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1991 से अब तक का सफर: अविश्वास से निकलकर भरोसे पर आधारित आर्थिक नीति बनाने की जरूरत

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अब हम संरक्षणवाद (प्रोटेक्शनिज़्म) से खुश नहीं रह सकते। हमें MSME क्षेत्र को पाबंदियों से मुक्त करना होगा और इतने सारे इंस्पेक्टरों द्वारा उन्हें परेशान करना बंद करना होगा

Last Updated- July 25, 2026 | 10:38 AM IST
Tarun Das
चित्रण: अजय मोहंती

भारत के लिए वर्ष 1989 से 1991 तक का समय बहुत मु​श्किल भरा था: आर्थिक संकट, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और बैंक ऑफ इंगलैंड को सोना भेजना, ये सभी ऐसी बातें थीं जिसने भारत की आर्थिक बुनियाद हिला कर रख दी थी और हालात निराशाजनक लग रहे थे।

इन परिस्थितियों के बीच भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) उदारीकरण के पक्ष में मजबूती से खड़ा था। हम तकनीक के आयात की अनुमति दिए जाने की मांग कर रहे थे ताकि भारतीय उद्योग मजबूत हो सकें क्योंकि आयात पर लगी पाबंदियां आर्थिक विकास में बड़ी बाधा साबित हो रही थीं।

वर्ष 1947 से 1991 का समय उद्योग के लिए सबसे बुरा दौर था। जेआरडी टाटा, जीडी बिड़ला और अन्य लोग, जो आजादी की लड़ाई का हिस्सा थे, उन्होंने भारत के औद्योगीकरण के लिए ‘बॉम्बे प्लान’ तैयार किया था। मगर न जाने क्यों सरकार ने निजी क्षेत्र को अविश्वास की नजर से देखना शुरू कर दिया जो अजीब बात थी मगर यह ​स्थिति वर्ष 1991 में बदली। 

यह बर्लिन की दीवार गिरने के दो साल बाद ‘दिल्ली की दीवार’ ढहने जैसा था। वह समय हमारे लिए बेहद रोमांचक समय था। मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने के बाद सरकार के साथ हमारी बातचीत उद्योग भवन के बजाय ‘नॉर्थ ब्लॉक’ (तब वित्त मंत्रालय का कार्यालय) से होने लगी। मनमोहन सिंह ने मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए), भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर, योजना आयोग के उपाध्यक्ष जैसी अहम पद पर रहने के बाद वित्त मंत्री की कमान संभाली थी। उनके इन सभी ओहदों पर रहते हुए मुझे भी साथ काम करने का मौका मिला था। सिंह बहुत खुले विचारों के थे और हमारे बीच विश्वास की कमी कभी महसूस नहीं हुई।

जब हमने वर्ष 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह का मशहूर बजट भाषण सुना तो बहुत खुशी हुई। हम इस बात से उत्साहित थे कि हमारा बाजार दुनिया के लिए खुल रहा है। हमें अब दुनिया से डर नहीं लग रहा था क्योंकि हम उनसे जुड़ने को तैयार थे। यह बहुत अच्छी बात थी क्योंकि हमें भरोसा था कि हम दुनिया का सामना कर सकते हैं। सीआईआई में हमारे साथ रतन टाटा, राहुल बजाज और जमशेद गोदरेज जैसे लोग थे जो हो रही चीजों को लेकर उतने ही उत्साहित थे।

उसके बाद भारतीय उद्योग ने पूरे भरोसे के साथ संयुक्त उद्यम शुरू किए क्योंकि हमें ऐसी तकनीक की जरूरत थी जो उस समय केवल विदेशी कंपनियों के पास थी। ये उद्यम आनन-फानन में तय हुई शादियों की तरह थे और इनमें से कई टूट गए। इसके अलावा, 1991 के बाद के पांच वर्षों में सबने खूब तरक्की की। भारतीय कंपनियों का कारोबार बढ़ा, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7 फीसदी तक पहुंच गई और मुनाफा, लाभांश तथा वेतन में भी बढ़ोतरी हुई। 

बेशक, दक्षिण-पूर्व एशिया के वित्तीय संकट के साथ यह आर्थिक वृद्धि दर धीमी पड़ गई। कथित ‘बॉम्बे क्लब’(जिसमें राहुल बजाज, एल एम थापर, हरि शंकर सिंघानिया सहित उद्योग जगत के अन्य बड़े नाम शामिल थे) का कहना था कि भारत को (सुधारों की) रफ्तार धीमी करनी चाहिए, उन्हें पलटना नहीं चाहिए। उन्हें चिंता थी कि चीन वैश्विक बाजार में आकर हमें पीछे छोड़ देगा। उस समय सीआईआई परिषद की बैठक में यह बात कही गई थी मगर मैं इसके पक्ष में नहीं था।

मुझे लगा कि हम खुद को कम आंक रहे थे। हमने पुनर्गठन किया था और प्रतिस्पर्द्धी बन गए थे, इसलिए मुझे लगा कि संरक्षणवाद सही रास्ता नहीं है। उद्योग जगत या अफसरशाही आर्थिक सुधार नहीं कर सकते। वास्तव में राजनीतिक नेतृत्व ही इस कार्य को अंजाम दे सकता है।

सीआईआई में हम लोग प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देने, लागत कम करने, बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए सीमा शुल्क घटाने की मांग करते रहे। हम ‘बॉम्बे क्लब’ को भी साथ लेकर चले क्योंकि उनमें कुछ हमारे कार्यकारी बोर्ड का हिस्सा थे, जिसमें रतन टाटा, राहुल बजाज, जमशेद गोदरेज, टाटा स्टील के जमशेद ईरानी, टीवीएस समूह के सुरेश कृष्ण और इन्फोसिस के नारायण मूर्ति शामिल थे। ‘बॉम्बे क्लब’को भी फायदा हुआ। बजाज दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी दोपहिया और तिपहिया बनाने वाली कंपनी बन गई।

वर्ष 1991 के बाद कृषि कार्यों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया मगर बाकी अर्थव्यवस्था अच्छी रही और सूचना-प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवा क्षेत्र में जबरदस्त तेजी आई क्योंकि कोई पाबंदी नहीं थी। मैं कहूंगा कि विनिर्माण क्षेत्र पर अभी भी कई तरह की बंदिशें हैं।

सभी कह रहे हैं कि चीन ने दमदार आपूर्ति श्रृंखला तैयार की है। हमारे पास सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रम (एमएसएमई) क्षेत्र में बेहतरीन कंपनियां थीं जो पुर्जे तैयार करती थीं मगर क्या हमने उन्हें वो अहमियत दी जिसकी दरकार थी? उन पर मूल्य और उत्पादन की सीमाएं थोप दी गईं। 

भरोसा क्यों नहीं है? मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि हमने एक मजबूत, प्रतिस्पर्द्धी एमएसएमई क्षेत्र नहीं बनाया और हमें चीन पर निर्भर रहना पड़ा। हालांकि सुधार के उपाय जारी रहे मगर उम्मीद के मुताबिक उदारीकरण आगे नहीं बढ़ पाया क्योंकि उस समय भी बेरोजगारी को लेकर चिंता थी। जमीन और श्रम से जुड़े मुद्दों से संबं​धित सुधार भी सफल नहीं हो पाए। सरकार लोगों को यह भरोसा नहीं दिला पाई कि वह उनका ख्याल रखेगी। मुझे लगता है कि इसकी मुख्य वजह यही थी।

बाद के वर्षों में प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह का पहला कार्यकाल बहुत अच्छा रहा। विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) से जुड़े और पूंजी में कुछ और सुधार हुए लेकिन दूसरा कार्यकाल घोटालों और पार्टी के अंदरूनी कलह की बलि चढ़ गया। लोगों की नाराजगी बढ़ती गई और नई सरकार ने कमान संभाल ली।

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल अच्छे रहे हैं मगर वर्ष 2014 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को दो बड़े झटके लगे हैं। नोटबंदी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा झटका थी। इसने एमएसएमई क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया। दूसरा बड़ा झटका कोविड-19 महामारी साबित हुई। इसके बाद दुनिया के कुछ हिस्सों में सैन्य टकराव भी हुए। इसमें कोई शक नहीं कि काफी कुछ हासिल हुआ है मगर कारोबार सुगमता बेहतर बनाने के मोर्चे पर काफी प्रयास करने की अभी भी दरकार है। सुधारों के बावजूद माल एवं सेवा कर (जीएसटी) अभी भी जटिल है और भरोसे का अभाव दिख रहा है। हम अभी भी विश्वास पर आधारित आर्थिक नीति ढांचे की ओर कदम नहीं बढ़ा पाए हैं।

सरकार के सामने चुनौतियां जरूर हैं मगर भारतीय उद्योग जगत को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। भारत के उद्योग मुनाफा और लाभांश के बारे में सोच रहे हैं लेकिन कंपनियां नवाचार और अनुसंधान एवं विकास में पर्याप्त निवेश नहीं कर रही हैं। हालांकि कुछ ऐसे समूह भी हैं जिन्होंने भारी निवेश किया है और वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई है।

टाटा, रिलायंस और भारती जैसे बड़े समूह अत्याधुनिक तकनीक अपना रहे हैं मगर हमें 1,000 से 10,000 करोड़ रुपये के बाजार पूंजीकरण वाली कंपनियों में ऐसा नजरिया दिखाई नहीं दे रहा है।

संरक्षणवाद के साथ अब समय नहीं कट सकता। हमें एमएसएमई क्षेत्र को पाबंदियों से मुक्त करना होगा और उन्हें बेवजह परेशान करने की आदत छोड़नी होगी। अगर जरूरी हो तो हम उनके लिए मजबूत वेंचर कैपिटल ढांचा बना सकते हैं ताकि उन्हें धन के लिए हमेशा सिलिकन वैली की ओर न देखना पड़े। सरकार कारोबार को सुगम बनाने पर ध्यान दे रही है मगर आज भी भारत कारोबार करने के लिहाज से दुनिया की सबसे मुश्किल जगहों में से एक है। हमें यह स्थिति जल्द से जल्द बदलनी होगी।

(दास वर्ष 1967 से 2004 तक सीआईआई के महानिदेशक रहे हैं। असित रंजन मिश्र और गुलवीन औलख के साथ बातचीत पर आधारित) 

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First Published - July 25, 2026 | 10:36 AM IST

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