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ब्याज पर केंद्र को 2 हफ्ते का वक्त

Last Updated- December 15, 2022 | 2:20 AM IST

उच्चतम न्यायालय ने कर्ज अदायगी पर स्थगन के मामले में समाधान का अंतिम प्रस्ताव दो हफ्ते में जमा करने का केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को आज निर्देश दिया। साथ ही किसी भी कर्ज को अगले आदेश तक गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) घोषित नहीं किए जाने संबंधी अपने अंतरिम आदेश की मियाद भी बढ़ा दी।
न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अगुआई वाले तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी और इस मामले में अब कोई भी स्थगन नहीं दिया जाएगा। सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि कोविड महामारी के दौरान किस्तों की अदायगी पर लगी रोक के दौरान बैंकों द्वारा ब्याज लिए जाने पर विचार के लिए एक विशेषज्ञ पैनल बनाया गया है। खंडपीठ ने कहा कि वह स्थगन अवधि के दौरान कर्ज के ब्याज पर ब्याज लिए जाने को दंडात्मक ब्याज मान रहा है और इसे हटाना चाहता है। पीठ ने कहा, ‘पूरी स्पष्टता के साथ ठोस निर्णय लिए जाएं ताकि मामले को फिर स्थगित न करना पड़े।’
खंडपीठ उस याचिका की सुनवाई कर रहा है जिसमें महामारी के दौरान कर्जदारों को किस्तों की अदायगी से दी गई छूट के बीच बैंकों द्वारा ब्याज वसूले जाने को चुनौती दी गई है। आगरा निवासी गजेंद्र शर्मा की ओर से दायर इस याचिका में कहा है कि आरबीआई की 27 मार्च को जारी अधिसूचना के कुछ हिस्से को केंद्रीय बैंक के अधिकार क्षेत्र के परे घोषित किया जाए। याची के मुताबिक स्थगन अवधि में कर्ज पर ब्याज लगाया जाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत कर्जदार को मिले जीवन के अधिकार में अवरोध पैदा करता है।
बाद में कुछ अन्य क्षेत्रों के संगठन भी इस मामले का हिस्सा बन गए। इनकी मांग है कि स्थगन काल में निलंबित मासिक किस्तों पर ब्याज लेने या उस ब्याज पर ब्याज न लिया जाए। ऐसी मांग करने वालों में रियल एस्टेट, होटल, बिजली उत्पादक और शॉपिंग मॉल जैसे क्षेत्रों के निकाय शामिल हैं।
सोलिसिटर जनरल ने कहा कि दो हफ्ते के भीतर सरकार इन सभी मांगों पर गौर कर उचित निर्णय ले लेगी। उन्होंने कहा कि इस मामले पर गठित विशेषज्ञ पैनल की अब तक दो-तीन दौर की बैठक हो चुकी है। उन्होंने कहा कि सभी संबद्ध पक्षों की सलाह से कोई फैसला लिया जाना है, लिहाजा सुनवाई को दो हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया जाए।
बैंकों की तरफ  से पेश हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि निजी कर्जदारों के संदर्भ में मानक एवं दिशानिर्देश भी जारी करने होंगे। इस पर मेहता ने कहा कि व्यापक मानक तय करने का काम वित्त मंत्रालय के स्तर पर किया जा रहा है।
अमूमन सभी याचियों का कहना है कि कर्जदारों को राहत देने का मसला अकेले आरबीआई पर ही नहीं छोड़ा जाना चाहिए। केंद्रीय बैंक ने राहत देने का जिम्मा कर्जदाता वित्तीय संस्थानों के विवेक पर छोड़ दिया है।
साल्वे ने इस मसले के विरोधात्मक रूप अख्तियार कर लेने की बात कही तो खंडपीठ ने इसे खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि ब्याज के संदर्भ में उसने अभी कोई निर्णय नहीं लिया है लेकिन ब्याज पर ब्याज लिए जाने के मसले पर वह आदेश जारी करने का इच्छुक है।
आरबीआई का कहना है कि ऋण अदायगी में स्थगन के छह महीनों में कर्ज पर ब्याज नहीं लेने पर बैंकिंग क्षेत्र को करीब 2 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा।

First Published - September 10, 2020 | 11:12 PM IST

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