कर्ज में भारी कमी और एक अरब डॉलर की पूंजी जुटाने के बाद बायोकॉन लिमिटेड बायोसिमिलर, जीएलपी-1 और वैश्विक स्तर पर विनिर्माण पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। सोहिनी दास के साथ वीडियो बातचीत में बायोकॉन ग्रुप की चेयरपर्सन किरण मजूमदार शॉ ने बताया कि कर्ज की कम लागत से किस तरह लाभ बढ़ेगा, बायोकॉन बायोलाजिक्स को एकीकृत करने के पीछे रणनीतिक तर्क क्या है और भारत की बायोफार्मा हब बनने की महत्वाकांक्षाओं के लिए नियाकीय सुधार, सीएमसी की अगुआई वाली मंजूरी और एआई को अपनाना क्यों महत्त्वपूर्ण है। संपादित अंश …
हमने आठ महीनों में लगातार दो क्यूआईपी के जरिये लगभग एक अरब डॉलर जुटा लिए हैं। यह बात हमारे कारोबार और पूंजी जुटाने की हमारी क्षमता में बाजार के विश्वास को दर्शाती है। 300 करोड़ रुपये की वार्षिक बचत वित्त वर्ष 27 से सीधे मुनाफे में जुड़ जाएगी।
बायोकॉन लिमिटेड की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी के रूप में बायोकॉन बायोलाजिक्स का एकीकरण सही मार्ग पर है। दक्षता में सुधार के लिए संयोजनों को सुव्यवस्थित किया जाएगा। इन श्रेणियों में विनिर्माण परिसंपत्तियां अत्यधिक प्रतिस्थापन वाली हैं, जो लचीलापन और स्फूर्ति प्रदान करती हैं। साथ ही विशेष रूप से जीएलपी-1 और इंसुलिन के बीच दमदार संतुलित पोर्टफोलियो सटीक बैठते हैं। जीएलपी-1 के लिए रिकॉम्बिनेंट डीएनए पेप्टाइड्स का फायदा उठाने का भी अवसर है, जिसमें बायोकॉन बायोलाजिक्स की गहन विशेषज्ञता है। जैसे-जैसे बायोकॉन का और एकीकरण होगा, विनिर्माण लाइनों और फील्ड फोर्स की सुव्यवस्था होगी।
बजट में यह घोषणा इस बात का बहुत बड़ा संकेत है कि भारत खुद को बायोफार्मा हब बनाने पर कैसे ध्यान दे रहा है। मेरे हिसाब से 10,000 करोड़ रुपये का आवंटन पहला अच्छा कदम है। यह इरादे का संकेत देता है। अब चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि बायोफार्मा शक्ति का इस्तेमाल कैसे किया जाए ताकि कंपनियों को बायोसिमिलर विकास में ज्यादा निवेश करने में मदद मिल सके। प्रत्येक कंपनी को वैश्विक स्तर पर विनिर्माण में निवेश करने के बारे में सोचना होगा, जिस पर भारत को ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। कोरिया ने इसे काफी सफलतापूर्वक किया है और बायोकॉन शायद एकमात्र ऐसी भारतीय कंपनी है जो किसी तरह से कोरियाई पैमाने से मेल खा सकती है। इसके लिए बहुत ज्यादा निवेश की जरूरत है और सरकार को इसका समर्थन करने की जरूरत है क्योंकि ये शुरुआती निवेश हैं जिनका फयादा तुरंत नहीं मिलता।
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एकेडमिक काम से भी यह बात पक्की है कि बायोसिमिलर के लिए पशु अध्ययन जरूरी नहीं हैं। उन्हें खत्म करने से लागत और समय अवधि कम हो जाती है और हम वैश्विक तरीकों के साथ जुड़ जाते हैं। हमें जेनेरिक और बायोसिमिलर के लिए पशु परीक्षण की मांग करना बंद कर देना चाहिए। सीएमसी ही असल में मायने रखता है।
कनाडा में जीएलपी-1 का अवसर अस्पष्ट है क्योंकि अभी तक मंजूरियां नहीं मिली हैं, यहां तक कि पुराने मॉलिक्यूल्स के लिए भी। यूरोप और अमेरिका में मंजूर फाइलों की अभी भी कनाडा में समीक्षा की जा रही है और कई कंपनियों को कम्पलीट रिस्पांस लेटर (सीआरएल) जारी किए गए हैं। हमें नियामकीय चिंताओं के संबंध में कोई स्पष्टता नहीं है।
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एआई नए मॉलिक्यूल्स के लिए सबसे अधिक प्रभावशाली है। तीसरे चरण के बड़े परीक्षण में मरीज को शामिल और बाहर करने के मानदंड नामांकन धीमा कर देते हैं। एआई विश्व स्तर पर परीक्षण स्थलों का चयन करने और मरीजों के समूहों को तेजी से पहचानने में मदद कर सकती है।