Year Ender 2025: ट्रंप के जवाबी शुल्क से हिला भारत, 2026 में विविध व्यापार रणनीति पर जोर

ट्रंप पहले खुलकर मोदी को अपना ‘करीबी दोस्त’ कहते थे मगर बाद में भारत को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ बताकर भारतीय नीति निर्धारकों को असहज स्थिति में डाल दिया

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असित रंजन मिश्र   
Last Updated- December 25, 2025 | 11:08 PM IST

इस साल फरवरी में वॉशिंगटन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक से ठीक कुछ घंटे पहले अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भारत सहित दुनिया के अन्य देशों पर जवाबी शुल्क लगाने की अपनी योजना उजागर कर सबके पैरों तले से जमीन खिसका दी।

शुल्क लगाने की इस घोषणा के साथ 2025 में वैश्विक व्यापार के लिए उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया। इसके बाद 2 अप्रैल को ट्रंप अपनी घोषणा अमल में लाते हुए जवाबी शुल्कों का मुजाहिरा करने वाली एक तख्ती अपने हाथों में लहराते नजर आए। इसमें विभिन्न देशों पर लगाए गए जवाबी शुल्क का जिक्र था। यह ऐसा क्षण साबित हुआ जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के ढर्रे को ही पलट कर रख दिया।

फरवरी में हुई बैठक में प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप ने नवंबर तक एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के पहले चरण पर हस्ताक्षर करने की योजनाओं की घोषणा की। इस घोषणा ने यह संकेत दिया कि भारत को अमेरिका के साथ व्यापार के मसले पर पहले कदम बढ़ाने का लाभ मिल रहा है मगर हकीकत बिल्कुल पलट गई। दोनों देशों के बीच बातचीत के दौरान मतभेद उभर आने के बाद बीटीए पर समझौता बातचीत के चरण में भी नहीं पहुंच पाया और पहले ही हांफने लगा। अमेरिका भारत पर राजनीतिक रूप से संवेदनशील दुग्ध और कृषि क्षेत्रों को अपने किसानों के लिए खोलने का दबाव बना रहा था मगर भारत इसके लिए कतई तैयार नहीं था।

ट्रंप बने पहेली

भारत ने शुरू में अपना रुख थोड़ा लचीला किया और अमेरिका को कई रियायतें दीं। इनमें हार्ली-डेविडसन मोटरसाइकलों पर आयात शुल्क में कमी, डिजिटल विज्ञापन पर तथाकथित गूगल टैक्स वापस लेना और बाद में कई गुणवत्ता नियंत्रण आदेश की वापसी आदि शामिल थे। मगर ये सभी कदम ट्रंप को प्रभावित करने में नाकाम रहे। ट्रंप ने भारतीय प्रतिष्ठानों पर रूस से तेल खरीदने के लिए अतिरिक्त शुल्क लगा दिया जिससे भारत पर कुल शुल्क 27 अगस्त से 50 प्रतिशत के भारी भरकम स्तर पर पहुंच गया। यह भारत के लिए जोरदार झटका था। फरवरी के बाद मोदी और ट्रंप ने सीधे तौर पर बातचीत करने से परहेज किया क्योंकि ट्रंप ने बार-बार भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु संघर्ष टालने का श्रेय लेने की कोशिश की और सार्वजनिक रूप से कई बार ऐसा दावा किया।

ट्रंप पहले खुलकर मोदी को अपना ‘करीबी दोस्त’ कहते थे मगर बाद में भारत को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ बताकर भारतीय नीति निर्धारकों को असहज स्थिति में डाल दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति अकेले नहीं थे जो भारत पर तल्ख टीका-टिप्पणी कर रहे थे। राष्ट्रपति के सबसे करीबी सहयोगियों (जिनमें उनके वित्त मंत्री स्कॉट बेसंट भी थे) सहित ट्रंप प्रशासन के कई लोगों ने भारत की आलोचना करने में रत्ती भर भी संकोच नहीं किया।

बेसंट ने कहा कि ‘भारत रूस की युद्ध मशीन को बढ़ावा दे रहा है’ वहीं, वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लटनिक ने कहा कि ‘भारत को दुरुस्त करने की जरूरत है’। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने कहा कि ‘भारत को तोड़ना मुश्किल है’ जबकि व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने यह कहकर दोनों के बीच तापमान और बढ़ा दिया कि  ‘ब्राह्मण भारतीय लोगों से मुनाफाखोरी कर रहे हैं’ और  ‘भारत शुल्क लगाने के मामले में सबसे ऊपर है’। ट्रंप प्रशासन के लोगों की तरफ से आए इन बयानों ने भारतीय नीति निर्माताओं को हैरान और व्यापारिक मसलों पर नजर रखने वाले खबरनवीसों को व्यस्त रखा।

एफटीए पर हस्ताक्षर की होड़

साल 2025 में भारत को एक बात पूरी तरह समझ आ गया कि अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता उसने कहीं का नहीं छोड़ेगी। भारत से होने वाले कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत है। अमेरिका को होने वाले भारतीय वस्तुओं के निर्यात का 55 प्रतिशत हिस्सा 50 प्रतिशत शुल्कों की जद में आ गया। इस वजह से रत्न एवं आभूषण, रेडीमेड कपड़े, वाहन पुर्जे और समुद्री उत्पाद जैसे प्रमुख श्रम-आधारित क्षेत्रों से अमेरिका को निर्यात गिरता गया।  निर्यात के समस्त आंकड़ों को आंशिक रूप से आईफोन सहित इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में वृद्धि से सहारा मिला।

भारत के लिए सबसे बड़े निर्यात बाजार अमेरिका को लेकर बढ़ती अविश्वसनीयता ने रणनीति में एक स्पष्ट बदलाव को जन्म दिया और भारत ने तेजी से निर्यात बाजारों में विविधता लाने और अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए कदम उठाए। भारत ने व्यापार वार्ता पर तेजी से कदम बढ़ाया और ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ द्विपक्षीय व्यापार सौदे पूरे कर लिए। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (एफ्टा) के साथ व्यापार एवं आर्थिक भागीदारी समझौता (टीईपीए) 1 अक्टूबर से प्रभावी हुआ।

रूस से जुड़ी चुनौती

फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से कम दाम पर कच्चे तेल की खरीदारी बढ़ा दी। यह वित्त वर्ष 2025 में भारत के कुल तेल आयात में 35 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। अप्रैल-नवंबर की अवधि में रूस भारत के आयात का तीसरा सबसे बड़ा स्रोत बन गया जो वित्त वर्ष 2022 में 20वें स्थान पर था। हालांकि, रूस से कच्चे तेल की खरीदारी से बौखलाए अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क और उसके बाद रूस की सरकारी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अक्टूबर से प्रभावी प्रतिबंधों के बाद भारत का आयात (रूस से) अप्रैल-अक्टूबर की अवधि में 32 प्रतिशत तक गिरने लगा है। हालांकि, इसके बावजूद भारत ने एक स्पष्ट भू-राजनीतिक संकेत दे दिया।

भारत ने अमेरिका को दो टूक शब्दों में कह दिया कि वह पश्चिमी देशों के दबाव में आकर रूस जैसे विश्वसनीय भागीदार देश के साथ अपने संबंधों को दांव पर नहीं लगाएगा। इस महीने के पहले सप्ताह में रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों पक्ष वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाकर 100 अरब डॉलर तक करने का निर्णय लिया। हालांकि, यह लक्ष्य कैसे हासिल होगा इसका पूर्ण विवरण नहीं दिया गया है। भारत ने रूस के नेतृत्व वाले यूरेशियाई देशों के साथ एक व्यापार समझौते के लिए संदर्भ की शर्तों पर हस्ताक्षर किए हैं मगर औपचारिक बातचीत अभी शुरू नहीं हुई है। भारत को उम्मीद है कि रूस गैर-शुल्क बाधाएं खत्म करने का अपना वादा पूरा करेगा जिससे वित्त वर्ष 2025 में दर्ज 59 अरब डॉलर का व्यापार घाटा कम करने के लिए भारत से निर्यात बढ़ाएगा।

2026 पर टिकीं नजरें

हालांकि, ट्रंप के जवाबी शुल्क की जद से इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं और जेनेरिक दवाओं के बाहर रहने से भारत के समग्र निर्यात की रफ्तार बनाए रखने में मदद मिली है मगर क्षेत्रवार विश्लेषण करने और जमीनी हकीकत का अध्ययन करने पर पता चलता है कि श्रम-गहन छोटे एवं मझोले उद्यमों पर अमेरिकी शुल्कों की भयानक मार पड़ी है।

अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में देरी होने के असर वृहद आर्थिक हालात का हाल बताने वाले संकेतकों में दिखाई देने शुरू हो सकते हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा है कि दोनों देशों बीच व्यापार सौदा पूरा होने की भरपूर उम्मीद है और अगर मार्च तक ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें बहुत हैरानी होगी। मगर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की इस टिप्पणी ने अनिश्चितता बढ़ा दी है कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता होने की कोई समय-सीमा तय नहीं है।

अमेरिका के साथ व्यापार समझौता अधर में होने के कारण भारत यूरोपीय संघ के साथ लंबे समय से विचाराधीन व्यापार समझौता जल्दी पूरा समाप्त करना चाहेगा। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा 26 जनवरी को नई दिल्ली में भारत के 2026 गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। इसके बाद 27 जनवरी को वार्षिक भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन होगा। गोयल की 8-9 जनवरी को ब्रुसेल्स की निर्धारित यात्रा व्यापार सौदे के लिए निर्णायक साबित हो सकता है, हालांकि कार्बन सीमा समायोजन ढांचा जैसे विवादास्पद मुद्दे बड़ी बाधाएं खड़ी कर सकते हैं।

अपना महत्त्व खो रहा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ट्रंप के जवाबी शुल्कों के बाद और कमजोर हो गया है। हालांकि, सदस्य देशों के लिए सबसे-पसंदीदा-राष्ट्र (एमएफएन) की शर्त (जो एक समान और भेदभाव रहित शुल्क व्यवस्था सुनिश्चित करती है) समाप्त करने के संबंध में अमेरिका के औपचारिक प्रस्ताव का मतलब है कि वह डब्ल्यूटीओ सुधारों की आड़ में अपने जवाबी शुल्कों को वैध बनाना चाहता है। अगले साल 26 से 29 मार्च के दौरान कैमरून के याओंडे में बहुपक्षीय व्यापार निकाय की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (एमसी14) निर्धारित होने के साथ सदस्यों के पास ब्रेटन वुड्स संस्थान को उसके मूल रूप से मिलते-जुलते किसी भी रूप में संरक्षित करने का अंतिम मौका होगा।

भारत की व्यापार नीति के लिए साल 2025 एक कठिन चुनौती साबित हुई है। भारत ने दिखा दिया है कि वह अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार से मिला भयंकर झटका झेलने में जरा भी नहीं डगमगाया और अन्य बाजारों के लिए अपने द्वार खोलने में तनिक हिचक नहीं रखता है। वर्ष 2026 के लिए बिल्कुल स्पष्ट है यानी बाकी दुनिया के साथ जुड़ाव मजबूत कर अमेरिकी रुख में अचानक आए बदलाव से स्वयं को सुरक्षित रखना और घरेलू नीतियों को और दुरुस्त कर ‘मेक इन इंडिया’को वैश्विक निर्यात के एक बड़े स्रोत में तब्दील करना।

First Published : December 25, 2025 | 11:02 PM IST