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कुछ समय के लिए इस्पात के वायदा कारोबार पर लग सकता है ब्रेक

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Last Updated- December 05, 2022 | 10:41 PM IST

शाहजहांपुर के 34 साल के सांसद जतिन प्रसाद पहली बार मंत्री बने हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे जितेंद्र प्रसाद के पुत्र ने केंद्रीय इस्पात मंत्रालय में राज्य मंत्री का पदभार ग्रहण किया है।


उन्होंने ऐसे समय में पद संभाला, जब इस्पात की कीमतें चरम पर हैं और उत्पादकों पर काटर्ेल बनाने का आरोप लग रहा है। कार्यभार ग्रहण करने के बाद जतिन प्रसाद सबसे पहले सेल के भिलाई इस्पात संयंत्र गए, जहां उन्होंने उत्पादन प्रक्रिया के बारे में जानकारी हासिल की। उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड संवाददाता अजय मोदी  से इस सेक्टर के बारे में अपने विचार, उसके महत्व और चुनौतियों के बारे में बातचीत की। पेश हैं खास अंश…


क्या आपको इस्पात मंत्रालय आपकी इच्छा से मिला?


नहीं। यह मेरे नेताओं, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुझे दिया। यह काम मुझे सौंपा गया है और मैं चाहता हूं कि पूरी गंभीरता से यह जिम्मेदारी निभाऊं। मुझेअपने नेताओं के विश्वास पर खरा उतरना है।


वित्त मंत्री ने हाल ही में उद्योगों के काटरेल की बात की थी। क्या आप उनके विचारों से सहमत हैं?


वित्त मंत्री ने निश्चित रूप से कुछ सोच-समझकर ही इस क्षेत्र में काटरेलाइजेशन की बात कही है। मैं निश्चित रूप से तो कुछ नहीं कह सकता कि काटरेल है, या नहीं। बहरहाल यह तो कहा ही जा सकता है कि कंपनियों के बीच इस तरह की कुछ आपसी सहमति जरूर है, जिसका असर कीमतों पर पड़ रहा है। हाल ही में तीन बड़ी इस्पात कंपनियों ने एक साथ समान दर से स्टील की कीमतें बढ़ाईं हैं।


वर्तमान में बढ़ रही मुद्रास्फीति में इस्पात की कीमतें बढ़ने का असर आप कितना मानते हैं?


थोक मूल्य सूचकांक में लौह अयस्क को मिलाकर इस जिंस का भार 3.64 प्रतिशत है। इस तरह कीमतें बढ़ने का असर मुद्रास्फीति पर उस अनुपात में पड़ना तय है। बहरहाल अगर कोई यह कहता है कि मुद्रास्फीति बढ़ने की एकमात्र वजह इस्पात की कीमतों में बढ़ोतरी है, तो यह अतिशयोक्ति होगी।


बाजार अर्थव्यवस्था में कीमतें पूरी तरह से मांग और आपूर्ति से संचालित होती हैं। बहरहाल, देर से ही सही, सरकार ने कंपनियों से कीमतों पर लगाम लगाने को कहा है। क्या आप इसे सकारात्मक कदम मानते हैं?


यह एक अनियमित क्षेत्र है, लेकिन एकाधिकार की प्रवृत्ति और अनियंत्रित और एकपक्षीय कीमतों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। कीमतों में किसी भी तरह की बढ़ोतरी तभी होती है, जब कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी होती है। दुर्भाग्य की बात यह है कि कीमतों में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई है, जबकि उस अनुपात में कच्चे माल की कीमतें नहीं बढ़ीं है। ऐसी हालत में कंपनियों का लाभ कमाना सामान्य बात है, लेकिन कीमतों में बढ़ोतरी अनियंत्रित रूप से नहीं होनी चाहिए।


इस्पात की कीमतों में बढ़ोतरी को रोकने के लिए सरकार किन कदमों पर विचार कर रही है?


हम आयात शुल्क में कटौती और उत्पाद शुल्क कम करने जैसे विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। अनावश्यक हेजिंग और अधिक भाव पर माल बेचने की आशा के चलते भी कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि इस्पात का वायदा कारोबार कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया जाना चाहिए।


इस्पात की कीमतों में बढ़ोतरी की मुख्य वजह क्या मानते हैं?


कीमतों में बढ़ोतरी की मुख्य वजह मांग और आपूर्ति का अंतर है। साथ ही इसमें लगने वाले कच्चे माल जैसे लौह अयस्क और कोयले के दामों में बढ़ोतरी का भी असर कीमतों पर पड़ा है। मांग में जहां 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, वहीं आपूर्ति में केवल 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह बड़ा अंतर है। हमारी कोशिश है कि आपूर्ति को बढ़ाया जाए जिससे मांग के बढ़ते दबाव को कम किया जा सके। आज 20-30 लाख टन की कमी है। हम उम्मीद करते हैं कि 2011-12 तक क्षमता वृध्दि के बाद हमारे पास अतिरिक्त माल की स्थिति हो जाएगी।


क्षमता में बढ़ोतरी करने की प्रक्रिया में अक्सर देरी होती है। क्या मंत्रालय इस बात की कोशिश कर रहा है कि परियोजनाओं में होने वाली अनावश्यक देरी को रोका जा सके?


सामान्यतया देरी इसलिए होती है कि इन परियोजनाओं में केंद्र और राज्य स्तर पर कई मंत्रालय शामिल होते हैं। किसी भी मंत्रालय से संबंधित मंजूरी को छोड़ा नहीं जा सकता है। हमने एक अंतर मंत्रालयीय समूह का गठन किया है। यह क्षमता विस्तार की नई परियोजनाओं का समन्वयन करेगा।


कीमतें कम करने का एक उपाय यह है कि विनिर्माण प्रक्रिया में प्रयोग होने वाले कच्चे माल की कीमतें कम हों। क्या इस दिशा में भी कोई पहल की जा रही है?


हम उच्च गुणवत्ता वाले अयस्क की देश में कमी होने के बावजूद भी हर तरह की कोशिश कर रहे हैं। निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर भी घरेलू विनिर्माताओं की मांगें पूरी करने की कोशिश की जा रही है।


इस्पात मंत्री के रूप में आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं?


मेरा पहला लक्ष्य कीमतें कम करना है। इसके साथ ही उत्पादन क्षमता की बढ़ोतरी भी प्राथमिकता में शामिल है। बढ़ते हुए उपभोग को देखते हुए मांगें पूरी करने के लिए उद्योग जगत को क्षमता बढ़ाना होगा। नई और हरित तकनीक के लिए उत्पादकों को बढावा दिया जाएगा। वर्तमान में भारत में प्रति व्यक्ति इस्पात की खपत 46 किलोग्राम है, जबकि विकसित देशों में यह 150 किलोग्राम और विकासशील देशों में 400 किलोग्राम है। खपत को बढ़ाने के लिए भी क दम उठाए जाएंगे। इसके साथ ही उपलब्धता को भी सुनिश्चित किया जाएगा।

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First Published - April 20, 2008 | 10:55 PM IST

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