Stock Market Outlook: केंद्रीय बजट 2026–27 के बाद शेयर बाजार में कोई बड़ी तेजी देखने को नहीं मिली, लेकिन निवेश विशेषज्ञों का मानना है कि यह बजट भारत की अर्थव्यवस्था को लंबे समय के लिए मजबूत दिशा में ले जाता है। ऐसे समय में, जब दुनिया भर में अनिश्चितता बढ़ रही है और निवेश का रुख बदल रहा है, भारत की स्थिति पहले से ज्यादा मजबूत नजर आती है। छोटे निवेश पोर्टफोलियो मैनेजर्स यानी स्मॉलकेस मैनेजर्स का कहना है कि मौजूदा बाजार हालात में धैर्य रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, इस समय जल्दी मुनाफे के पीछे भागने के बजाय अनुशासित निवेश और लंबी अवधि की सोच ज्यादा फायदेमंद होगी।
निवेश विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक रफ्तार धीमी हो रही है। कंपनियों की कमाई में सुधार आने में समय लग रहा है और नीतियों के असर को दिखने में भी वक्त लगेगा। ऐसे में बाजार की धारणा कमजोर बनी हुई है। खास बात यह है कि कई निवेशक, जो कोविड के बाद आई तेजी के दौरान बाजार में आए थे, अब पहली बार लंबे समय तक सुस्त रिटर्न देख रहे हैं। यही वजह है कि बाजार में बेचैनी बढ़ी है।
ग्रीन पोर्टफोलियो के सीईओ और सह-संस्थापक दिवम शर्मा का कहना है कि भारतीय बाजार अब एक ज्यादा मैच्योर चरण में पहुंच रहा है। उनके मुताबिक, देश की नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ का करीब 10 प्रतिशत पर स्थिर होना कमजोरी नहीं, बल्कि सामान्य स्थिति की ओर लौटने का संकेत है। उनका कहना है कि स्मॉलकैप शेयरों में आई गिरावट और वैल्यूएशन में सुधार बाजार के इतिहास के मुताबिक सामान्य बात है। इसे भारत की ग्रोथ कहानी के टूटने के तौर पर नहीं, बल्कि लंबी अवधि में संपत्ति बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा समझना चाहिए।
शुरुआत में निवेशकों का ध्यान डेरिवेटिव टैक्स बढ़ने और बड़े टैक्स राहत उपायों के न होने पर गया। लेकिन बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि बजट की असली ताकत सुर्खियों से परे है। विशेषज्ञ संजीत सिंह का कहना है कि बजट में रक्षा उत्पादन, सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ मिनरल्स और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने पर खास जोर दिया गया है। सरकार साफ तौर पर अल्पकालिक लोकप्रियता के बजाय लंबे समय के आर्थिक लक्ष्यों को प्राथमिकता दे रही है और साथ ही वित्तीय अनुशासन भी बनाए रख रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट में किए गए खर्च से साफ संकेत मिलते हैं कि आने वाले वर्षों में किन सेक्टरों में कमाई की बेहतर संभावना बन सकती है। रक्षा और रणनीतिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सरकार ने विमान, भारी वाहन, इंजन, रिसर्च और उपकरणों पर पूंजीगत खर्च बढ़ाया है। इससे रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों और इंजीनियरिंग फर्मों को लंबे समय तक फायदा मिल सकता है। मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को देश के भीतर मजबूत करने पर भी जोर है। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल और कैपिटल गुड्स जैसे क्षेत्रों में प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं।
इससे इनसे जुड़े उद्योगों में निवेश के मौके बन सकते हैं। ऊर्जा क्षेत्र में बजट ने संतुलित रुख अपनाया है। एक तरफ रूफटॉप सोलर और न्यूक्लियर पावर पर निवेश बढ़ाया गया है, वहीं दूसरी ओर कोल गैसीफिकेशन के जरिए ऊर्जा सुरक्षा पर भी ध्यान दिया गया है। इससे क्लीन एनर्जी, उपकरण बनाने वाली कंपनियों और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को फायदा मिल सकता है। इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स पर खर्च जारी रहने से बंदरगाहों, जलमार्गों और परिवहन से जुड़े क्षेत्रों में मांग बढ़ने की उम्मीद है। इसका असर कैपिटल गुड्स, शिपबिल्डिंग और कमर्शियल व्हीकल सेक्टर पर पड़ सकता है।
निवेश रणनीतिकारों का कहना है कि दुनिया भर में निवेश का तरीका बदल रहा है। डॉलर पर निर्भरता कम हो रही है, सप्लाई चेन दोबारा व्यवस्थित हो रही है और देश अपने संसाधनों को लेकर ज्यादा सतर्क हो रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत का आत्मनिर्भरता और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पर जोर उसे वैश्विक निवेशकों के लिए एक बेहतर विकल्प बना रहा है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सोना और महत्वपूर्ण धातुओं की मांग बढ़ना इस बात का संकेत है कि दुनिया शायद महंगाई और संसाधनों की कमी के एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, न कि किसी अस्थायी चक्र में।
हाल ही में घोषित भारत-अमेरिका ट्रेड समझौते को भी निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताएं कम होंगी, विदेशी निवेश बढ़ सकता है और रुपये में स्थिरता आ सकती है। इस समझौते से क्लीन एनर्जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सेंटर, न्यूक्लियर पावर, तेल और गैस तथा क्रिटिकल मिनरल्स जैसे सेक्टरों को फायदा मिलने की उम्मीद है।