सर्वे में यह भी कहा गया है कि शिशु और छोटे बच्चों के दूध उत्पादों और पेय पदार्थों के प्रचार पर भी सख्त रोक लगनी चाहिए।
Economic Survey 2026: इकोनॉमिक सर्वे 2026 ने देश में तेजी से बढ़ रही अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) यानी जंक फूड की खपत पर गंभीर चिंता जताई है। सर्वे ने सुझाव दिया है कि ऐसे खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक सभी मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने पर विचार किया जाना चाहिए। सर्वे में यह भी कहा गया है कि शिशु और छोटे बच्चों के दूध उत्पादों और पेय पदार्थों के प्रचार पर भी सख्त रोक लगनी चाहिए।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से संसद में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, जंक फूड का बढ़ता सेवन मोटापा, डायबिटीज और अन्य गंभीर बीमारियों को बढ़ावा दे रहा है, जिससे देश में स्वास्थ्य असमानता भी बढ़ रही है।
सर्वे में कहा गया कि भारत अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बिक्री के मामले में दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। साल 2006 में इन खाद्य पदार्थों की खुदरा बिक्री करीब 0.9 अरब डॉलर थी। 2019 तक यह बढ़कर लगभग 38 अरब डॉलर हो गई। 2009 से 2023 के बीच इसमें 150% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। इसी दौरान पुरुषों और महिलाओं, दोनों में मोटापा लगभग दोगुना हो गया।
सर्वे के मुताबिक, लोगों की डाइट में UPFs के बढ़ने से दुनिया भर में क्रोनिक बीमारियां बढ़ रही हैं और हेल्थ में असमानताएं भी बढ़ रही हैं। लोगों की सेहत पर UPFs के असर को लेकर नए-नए आंकड़े आ रहे हैं, जिससे पता चलता है कि पब्लिक हेल्थ पॉलिसी को लागू करने में कोई देरी नहीं होनी चाहिए, जबकि आगे की रिसर्च भी जारी रहनी चाहिए। अब तक की 100 पॉलिसी उन खाने की चीजों की खपत कम करने पर जोर दे रही हैं जिनमें ज्यादा फैट, चीनी और सोडियम होता है, जिनमें से कई UPFs हैं। हालांकि, डाइट को बेहतर बनाना सिर्फ कंज्यूमर के व्यवहार में बदलाव पर निर्भर नहीं हो सकता; इसके लिए फूड सिस्टम में कोऑर्डिनेटेड पॉलिसी की जरूरत होगी जो UPF प्रोडक्शन को रेगुलेट करें, और ज्यादा हेल्दी और टिकाऊ डाइट और मार्केटिंग को बढ़ावा दें।
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2019-21 के नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) की रिपोर्ट के अनुसार, 24 फीसदी भारतीय महिलाएं और 23 फीसदी भारतीय पुरुष ओवरवेट या मोटापे का शिकार हैं। 15-49 साल की महिलाओं में 6.4 फीसदी मोटापे से ग्रस्त हैं, और पुरुषों में 4.0 फीसदी मोटे हैं। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में ज्यादा वजन की समस्या 2015-16 में 2.1 फीसदी से बढ़कर 2019-21 में 3.4 फीसदी हो गई है। अनुमानों के अनुसार, 2020 में भारत में 3.3 करोड़ से ज्यादा बच्चे मोटापे का शिकार थे, और 2035 तक यह संख्या 8.3 करोड़ बच्चों तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत UPF (अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड) की बिक्री के लिए सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। यह 2009 से 2023 तक 150 फीसदी से ज्यादा बढ़ा है। भारत में UPF की रिटेल बिक्री 2006 में USD 0.9 बिलियन से बढ़कर 2019 में लगभग USD 38 बिलियन हो गई, जो 40 गुना ज़्यादा है। इसी अवधि में पुरुषों और महिलाओं दोनों में मोटापा लगभग दोगुना हो गया है। यह खान-पान में बदलाव के साथ-साथ मोटापे में ग्लोबल ग्रोथ को दिखाता है।
इकोनॉमिक सर्वे ने साफ कहा कि सिर्फ लोगों की खाने की आदत बदलने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सरकार को खाद्य उत्पादन, मार्केटिंग और नीतियों के स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे।
सर्वे ने सुझाव दिया कि जंक फूड के पैकेट पर आगे की तरफ पोषण चेतावनी लेबल लगाए जाएं, बच्चों को टारगेटेड विज्ञापनों पर रोक लगे और यह सुनिश्चित किया जाए कि व्यापार समझौते सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को कमजोर न करें।
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इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, यह एक बड़ी नीतिगत कमी है, जिसे जल्द दूर करने की जरूरत है। ब्रिटेन, नॉर्वे और चिली जैसे देशों का उदाहरण देते हुए सर्वे में कहा गया कि कई देशों ने बच्चों को जंक फूड से बचाने के लिए विज्ञापनों पर सख्त पाबंदियां लगाई हैं। ब्रिटेन ने हाल ही में रात 9 बजे से पहले जंक फूड के विज्ञापन पर रोक लगा दी है।
सर्वे ने यह भी कहा कि भारत में मौजूदा विज्ञापन नियमों में “भ्रामक विज्ञापन” की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। इसी वजह से कंपनियां अब भी अपने उत्पादों को “हेल्दी” या “एनर्जी देने वाला” बताकर प्रचार कर रही हैं।
पिछले इकोनॉमिक सर्वे में कुछ जरूरी तथ्य बनाए गए थे। जैसेकि भारत में डाइट में UPF (अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड) के बढ़ते इस्तेमाल से होने वाली चिंताओं को दूर करने के लिए कई तरह के तरीकों की जरूरत है। 114 फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) UPF को एक साफ परिभाषा और स्टैंडर्ड के साथ रेगुलेशन के दायरे में ला सकती है, जिसमें सख्त लेबलिंग की जरूरतें भी शामिल हैं।
पिछले सर्वे में कहा गया था कि UPF को मौजूदा फ्रेमवर्क में शामिल करके HFSS के अलावा परिभाषित किया जा सकता है, न कि उन्हें बदलकर। यह नोवा क्लासिफिकेशन का इस्तेमाल करके या कॉस्मेटिक एडिटिव्स की पहचान करके किया जा सकता है। नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए ब्रांडेड प्रोडक्ट्स की बेहतर मॉनिटरिंग से कंज्यूमर्स का भरोसा बनाने में मदद मिलेगी। स्कूलों और कॉलेजों को टारगेट करके चलाए जाने वाले कैंपेन के जरिए UPF खाने के बुरे असर के बारे में जागरूकता बढ़ाना भी बहुत जरूरी है।
इकोनॉमिक सर्वे देश की अर्थव्यवस्था का पूरा लेखा जोखा होता है। इसमें खेती, उद्योग, सेवा क्षेत्र, रोजगार, महंगाई, बैंकिंग, निर्यात आयात और विदेशी निवेश जैसे मुद्दों का साफ और सरल विश्लेषण किया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो यह रिपोर्ट बताती है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत है या दबाव में।
सरकार बजट से पहले इकोनॉमिक सर्वे इसलिए लाती है ताकि हालात छुपे न रहें। जब यह साफ हो जाता है कि किन क्षेत्रों में कमजोरी है और कहां सुधार हुआ है, तब बजट में फैसले लेना आसान हो जाता है। इसी वजह से आर्थिक सर्वे को बजट की नींव माना जाता है। इकोनॉमिक सर्वे सरकार को यह मौका देता है कि वह अपने पुराने फैसलों का असर देख सके। इससे पता चलता है कि कौन सी नीति काम आई और किसे बदलने की जरूरत है। यही रिपोर्ट बाजार, निवेशकों और आम लोगों को यह संकेत भी देती है कि सरकार आगे किस दिशा में सोच रही है।