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EPFO की नई रणनीति: ₹30 लाख करोड़ के फंड को सुरक्षित करने के लिए बनेगी ‘एग्जिट पॉलिसी’

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ईपीएफओ अपने 30 लाख करोड़ के फंड को सुरक्षित करने के लिए एक नई 'निकास नीति' बना रहा है, ताकि घटिया रेटिंग वाली कॉरपोरेट प्रतिभूतियों से समय पर निकला जा सके

Last Updated- April 13, 2026 | 10:00 PM IST
EPFO
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) अपने निवेश पोर्टफोलियो के लिए एक औपचारिक निकास नीति पर काम कर रहा है। संगठन अपने 30 लाख करोड़ रुपये से अधिक के फंड में घटिया और तनावग्रस्त कॉर्पोरेट डेट की बढ़ती हिस्सेदारी से निपटने की रणनीति पर काम कर रहा है। इस मामले से जुड़े 2 लोगों ने यह जानकारी दी।

ईपीएफओ का निवेश मुख्य रूप से फिक्स्ड इनकम पर केंद्रित है, जिसमें ऋण की महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी है। दिसंबर 2025 तक इसका करीब 18.9 प्रतिशत निवेश श्रेणी-2 के अंतर्गत था, जिसमें मुख्य रूप से कॉरपोरेट बॉन्ड शामिल हैं। साथ ही अन्य डेट सेग्मेंट में भी निवेश है।  इस मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने कहा कि इसमें से कम से कम 17 प्रतिशत घटिया प्रतिभूतियां हैं। 

प्रस्तावित निकास नीति का मकसद कम गुणवत्ता वाले निवेश से निपटने के लिए एक दृष्टिकोण पत्र तैयार करना है। यह पोर्टफोलियो प्रबंधकों को निकास के निर्णयों की जिम्मेदारी सौंप सकती है। चर्चा के तहत मुद्दों में यह शामिल है कि क्या रेटिंग स्वीकृत स्तर से नीचे गिरने के बाद निवेश बेचे जाने चाहिए, बाजार की बिक्री में स्वीकार्य नुकसान की सीमा क्या होगी और ऐसे निर्णयों के लिए जिम्मेदारी कैसे तय की जानी चाहिए।  सूत्रों ने कहा कि नीति में इस मसले पर भी विचार हो सकता है कि ऐसे निर्णय पोर्टफोलियो प्रबंधकों के प्रदर्शन संबंधी मूल्यांकन को कैसे प्रभावित करते हैं।

ईपीएफओ की निवेश समिति के भीतर हुई चर्चा के बाद यह कदम उठाया जा रहा है, जिसमें ऐसी स्थिति से निपटने के लिए पारिभाषित ढांचे की कमी पाई गई थी।  पहले के मामलों में, रिलायंस कैपिटल में एक्सपोजर सहित, निवेश रखने या बेचने के बारे में निर्णय उस विशेष मामले के आधार पर लिया गया और उन पर फैसला बाजार की स्थिति और दबाव वाली  प्रतिभूतियों के खरीदारों की उपलब्धता के आधार पर हुआ। 

रिलायंस कैपिटल में डिफॉल्ट और बाद की समाधान कार्यवाही के समय  ईपीएफओ का एक्सपोजर 33 अरब रुपये से अधिक था। ईपीएफओ ने इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) में लगभग 5.8 अरब रुपये का निवेश भी किया है, जिसमें चल रही समाधान प्रक्रिया के बीच ब्याज सहित कुल दावे 6 अरब रुपये से अधिक हो गए हैं। पंजाब स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन और उत्तर प्रदेश फाइनैंशियल कॉर्पोरेशन सहित अन्य  ऋणों में ब्याज भुगतान में देरी देखी गई है। 

कुछ मामलों में यह एक दशक से अधिक समय तक चली है।

खराब गुणवत्ता की तमाम प्रतिभूतियों ने ब्याज भुगतान करना जारी रखा है, लेकिन उनकी कम क्रेडिट रेटिंग के कारण उन्हें बेचना मुश्किल है। एक बार जब रेटिंग गिरकर निवेश ग्रेड से नीचे आ जाती है, खरीदारों का पूल सीमित हो जाता है और इस तरह की सिक्योरिटीज को अक्सर कम कीमत पर बेचना पड़ता है। इसकी वजह से ईपीएफओ जैसे बड़े निवेशकों के लिए निकलना कठिन हो जाता है। पोर्टफोलियो प्रबंधकों ने निवेश समिति से कहा कि कम ट्रेडिंग वॉल्यूम के कारण खरीदारों से सामान्यतया सीधे संपर्क होता है और फैसला करनेसे पहले ही कीमत का  संकेत मिल जाता है। 

चर्चा के दौरान परामर्शदाता क्रिसिल ने मसौदा निकास नीति प्रस्तुत किया, जिसमें अन्य पेंशन फंडों द्वारा अपनाई गई रणनीतियों की तुलना और रिलायंस कैपिटल और येस बैंक जैसे मामलों पर आधारित उदाहरण शामिल थे। यह भी देखा गया कि पोर्टफोलियो प्रबंधकों ने आम तौर पर डाउनग्रेडेड प्रतिभूतियों को बनाए रखने की सिफारिश की है। कुछ अधिकारियों ने संकेत दिया कि बिक्री की सिफारिश करने के लिए प्रोत्साहन सीमित हो सकते हैं।

इस सिलसिले में ईपीएफओ को भेजे गए ईमेल का जवाब खबर छपने को भेजे जाने तक नहीं मिल सका। 

निवेश समिति में अलग अलग विचार सामने आए। कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि निवेश को स्वीकृत स्तर से नीचे डाउनग्रेड होने के बाद बेचा जाना चाहिए, साथ ही संभावित नुकसान को कवर करने के लिए धनराशि अलग रखी जानी चाहिए। अन्य सदस्यों ने ऐसी प्रतिभूतियों के लिए सीमित बाजार का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे बिक्री से नुकसान हो सकता है या उनकी बिक्री नहीं हो सकती है। नुकसान से जुड़े बिक्री के लिए एक निर्णय लेने की प्रक्रिया को परिभाषित करने के सुझाव भी दिए गए।

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First Published - April 13, 2026 | 9:56 PM IST

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