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डिजिटल युग का असर? भारतीय युवाओं की मानसिक सेहत पर बढ़ रहा दबाव

ग्लोबल माइंड प्रोजेक्ट की एक ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतीय युवा जितना माना जाता है, उससे कहीं ज्यादा संघर्ष कर रहे हैं।

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सोहिनी दास   
Last Updated- February 27, 2026 | 9:59 AM IST

Digital Age Impact on Mental Health: मानसिक स्वास्थ्य के मामले में भारत को एक सजग समाज के रूप में देखा जाता है। आम तौर पर ऐसी धारणा रही है कि भारत में मजबूत पारिवारिक बंधन, धार्मिक रीति-रिवाज और सामुदायिक जीवन पश्चिमी देशों में युवाओं के बीच दिखने वाले मानसिक स्वास्थ्य संकट से बचाते हैं। मगर नए वैश्विक आंकड़ों से पता चलता है कि यह सुरक्षा कवज तेजी से कमजोर होने लगा है।

ग्लोबल माइंड प्रोजेक्ट की एक ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतीय युवा जितना माना जाता है, उससे कहीं ज्यादा संघर्ष कर रहे हैं। ग्लोबल माइंड प्रोजेक्ट एक व्यापक एवं स्वतंत्र अनुसंधान पहल है जो विभिन्न देशों में लोगों के मानसिक स्वास्थ्य का अध्ययन करती है। इसमें यह मापा जाता है कि लोग रोजमर्रा की जिंदगी को कितनी अच्छी तरह से सामना कर पाते हैं, सोच पाते हैं, महसूस कर पाते हैं और काम कर पाते हैं। साथ ही उन सामाजिक और जीवनशैली संबंधी कारकों पर भी गौर किया जाता है जो इन नतीजों को प्रभावित करते हैं।

इंटरनेट में सक्षम 18 से 34 वर्ष के भारतीयों में माइंड हेल्थ कोशेंट (एमएचक्यू) 33 है जो 41 के वैश्विक औसत से नीचे है। मगर बुजुर्ग भारतीयों का मामला इसके विपरीत है जहां 55 वर्ष या इससे अधिक उम्र के लोगों का एमएचक्यू 96 है। ये आंकड़े साफ तौर पर एक पीढ़ीगत गहरी खाई को दर्शाते हैं।

ग्लोबल माइंड प्रोजेक्ट का संचालन करने वाली सैपियन लैब्स की संस्थापक एवं मुख्य वैज्ञानिक तारा त्यागराजन ने कहा, ‘यह टकराव पहले ही शुरू हो चुका है।’ उन्होंने कहा, ‘भारत के युवा वैश्विक औसत से थोड़ा ही नीचे हैं, लेकिन बुजुर्गों के मामले में गिरावट 63 अंक पर बहुत बड़ी है। यह अंतर वैश्विक औसत से भी अधिक है।’

भारत कई विकसित देशों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। भारत के युवा जापान और ब्रिटेन सहित करीब 24 देशों में अपने साथियों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। मगर वैश्विक रैंकिंग के मामले में भारत नीचे से तीसरे पायदान पर मौजूद है। इससे पता चलता है कि भारत इस संकट से अछूता नहीं है बल्कि वह बाद में इससे ग्रस्त हुआ है।

अध्ययन में जीवनशैली में दो आधुनिक बदलाव का पता चलता है। पहला बदलाव है आहार। लगभग 44 फीसदी भारतीय युवा नियमित तौर पर अल्ट्रा-प्रॉसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं, जबकि बुजुर्गों में यह आंकड़ा महज 11 फीसदी है। त्यागराजन आगाह करती हैं, ‘जो आबादी लगभग हर दिन अल्ट्रा-प्रॉसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन करती है, वह मानसिक स्वास्थ्य के बोझ में करीब एक तिहाई तक योगदान करती है।’ उन्होंने उन बातों की ओर इशारा किया जो भावनात्मक और संज्ञानात्मक नियंत्रण को बाधित करती हैं।

दूसरा बदलाव है स्मार्टफोन। भारतीय युवाओं को अमीर देशों के युवाओं के मुकाबले स्मार्टफोन बाद यानी औसतन 16.5 वर्ष की आयु में में मिले हैं। मगर इसमें तेजी से गिरावट हो रही है। त्यागराजन ने कहा, ‘इंटनेट चलाने में समक्षम पूरी आधुनिक आबादी बुनियादी तौर पर एक ही नाव पर सवार है।’

बहरहाल, भारत में पारिवारिक बंधन और आध्यात्मिकता अभी भी काफी मायने रखती है लेकिन अब केवल वे ही पर्याप्त नहीं हैं। खानपान की आदत तेजी से बदल रही है और डिजिटल तकनीक की उपलब्धता में भी बदलाव हो रहा है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारत को मिलने वाला लाभ अब बेहद नाजुक और अस्थायी साबित हो सकता है।

First Published : February 27, 2026 | 9:46 AM IST