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बैंक निवेश कंपनी की घोषणा कर सकती है सरकार

Last Updated- December 10, 2022 | 2:14 AM IST

केंद्र सरकार बजट 2021-22 में बैंक निवेश कंपनी (बीआईसी) बनाने की घोषणा कर सकती है। इसी के साथ केंद्र 1970 और 1980 के बैंक राष्ट्रीयकरण अधिनियमों और 1955 के भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) अधिनियम में संशोधन की प्रक्रिया आरंभ करेगा।
ऐसा होने पर केंद्र और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच जून, 2020 से चली आ रही चर्चा की सुखद परिणति होगी। भारतीय बैंक संघ (आईबीए) भी इस दौरान की कुछ चर्चाओं में शामिल रहा था।
राजकोषीय गुंजाइश की कमी और इन बैंकों का मूल्यांकन कम रहने के कारण कुछ सरकारी बैंकों में केंद्र की हिस्सेदारी (यदि भारतीय जीवन बीमा निगम की हिस्सेदारी को भी शामिल कर लें) 90 फीसदी से अधिक रही है।
ऐसे में सरकार के पास दो विकल्प हैं। वह इन बैंकों के पूंजी जुटाने की योजना में शामिल होने से किनारा कर ले या कंपनी अधिनियम (2013) के  तहत बीआईसी की स्थापना करे जिसका सुझाव 2015 में पी जे नायक समिति ने दिया था।
एक सूत्र ने कहा, ‘दूसरे विकल्प (बीआईसी) का पलड़ा अभी भारी लग रहा है और चर्चाओं के सकारात्मक परिणाम के तौर पर यह बजट प्रस्तावों का हिस्सा बन सकता है।’
एक महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि बीआईसी के लिए रकम की व्यवस्था कैसे होगी। आरंभ में इसे पूरी तरह से सरकारी स्वामित्व वाला निकाय बनाया जा सकता है। सूत्र ने कहा कि लेकिन ऐसा करने पर बीआईसी का ढांचा और एक निवेश मध्यस्थ बनने के इसके उद्देश्य पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
इस सूत्र ने कहा, ‘2016 से तीन दौर के पूंजीकरण के बाद कुछ बैंकों में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश के लिए सीमित गुंजाइश को देखते हुए, यह प्रासंगिक लगता है।’
साल 2015-16 और 2019-20 के बीच केंद्र ने इन बैंकों में 3.56 लाख करोड़ रुपये डाला है। ये रकम इक्विटी शेयरों की सीधी खरीद और पुनर्पूंजीकरण बॉन्डों दोनों माध्यम से डाले गए। इनका बाजार पूंजीकरण 4 लाख करोड़ रुपये से उपर है। अंतिम उद्देश्य बीआईसी को सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत लाना है। होल्डिंग कंपनी में केंद्र की हिस्सेदारी 49 फीसदी से कम होगी। एक प्रश्न यह भी उठ रहा है कि क्या सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों में मौजूद सरकार की हिस्सेदारी को एक ही झटके में बीआईसी में स्थानांतरित कर दिया जाएगा। बीआईसी ढांचे को अपनाने के लिए स्पष्ट है कि ये बैंक 1970 और 1980 के बैंक राष्ट्रीयकरण अधिनियमों और 1955 के एसबीआई अधिनियम से बाहर निकले और केवल कंपनी अधिनियम तथा 1949 के बैंकिंग विनियमन अधिनियम से शासित हों।
एक अन्य सूत्र ने कहा, ‘एक बार ये संशोधन लागू हो जाने के बाद इसका कोई मतलब नहीं होता है कि बीआईसी ढांचे को एक बार में अपनाया जाता है या फिर चरणबद्घ तरीके से।’ उन्होंने कहा, ‘बीआईसी में बदले जाने वाले बैंकों का चुनाव पूंजी डालने और सरकार की वित्तीय गुंजाइश के लिहाज से अत्यावश्यक कार्य है।’ हालांकि, परिचालनों में अनुरूपता के लिहाज से यह कदम एक बार में ही उठाया जा सकता है।
2020-21 की समाप्ति से पहले निजी बैंकों पर अंतिम मसौदा संहिता को भी प्रस्तुत किया जा सकता है।  

First Published - January 8, 2021 | 11:28 PM IST

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