है और फिर उसे पाटने के लिए सुनियोजित उत्प्रेरकों की आवश्यकता होती है। यदि ऐसा नहीं होता है तो बाजार में यह असमानता बनी रहती है।
यह रिपोर्ट सीधे तौर पर उस विचार को चुनौती देती है कि महिला संस्थापकों की संख्या ही कम है। मैक्रो इकोसिस्टम डेटा (आइशी, एनआईआरएफ, ट्रेक्शन फंडिंग डेटा) और 140 से अधिक संस्थापकों, ऑपरेटरों एवं निवेशकों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार रिपोर्ट स्टार्टअप तंत्र में संरचनात्मकता की कमी को उजागर करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्सर ‘स्टार्टअप माफिया’ कहा जाने वाला शक्तिशाली एलुमनी नेटवर्क किसी भी उद्यम की सफलता-असफलता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन इस सर्किल में महिलाओं की संख्या बेहद कम है। फर्मों में वीसी विश्लेषकों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 38% है, लेकिन उनकी भागीदारी का स्तर केवल 16% ही हैं।
रिपोर्ट पूंजी अंतर को विविधता के मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि संरचनात्मक बाजार अक्षमता के रूप में प्रस्तुत करती है। वैश्विक अनुमान बताते हैं कि यदि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़े तो इससे भारत के जीडीपी को सैकड़ों अरब डॉलर का फायदा होगा। मालूम हो कि महिला-नेतृत्व वाली एमएसएमई को 158 अरब डॉलर से अधिक के ऋण अंतर का सामना करना पड़ता है।