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…भला मैं क्यूं जाऊं परदेस, मुझे तो प्यारा लागे देस

Last Updated- December 05, 2022 | 9:26 PM IST

मोबाइल फोन के क्षेत्र में एक नामी बहुराष्ट्रीय कंपनी को आजकल अजीबोगरीब परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल जैसे ही कंपनी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को तरक्की देकर विदेश जाने के लिए कहती है, वे इस्तीफा थमा देते हैं।


यह परेशानी केवल एक कंपनी की नहीं है, तमाम कंपनियों को इस मुसीबत से दोचार होना पड़ रहा है। इसकी वजह भी भारत ही है। दरअसल प्रतिभा पलायन या ब्रेन ड्रेन अब कल की बात हो गई है। कंपनियों के शीर्ष क्रम के लिए देश में ही अब इतने शानदार मौके मौजूद हैं कि वे विदेश का रुख ही नहीं करना चाहते। और अगर कंपनी ज्यादा जोर देती है, तो नौकरी को लात मार देते हैं।


सीईओ की पहली पसंदभारत अब देशी और विदेशी दिग्गजों की पहली पसंद बनता जा रहा है। विदेशों में जन्मे तमाम कंपनी प्रमुख भी अब भारत आना ही पसंद कर रहे हैं। इसकी वजह वेतन और दूसरी सुविधाएं हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब भारत में भी वही वेतन देने को राजी हैं, जो विदेश में जाकर मिलता है। कई बार तो विदेशों के मुकाबले देश में ही ज्यादा वेतन मिल रहा है।


अधिकारियों की तलाश और नियुक्ति में मदद करने वाली अमेरिकी कंपनी स्पेंसर-स्टुअर्ट का अध्ययन भी यही कहता है। दुनिया भर की कंपनियों के लिए स्पेंसर-स्टुअर्ट मुख्य कार्यकारी (सीईओ), अध्यक्ष और मुख्य परिचालन अधिकारी (सीओओ) तलाशती है। फार्च्यून 500 सूची में शामिल आधी से अधिक कंपनियों के लिए भारत में भी शीर्ष अधिकारी वही नियुक्त करती है। रिटेल, रियल एस्टेट, बिजली, तेल एवं गैस और रिफाइनिंग, परिवहन वगैरह में कंपनी का दखल है।


इनमें शीर्ष अधिकारियों को आजकल साढ़े सात लाख डॉलर से लेकर 15 लाख डॉलर तक का वेतन मिल रहा है। इसके अलावा कंपनी के शेयर भी उनके नाम आवंटित किए जाते हैं।पगार भी दोगुनीइन क्षेत्रों में नियुक्त किए जाने वाले आधे सीईओ और सीओओ विदेशी होते हैं, जिनमें प्रवासी भारतीय भी शामिल होते हैं। इन क्षेत्रों में सीईओ की पगार दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले करीब दोगुनी होती है।स्पेंसर-स्टुअर्ट की प्रबंध निदेशक अंजलि बंसल कहती हैं, ‘विदेशियों को भारत का बाजार दिनोदिन लुभावना लगता जा रहा है।


स्थापित हो चुके बाजारों के मुकाबले यहां काम करना ज्यादा आसान है। कुछ खास क्षेत्रों की बात करें, तो भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कंपनियों जितना वेतन देने के लिए तैयार हैं।’मुश्किल तो यह है कि विदेशों में शीर्ष पदों पर जाने के लिए भारतीय ही तैयार नहीं हो रहे। दरअसल उसी पगार पर उन्हें देश में वाजिब रोजगार मिल जा रहा है।स्पेंसर-स्टुअर्ट ने इसी वजह से कंपनियों को अपने क्षेत्रीय मुख्यालय सिंगापुर या हाँगकाँग जैसी जगहों से हटाकर भारत में लाने की सलाह दी है।


इससे वरिष्ठ भारतीय अधिकारी यहीं से काम कर सकेंगे। कई कंपनियां तो इस सलाह पर काम भी शुरू कर चुकी हैं।अमेरिका पिछड़ाभारतीय कंपनियों के लिए सीईओ की कई देशों में तलाश की जा रही है, पर अमेरिका को तरजीह नहीं दी जा रही है। रियल एस्टेट के लिए ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण पूर्व एशिया और ब्रिटेन जैसे देशों को खंगाला जा रहा है। तेल, गैस, बिजली कंपनियां कजाखस्तान, उत्तरी समुद्री क्षेत्र, कनाडा और पश्चिम एशिया पर निगाह गड़ाए हैं।

First Published - April 15, 2008 | 2:49 AM IST

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