New GDP Series: भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की गणना में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब 2011-12 की जगह 2022-23 को नया आधार वर्ष यानी बेस ईयर बनाया जाएगा। सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय आज 27 फरवरी को नई जीडीपी सीरीज जारी करेगा।
आधार वर्ष वह साल होता है, जिसे मानकर देश की अर्थव्यवस्था की बढ़त को मापा जाता है। इससे महंगाई का असर अलग कर दिया जाता है, ताकि पता चल सके कि सच में कितना उत्पादन और काम बढ़ा है। अगर आधार वर्ष बहुत पुराना हो जाए, तो वह आज की अर्थव्यवस्था, नई तकनीक, डिजिटल सेवाओं और लोगों के खर्च करने की आदतों को सही तरीके से नहीं दिखा पाता। इसलिए कुछ साल बाद इसे बदलना जरूरी होता है।
New GDP Series में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब महंगाई का असर निकालने का तरीका बदला गया है। पहले जीडीपी को महंगाई से अलग करने के लिए सीमित संख्या में कीमतों के सूचकांक इस्तेमाल होते थे। अब सरकार ज्यादा बारीकी से, हर सेक्टर के हिसाब से अलग-अलग कीमतों के आंकड़े लेगी।
पहले करीब 180 कीमत संकेतकों का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब 500 से 600 तक अलग-अलग कीमतों के संकेतक शामिल किए जाएंगे। ये आंकड़े उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और थोक मूल्य सूचकांक के अलग-अलग हिस्सों से लिए जाएंगे। इसका मकसद यह है कि असली उत्पादन और वृद्धि को ज्यादा सही तरीके से मापा जा सके।
अब हर सेक्टर की गिनती उसकी अपनी कीमतों के आधार पर की जाएगी। यानी पूरी अर्थव्यवस्था की एक औसत कीमत मानने के बजाय, जिस सेक्टर की बात हो रही है उसी से जुड़ी कीमतों को ध्यान में रखा जाएगा। इससे उस सेक्टर की असली स्थिति ज्यादा साफ तरीके से सामने आएगी।
यह भी पढ़ें | New GDP Series में बड़ा बदलाव, अब बदलेगी विकास दर की तस्वीर
New GDP Series में एक बड़ा बदलाव ‘डबल डिफ्लेशन’ है, जिसे खासकर मैन्युफैक्चरिंग और कुछ अन्य सेक्टर में लागू किया जाएगा। पहले उत्पादन को महंगाई से अलग करने के लिए एक ही कीमत सूचकांक का इस्तेमाल होता था। अब उत्पादन की बिक्री कीमत और कच्चे माल की लागत, जैसे धातु, ईंधन या आयातित सामान की कीमत, दोनों को अलग-अलग गिना जाएगा। इससे यह साफ पता चलेगा कि असली बढ़ोतरी कितनी हुई है और सिर्फ महंगाई की वजह से बढ़ा मुनाफा वृद्धि नहीं माना जाएगा।
सरकार का कहना है कि इससे खासकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जीडीपी के आंकड़े ज्यादा सटीक होंगे।
एक और चिंता यह है कि जीडीपी का नया आधार वर्ष 2022-23 होगा और सीपीआई को भी 2024 में बदला जा रहा है, लेकिन थोक मूल्य सूचकांक अभी भी 2011-12 पर ही आधारित है। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जब अलग-अलग आंकड़ों का आधार वर्ष अलग होगा, तो उनमें तालमेल की दिक्कत आ सकती है। उनका मानना है कि थोक सूचकांक के पुराने वजन और थोक व खुदरा कीमतों के अंतर की वजह से महंगाई का सही असर निकालने में थोड़ी गड़बड़ी हो सकती है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अब ज्यादा बारीकी से और हर सेक्टर के अलग-अलग आंकड़े इस्तेमाल किए जाएंगे, इसलिए इस बदलाव का असर बहुत बड़ा नहीं होगा। उनका मानना है कि नए तरीके से आंकड़े ज्यादा संतुलित और सही रहेंगे।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि नई जीडीपी सीरीज़ आने से देश की कुल वृद्धि दर में बहुत बड़ा बदलाव शायद नहीं दिखेगा, लेकिन अलग-अलग सेक्टर के आंकड़ों में कुछ फर्क आ सकता है। सरकार का कहना है कि अब नए डेटा स्रोत, कीमतों को एडजस्ट करने के बेहतर तरीके और आधुनिक पद्धति अपनाई गई है। इससे जीडीपी के आंकड़े पहले के मुकाबले अर्थव्यवस्था की असली और ज्यादा साफ तस्वीर दिखाएंगे।