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मोदी के गमछे से चमकी बुनकरों की किस्मत, बिहार के करघों पर बरसे करोड़ों के ऑर्डर

बिहार में चुनावी राजनीति ने गमछे को सांस्कृतिक प्रतीक से आगे बढ़ाकर करोड़ों के कारोबार में बदल दिया, जिससे बुनकरों को नई उम्मीद मिली।

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रामवीर सिंह गुर्जर   
Last Updated- February 16, 2026 | 9:44 AM IST

कभी गले में लपेटा और कभी सिर पर बांधा जाने वाला गमछा बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, असम और ओडिशा जैसे राज्यों में खूब चलता है मगर ज्यादातर यह बनता बिहार में है। बिहार में पिछले साल विधानसभा चुनावों से पहले एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गमछा लहराया और उसे बिहारी अस्मिता से जोड़ दिया। उसके बाद तो गमझे की मांग एकाएक बढ़ गई और गमछा निर्माताओं को एक साथ लाखों गमछों के ऑर्डर मिलने लगे। बिहार में गया जिला गमछे के विनिर्माण का अड्डा है और वहां के कारोबारी गमछे की सियासत को भुनाने के लिए कमर कस चुके हैं। बिहार के गमछा निर्माताओं के लिए सबसे बड़ा बाजार पश्चिम बंगाल है, इसलिए वहां इस साल होने वाले विधान सभा चुनाव में गमछा कारोबार बढ़ने की उम्मीद में उन्होंने तैयारी शुरू कर दी है।

पटवा टोली है अड्डा

गया जिले के मानपुर प्रखंड के गांव पटवा टोली में लाखों की तादाद में गमछे बनते हैं। गमछा निर्माता और वस्त्र उद्योग व बुनकर सेवा समिति के अध्यक्ष प्रेम नारायण पटवा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि पटवा टोली में आजादी के समय से ही गमछे बनाए जा रहे हैं और इस समय करीब 35,000 बुनकर इस काम में लगे हुए हैं। पटवा टोली में रोजाना 200 बंडल गमछे बनते हैं और एक बंडल में करीब 1,000 गमछे होते हैं। इस तरह यहां रोजाना करीब 2 लाख गमछे तैयार होते हैं। कई परिवारों में यह पुश्तैनी काम है, जो कई पीढ़ियों से चलता आ रहा है।

पटवा टोली बिहार ही नहीं पूरे देश में गमछे बनाने वाला सबसे बड़ा ठिकाना है। समिति के सचिव और गमछा निर्माता फलधारी प्रसाद कहते हैं कि यहां बनने वाले 80 फीसदी गमछे थोक में 20 से 30 रुपये में बिकते हैं। कारोबारियों को बाकी गमछों का दाम 60 से 80 रुपये तक भी मिल जाता है। पटवा टोली के कारोबारियों का अनुमान है कि यहां गमछे का सालाना 125 से 150 करोड़ रुपये का कारोबार है।

हथकरघे से स्वदेशी मशीन तक

पटवा टोली में पहले गमछे हथकरघे पर बनते थे मगर अब कारखानों में मशीनें गमछे बना रही हैं, जिससे उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ गई है। पटवा ने बताया कि इस गांव में आजादी के समय हथकरघे पर गमछे बनने शुरू हुए थे और 1970 में सरकार ने बुनकरों को कुछ मशीनें दीं, जिसके बाद मशीनों पर भी उत्पादन होने लगा।

इस समय गमछा बनाने वाली ज्यादातर मशीनें चीन की हैं, जो जल्दी खराब हो जाती हैं और मरम्मत कराना आसान नहीं होता। इसलिए पिछले कुछ साल में देसी मशीनों का चलन बढ़ा है मगर वे महंगी हैं। चीन की मशीन 5 लाख रुपये में आ जाती है और अहमदाबाद से आने वाली देसी मशीन 12 लाख रुपये के करीब बैठती है। पटवा बताते हैं कि उन्होंने भी देसी मशीन खरीदी है। प्रेमनारायण कहते हैं कि देसी मशीन महंगी जरूर आती है मगर लंबे समय तक चलती है। नई मशीनें खरीदने वाले भी इन्हें ही तरजीह दे रहे हैं।

बिहार चुनाव से नई पहचान

बिहार चुनाव ने गमछा कारोबार को चुनावी रंग दे दिया है। पटवा के मुताबिक रैली में मोदी के गमछा लहराते ही मांग एकाएक बढ़ गई। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से ही केसरिया गमछों के तगड़े ऑर्डर मिले। इसके बाद राष्ट्रीय जनता दल ने हरे और जन स्वराज पार्टी ने पीले गमछों की मांग की। बिहार चुनाव में ही 25-30 लाख गमछे ज्यादा बिक गए। गमछा कारोबारी अब चुनाव के लिए अलग से तैयारी कर रहे हैं। पटवा ने कहा कि बंगाल और असम में गमछे बहुत जाते हैं और वहां भी इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए चुनाव से दो-तीन महीने पहले ही बड़े पैमाने पर गमछे बनवाकर रखने की योजना है। पीढ़ियों से गमछा कारोबार में लगे अमोद कुमार ने बताया कि भाजपा के लिए केसरिया गमछों की बात अभी से चल रही है और दोनों राज्यों से चुनावों के समय अच्छे ऑर्डर मिलने की संभावना है। फलधारी प्रसाद को भी लगता है कि ‘गमछा पॉलिटिक्स’ कारोबार को बहुत दम दे सकती है।

बंगाल सबसे बड़ा खरीदार

फलधारी प्रसाद बताते हैं कि गमछे बेशक पटवा टोली में बनते हैं मगर इनका सबसे बड़ा खरीदार बिहार नहीं पश्चिम बंगाल है। पटवा के मुताबिक पटवा टोली में बनने वाले 80 फीसदी गमछों के खरीदार पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, झारखंड और उत्तर प्रदेश से हैं। बचे गमछे बिहार में बिक जाते हैं। अमोद ने बताया कि उनके 90 फीसदी खरीदार बंगाल और असम के हैं।

कम मार्जिन से बढ़तीं मुश्किल

गमछों का कारोबार तो बढ़ रहा है मगर मार्जिन घटता जा रहा है, जिससे निर्माताओं को कमाई कम हो रही है। फलधारी प्रसाद कहते हैं, ‘बेहद कम मार्जिन इस उद्योग की सबसे बड़ी दिक्कत है। किसी भी उद्योग में 5-10 फीसदी मार्जन आम बात है मगर गमछा निर्माता 1-2 फीसदी मार्जिन पर ही काम कर रहे हैं। उन्हें एक गमछे पर मुश्किल से 50 पैसे मुनाफा मिलता है और कभी-कभार ही 1 रुपये मिल पाते हैं।’ अमोद ने कहा कि पहले एक गमछे पर 2 रुपये तक मुनाफा मिल जाता था मगर पिछले कुछ साल में कड़ी होड़ के बीच मार्जिन घटकर 1 रुपये से भी नीचे चला गया है। बढ़ती लागत ने भी चोट दी है। कारोबारियों के मुताबिक गमछे बनाने का धागा दक्षिण भारत के राज्यों और पंजाब के पानीपत से आता है। इसकी कीमत 4-5 साल में करीब 10 रुपये बढ़कर अब 80 से 150 रुपये किलोग्राम हो गई है। मजदूरी बढ़ी है और मजदूर घट गए हैं। फलधारी प्रसाद ने कहा कि मजदूरों की किल्लत के बीच पटवा टोली में कारीगर, मुनीम और ढुलाई करने वाले से लेकर हर किसी पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। कारीगरों और बुनकरों को ज्यादा पैसा न दें तो वे काम छोड़कर चले जाते हैं। नए लोगों को काम पर रखने से मुश्किल बढ़ जाती है क्योंकि वे पुराने जितने माहिर नहीं होते।

कोरोना में मास्क बना गमछा

कोरोना महामारी के दौरान ग्रामीण इलाकों में गमछे ने ही मास्क का काम किया था। पटवा बताते हैं कि कोरोना के समय गमछे की मांग इतनी बढ़ गई कि पटवा टोली में एक भी गमछा नहीं बचा था। गमछा आम तौर पर पतले सूती कपड़े से बनाया जाता है और उस पर लाल, नारंगी, हरी चेक अथवा धारीदार डिजाइन भी होती है। ठंड या गर्मी से बचाव में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और नेता भी पार्टी के रंग वाला गमछा पहनते हैं।

क्या है बिहार की गमछा पॉलिटिक्स?

रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले गमछे को इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में नई पहचान मिल गई। 31 अक्टूबर 2025 को मुजफ्फरपुर में रैली संबोधित करने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हेलीकॉप्टर से उतरते ही मधुबनी प्रिंट वाला गमछा करीब 30 सेकंड तक लहराया। मतगणना में राजग की जीत तय होने पर नई दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में भी गमछे लहराए गए। बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण के बाद भी मोदी ने गमछा लहराकर लोगों का अभिवादन किया। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी गमछे का खूब इस्तेमाल करते थे। एक बार उन्होंने एक सभा में हरे रंग के गमछे को अपनी पार्टी राजद का लाइसेंस तक कह दिया था।

बुनकरों का गांव अब बना इंजीनियरों का गांव

पटवा टोली यूं तो बुनकरों के लिए मशहूर है मगर अब इसे शोहरत इसलिए भी मिल रही है क्योंकि बड़ी तादाद में यहां के युवा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (एनआईटी) में पढ़ने चले गए हैं। इसीलिए इसे ‘इंजीनियरों का गांव’ भी कहा जाता है। बताते हैं कि 1991 में एक बुनकर के बेटे जितेंद्र कुमार ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास कर आईआईटी-बीएचयू में दाखिला लिया। उसके बाद लोगों को लगा कि उनके बच्चे भी काबिल बन सकते हैं। अब हर साल इस गांव से दर्जनों छात्र जेईई की परीक्षा उत्तीर्ण कर रहे हैं। आईआईटी स्नातकों ने 2013 में अपने पैसे जोड़कर ‘वृक्ष-बी द चेंज’ संस्था बनाई, जहां बच्चों को मुफ्त कोचिंग, किताबें और ऑनलाइन कक्षाएं मिलती हैं।

First Published : February 16, 2026 | 9:44 AM IST