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जूट मिलों की लंबी हड़ताल से धान खरीद पर प्रतिकूल प्रभाव

Last Updated- December 08, 2022 | 7:01 AM IST

पश्चिम बंगाल के जूट मिलों में जारी हड़ताल अगर लंबे समय तक चली तो धान खरीद पर इसका गंभीर असर पड़ने की उम्मीद है।


ऐसा लिए कि अब धान की पैकिंग केवल जूट की बोरियों में ही करने की अनिवार्य शर्त बना दी गई है। गौरतलब है कि जूट पैकेजिंग सामग्री कानून के तहत सरकार ने 2008-09 सीजन (जुलाई से जून) से अनाज और चीनी की पैकिंग जूट की बोरियों में करना अनिवार्य कर दिया है।

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, ”अगर जूट मिलों की अनिश्चितकालीन हड़ताल जल्द खत्म न हुई तो धान की खरीद में समस्याएं आएंगी, क्योंकि खरीद एजेंसियों के पास पैकिंग के लिए पर्याप्त बारियां बैग उपलब्ध नहीं हैं।”

मालूम हो कि भारत ने सितंबर में समाप्त हुए 2007-08 सत्र में करीब 2.85 करोड़ टन चावल की रिकॉर्ड खरीद की थी। चालू सत्र में भी खरीद का आंकड़ा 1.15 करोड़ टन को लांघ गया है।उधर विभिन्न जूट उद्योगों के श्रमिक संगठनों द्वारा आहूत हड़ताल बुधवार को तीसरे दिन भी जारी रही।

इस हड़ताल में शामिल करीब 2.25 लाख श्रमिक महंगाई भत्ते की बकाया राशि के भुगतान की मांग पर जोर देने के लिए हड़ताल में शामिल हुए हैं।

सूत्रों के अनुसार, बोरियां बनाने के लिए इन मिलों की कुल आवश्यकता करीब 20 लाख गांठों (1 गांठ = 180 किलोग्राम) की है, जबकि अनुमान है कि वर्ष 2008-09 में जूट का उत्पादन करीब 1 करोड़ गांठ होगा।

सूत्रों ने बताया कि खरीफ सत्र के दौरान बोरियां बनाने के लिए 10 लाख जूट के गांठों की आवश्यकता थी, जिसे पूरा कर दिया गया है। दूसरी ओर, रबी सत्र में मिलों को केवल 9.5 लाख गांठों की आवश्यकता होने के बावजूद बोरियों की कमी है। गौरतलब है कि 1 गांठ से करीब 500 बोरियां बनाई जा सकती है।

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने जूट की बारियों का इस्तेमाल अनिवार्य बनाते हुए कपड़ा मंत्रालय को जूट पैकिंग सामग्रियों के अभाव की स्थिति में 100 फीसदी के मानदंड में छूट देकर इसे 20 फीसदी करने के लिए अधिकृत किया है।

First Published - December 3, 2008 | 10:57 PM IST

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