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राजस्थान का सियासी संकट टला?

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Last Updated- December 15, 2022 | 3:33 AM IST

राजस्थान में कांग्रेस पार्टी में बनी गतिरोध की स्थिति शायद खत्म हो गई होगी, इस बात की अटकलें तब लगनी शुरू हुईं जब राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत के सुर बुलंद करने के बाद से पहली बार पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा से मुलाकात की। ऐसा लगता है कि विधानसभा में 14 अगस्त को विश्वास प्रस्ताव पर होने वाली चर्चा से पहले ही मतभेद खत्म करने की कोशिश हो सकती है।
हालांकि राहुल और सचिन की इस बैठक में वास्तव में क्या हुआ उसकी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है लेकिन कांग्रेस के सूत्रों ने स्पष्ट कर दिया कि सचिन पायलट समूह ने गहलोत के मुख्यमंत्री पद पर रहने को लेकर जो एतराज जताया था उस बात को तवज्जो नहीं दी जाएगी। हालांकि गहलोत के खिलाफ सचिन की विशेष शिकायतों के समाधान के लिए एक समिति का गठन किया जा सकता है।
सचिन पहले ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के साथ-साथ उपमुख्यमंत्री के पद से बर्खास्त हो चुके हैं और सत्ता संघर्ष में उनकी फजीहत होती ही दिख रही है। उन्हें उपमुख्यमंत्री पद वापस मिल सकता है। हालांकि गहलोत को बेमन से इस बात को स्वीकारना पड़ेगा। गहलोत उम्मीद कर रहे थे कि वह पायलट से हमेशा के लिए छुटकारा पा लेंगे और कांग्रेस से उनके निष्कासन के लिए स्थितियां बना रहे थे। अब उन्हें एक ऐसे आदमी को गले लगाना होगा और जो पार्टी में सहयोगी तो है लेकिन उनकी सख्त आलोचना भी करता है। दोनों नेताओं के बीच विश्वास की कमी हमेशा से ही बनी रही जितनी आज है। ऐसे में अगर कोई पेशकश भी की जानी है तो इसमें बातचीत भी कठिन होने के आसार हैं। पायलट के पक्ष के 19 विधायकों का गुट न तो बढ़ा है और न ही उनकी बगावत के बाद कम ही हुआ। लेकिन अगर सभी ‘असंतुष्ट’ विधायक गहलोत सरकार के साथ अपना गतिरोध खत्म कर लेते हैं तब भी सचिन एक ऐसे समूह का समर्थन खो देंगे जो व्यापक रूप से उनके प्रति सहानुभूति रखता था।
राहुल के साथ उनकी मुलाकात और मौजूदा गतिरोध में विराम के संकेत इस वजह से भी मिल रहे है कि उनके कई विधायकों में असंतोष बढऩे लगा, विशेष रूप से तब जब विपक्षी दल भाजपा ने यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी उनके बचाव में कोई भूमिका नहीं निभाएगी। ऐसी स्थिति में अधर में लटके रहने की चिंता के बीच विधायकों ने सीधे कांग्रेस नेतृत्व से संपर्क साधने की कोशिश की। इसकी वजह से सचिन के पास कोई विकल्प नहीं बचता था सिवाय इसके कि वह फिर से पार्टी के खेमे में जमे रहें। हालांकि मौजूदा बगावत खत्म हो सकती है लेकिन भविष्य में इसका खतरा बना रहेगा। इसकी संभावना कम ही है कि सचिन की महत्त्वाकांक्षा सीमित हो जाए। लेकिन पार्टी नेतृत्व गहलोत के बेटे वैभव से सचिन को मिल रहे खतरे का समाधान कर सकता है। हालांकि यह सवाल अब भी बरकरार है कि क्या यह सचिन के लिए पर्याप्त होगा। फिलहाल राजस्थान में कांग्रेस सरकार का संकट भले ही टल सकता है लेकिन तनाव दूर नहीं होगा।

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First Published - August 10, 2020 | 11:08 PM IST

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