सेनवैट कटौती से नीचे गिरेंगी पहाड़ पर बैठी दवा कंपनियां

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 08, 2022 | 8:41 AM IST

केंद्रीय उत्पादन शुल्क (सेनवैट) में कटौती के सरकारी फैसले से कई दवा कंपनियां खुश हुई हैं, तो कुछ को मायूसी हाथ लगी है।


दरअसल जिन कंपनियों के संयंत्र हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में हैं, उन्हें इस राहत का कोई फायदा नहीं मिलेगा क्योंकि इन जगहों पर उत्पाद शुल्क पहले ही शून्य है।

इस कारण दूसरी कंपनियां जहां दाम घटा पाएंगी, वहीं इन इलाकों की कंपनियां कीमतों में तब्दीली नहीं कर पाएंगी।

सरकार ने हाल में सेनवैट में 4 प्रतिशत की कटौती की है। माना जा रहा है कि इसके बाद दवाओं की कीमतें कुछ कम हो जाएं, जिससे उत्पाद शुल्क लागू नहीं होने वाले राज्यों के बाहर उत्पादन इकाई वाले दवा निर्माता कंपनियां दूसरी कंपनियों के बराबर खड़ी हो जाएं।

देश के कुल 60,000 करोड़ रुपये का दवा उत्पादन का आधे से अधिक हिस्सा उन राज्यों में होता है, जहां उत्पाद शुल्क लागू नहीं होता।

इन दवाओं का आउटसोर्स करने वाली घरेूल फार्मास्युटिकल क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती का मतलब है कि उनके लिए आउटसोर्स के और अधिक दरवाजे खुल गए हैं और इसलिए अब आस-पास से दवाएं मंगाने की उनकी समस्या हल हो गई है।

उत्पाद शुल्क मुक्त उत्पादन इकाइयों के संघ-फार्मास्युटिकल उद्यमी महासंघ (एफओपीई) को कारोबार पर बुरा असर पड़ने की आशंका है। संघ को लगता है कि भविष्य में यहां कि कंपनियों के ठेके खत्म हो सकते हें।

एफओपीई के महासचिव बी आर सिकरी का कहना है, ‘जिस क्षेत्र में उत्पाद शुल्क लागू नहीं होता, वहां के ज्यादातर दवा निर्माता ठेके पर दवाएं बनाते हैं। उत्पाद शुल्क में इस कटौती के साथ हमारे ग्राहक स्थानीय स्रोतों से उनकी दवाएं लेना ज्यादा पसंद करेंगे। इसका हम पर भारी असर पड़ेगा।’

संघ ने वित्त मंत्रालय को मिलने की योजना बनाई है, ताकि मंत्रालय कर मुक्त राज्यों को ठेके पर दवा निर्माता राज्य बनाने के लिए कुछ प्रयास किए जा सकें।

हालांकि सरकार के इस कदम का कर योग्य क्षेत्रों के एक संघ-छोटे एवं लघु उद्यमी फार्मा उद्योग परिसंघ (एसपीआईसी) ने स्वागत किया है।

संघ के महासचिव जगदीप सिंह का कहना है, ‘जब से कर-मुक्त राज्य दवा आउटसोर्सिंग का केंद्र बने हैं, कंपनियों ने दूसरे क्षेत्रों की ओर बढ़ना शुरू कर दिया है।

उत्पाद शुल्क के कारण काफी बड़ा अंतर आ गया है। अब जब प्रभावित करने वाले दवाओं पर उत्पाद शुल्क 4 प्रतिशत कम हो गया है (पहले 8 प्रतिशत था) तो यह अंतर कम हो रहा है।’

सरकारी फैसले पर कमर कसते हुए राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने यह लाभ ग्राहकों को पहुंचाने के लिए कीमतों में सुधार लाना जारी कर दिया है।

First Published : December 10, 2008 | 11:30 PM IST