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डिटजर्ट की धुलाई से परेशान साबुन उद्योग

Last Updated- December 08, 2022 | 6:40 AM IST

पाम आयल की कीमतों के नीचे गिरने से हाथ से साबुन बनाने वाले कारोबारियों को बाजार में उछाल आने की एक आस जरूर दिखाई दी है, लेकिन इस कारोबार के हालात अभी भी जीर्ण-शीर्ण बने हुए है।


बढ़ते डिटर्जेन्ट कारोबार से मिलती प्रतिस्पर्धा और करों में रियायत न मिलने के कारण हाथ से साबुन बनाने वाली इकाइयां दिल्ली से भागती नजर आ रही है। 

पिछले पांच सालों में ही साबुन बाजार में डिटर्जेन्ट कारोबार का हिस्सा अस्सी फीसदी और हाथ से बने साबुन का कारोबार केवल 20 फीसदी ही रह गया है।


हालात यह है कि आज से दस साल पहले दिल्ली में हाथ से बनने वाले साबुन की  लगभग 175 निर्माण इकाइयां थी,लेकिन आज इनकी संख्या केवल 20 ही बची है।

कठोर कर नीतियां होने के नाते भी हाथ से साबुन बनाने वाली कई निर्माण इकाइयां दिल्ली से बाहर जाने की राह तलाश रही है।

इस बाबत ऑल इंडिया सोप मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रवीन्द्र जैन का कहना है कि आज लोगों के पास समय की कमी है।
ऐसे में लोग वाशिंग मशीन और डिटर्जेन्ट पाउडर का प्रयोग करते हुए जल्दी कपड़े धोना चाहते है। ऐसे में बाजार में हाथ से बने साबुन की मांग में प्रत्येक वर्ष 10-15 फीसदी की कमी आ रही है।

कठोर कर नीतियों के कारण दिल्ली में इस उद्योग से जुडे क़ारोबारियों के हालात तो और भी खराब है। दिल्ली में इस उद्योग पर कारोबारियों को 12.5 फीसदी की दर से वैट और 14.42 की दर से उत्पाद कर अदा करना पड़ता है।

जबकि पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड में इस उद्योग पर किसी भी तरह का वैट अदा नहीं करना पड़ता है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में इस उद्योग पर केवल 4 फीसदी की दर से ही वैट अदा करना पड़ता है।

सनशाइन सोप मैन्यूफैक्चरर्स लिमिटेड के वी के सिंह बताते है कि वैट ज्यादा होने के कारण कई कारोबारी राजस्थान, पंजाब और उत्तराखंड की ओर कूच कर चुके है। जो यहां है वे भी औद्योगिक संसाधनों और पारिवारिक कारणों के कारण बाहर नहीं जाना चाहते है।

यहीं नहीं सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आने के लिए कर मुक्त प्रदेश दे रही है। लेकिन आर्थिक तौर पर कमजोर तबके से जुडे हुए आम आदमी के इस कारोबार के लिए कर में किसी भी तरह की छूट नहीं दी जा रही है।

इस उद्योग के कारोबारियों का कहना है कि इस उद्योग में रोजगार की भी काफी संभावनाए है। साबुन निर्माण की एक इकाई में ही केवल 15-20 लोगों को रोजगार मिल जाता है।

अगर इस उद्योग के लिए सरकार अगर सही नीतियों को क्रियान्वित करें तो हालात काफी सुधर सकते है।

First Published - December 1, 2008 | 10:15 PM IST

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