जगदीश खट्टर 1965 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल हुए और अपने परिवार में नौकरी करने वाले पहले सदस्य थे। परिवार के बाकी सभी सदस्य खुद के कारोबार में लगे थे। पिछले मंगलवार को जब खट्टर ने घोषणा की कि वह उद्यमियों की सूची में शुमार हो गए हैं तो एक तरह से उन्होंने अपने परिवार के नक्शे कदम पर ही चलने का संकेत दे दिया।
खट्टर ने अपनी कंपनी का नाम कार्नेशन इंडिया लिमिटेड रखा है जो समूचे भारत में कारों के लिए मल्टी ब्रांड सेल और सर्विस नेटवर्क उपलब्ध कराएगी।
सीमा बंटवारे के बाद पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के डेरा इस्माइल खान से खट्टर का परिवार दिल्ली आ गया था और तब खट्टर ने गांधी पथ नाम की एक फिल्म में काम भी किया था। भले ही यह फिल्म कभी प्रदर्शित नहीं हुई पर फिर भी उन्हें जागृति और राज कपूर की बूट पॉलिश में काम करने का प्रस्ताव मिला था। पर उस समय खट्टर कक्षा 2 में थे और उनके पिता चाहते थे कि वह फिल्मों में काम करने की बजाय अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें। उन्होंने डीपीएस मथुरा रोड से अपनी पढ़ाई पूरी की और मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी उनके सहपाठी रहे हैं।
खट्टर आम नौकरशाहों की तरह नहीं रहे हैं। अक्सर किसी मामले में निर्णय लेने में इस वजह से देर होती है क्योंकि फैसला कई चरणों में होता है। पर खट्टर ने इन्हें दूर करने की कोशिश की ताकि किसी विषय पर तत्काल निर्णय लिया जा सके। इंजीनियरिंग समेत कुछ और उद्योगों के लिए जरूरी कच्चा माल पिग आयरन के मुक्त उत्पादन को मंजूरी देने में भी उनका खासा योगदान था।
नौकरशाह के तौर पर अपनी पारी के दौरान वह ज्यादातर राज्य की इकाइयों के साथ ही जुड़े रहे। खट्टर अब भी उनसे बड़ा जुड़ाव महसूस करते हैं और इसी वजह से उनका कहना है, ‘मैंने उन्हें अपनी खुद की कंपनियों की तरह समझा है।’ यूं तो इन दिनों किसी ब्रांड के प्रचार के लिए बड़ी और नामी हस्तियों को अनुबंधित करना आम है पर खट्टर ने सालों पहले प्रचार के लिए चमकते सितारों को चुना था। जब वह चाय बोर्ड के प्रमुख थे तो उन्होंने भारतीय चाय के प्रचार के लिए मशहूर क्रिकेटरों इयान बॉथम और सुनील गावस्कर को चुना था।
1990 के शुरुआती सालों में जब खट्टर संयुक्त सचिव के पद पर थे तो उन्हें लगने लगा कि अब सरकारी क्षेत्र में उनके लिए बहुत संभावनाएं नहीं बची हैं। कुछ ही समय बाद उन्हें आर सी भार्गव से मिलने का मौका मिला जिन्होंने मारुति उद्योग लिमिटेड के साथ जुड़ने के लिए सरकारी पद छोड़ा था। ऐसा तय हुआ कि खट्टर मारुति के साथ जुड़ेंगे और 1997 में भार्गव की जगह पर कंपनी के प्रबंध निदेशक का पद संभालेंगे। लेकिन सरकार ने आरएसएसएलएन भास्करुडु को एमडी मनोनीत किया पर यह सुजूकी को मंजूर नहीं था। इस बात को लेकर दोनों का झगड़ा अदालत तक गया। खट्टर एक तरह से इस विवाद के बीच में शांत दर्शक की तरह खड़े थे। उन्होंने तब तक शांत रह कर इंतजार किया जब तक मामला सुलझ नहीं गया और जुलाई 1999 में उन्हें कंपनी का एमडी बना दिया गया।