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चौड़ी होती खाई

Last Updated- December 15, 2022 | 2:33 AM IST

दुनिया की सबसे तेज विकसित होती अर्थव्यवस्था के सबसे तेज गिरावट वाली अर्थव्यवस्था बन जाने की खबर ने टिप्पणियों की बाढ़ ला दी। इस दौरान कहा गया कि भारत की वृद्धि संभावना 6 फीसदी से घटकर 5 फीसदी रह गई। यह स्पष्ट हो चुका है कि कोविड-19 के कारण बनी मंदी की परिस्थितियों से उबरने तक राजकोषीय घाटा और सार्वजनिक ऋण रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका होगा, दोहरी बैलेंस शीट संकट को एक नया अवसर मिलेगा, जटिल मौद्रिक चुनौतियां सामने होंगी और इन बातों के परिणामस्वरूप वृद्धि दर की संभावना, जो कभी 7 फीसदी से अधिक मानी जाती थी, वह काफी घट जाएगी लेकिन 5 फीसदी?

वृद्धि के अनुमानों का आकलन सहज पत्रकारिता के माध्यम से किया जा सकता है (निवेश दर में आईसीओआर अथवा वृद्धिमान पूंजी उत्पादन अनुपात का भाग देकर) या जटिल गणित की मदद से। भारतीय अर्थव्यवस्था डेटा के लिहाज से कमजोर उभरती अर्थव्यवस्था है जहां वृद्धि संभावनाओं के अनुमान हल्के फुल्के आंकड़ों पर आधारित हैं। इसके बावजूद किसी ने नहीं कहा था कि भारत की वृद्धि संभावना सन 1980 और 1990 के दशक में हासिल वास्तविक वृद्धि दर (जो 5.5 और 6 फीसदी के बीच थी) से कम हो जाएगी। सन 2022-23 में मुद्रास्फीति समायोजन के बाद रुपये में प्रति व्यक्ति आय 2019-20 से बेहतर नहीं रहेगी। यानी तीन वर्ष का नुकसान। दूसरे शब्दों में: सभी क्षेत्रों में अधिशेष क्षमता और नए निवेश में भारी गिरावट।

इस बीच भविष्य के वृद्धि अनुमान को लेकर एक नया शब्द सामने आया है अंग्रेजी के ‘वी’ अक्षर के आकार का सुधार यानी तेज गिरावट और उसके बाद उतनी ही तेजी से सुधार। सरकार के दो आशावादी अर्थशास्त्रियों ने गत सप्ताह इसका अनुमान जताया। इसके अलावा अंग्रेजी के ‘यू’ (थोड़े अंतराल के बाद सुधार), या ‘डब्ल्यू’ या ‘एल’ आकार का सुधार या फिर ‘के’ अक्षर के तर्ज पर सुधार। ‘के’ अक्षर जैसे सुधार का तात्पर्य है एक लंबवत रेखा से निकलती दो रेखाएं। वैश्विक टीकाकारों का कहना है कि सन 2008 के वित्तीय संकट के बाद से कमोबेश ऐसा ही हो रहा है: विभिन्न देशों, आर्थिक क्षेत्रों, कंपनियों और लोगों के बीच भी लाभ कमाने और नुकसान उठाने वालों के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है।

इसके उदाहरणों की कमी नहीं है। विभिन्न देशों की बात करें तो चीन सन 2008 से ही विश्व स्तर पर जमकर खरीद कर रहा है। वह दुनिया भर में रणनीतिक महत्त्व वाली कंपनियों और अहम बंदरगाहों पर काबिज हो रहा है। वह विभिन्न सरकारों को बेहद उदारतापूर्वक ऋण दे रहा है जो उसे चुकाने में दिक्कत होने पर चीन की बातें मानने पर विवश हो जाते हैं। हमारे यहां शेयर बाजार में निवेश करने वाले आनंदित हैं जबकि लाखों लोगों के रोजगार जा चुके हैं और निजी खपत में भारी गिरावट आई है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है।

दूर से काम करने और पढ़ाई में मदद करने वाली कंपनियों की कमाई अचानक बहुत बढ़ गई है। इसी तरह औषधि निर्माताओं के भी अच्छे दिन चल रहे हैं जबकि वाणिज्यिक अचल संपत्ति बाजार और कमीज (कार्यालयों में पहनने के लिए) के कारोबार में गिरावट आई है। क्वांटास जैसी विमानन कंपनी पजामे बेच रही है। विभिन्न क्षेत्रों में बड़े कारोबारियों के सामने छोटों की हालत बुरी है: जियो ने समूचे फ्यूचर समूह को लगभग निगल ही लिया, इसके चलते डी-मार्ट को कीमतें कम करनी पड़ीं, अदाणी समूह स्थानीय हवाई अड्डों में एकाधिकार कायम कर रहा है जबकि बंदरगाह के क्षेत्र में वह पहले से ही वर्चस्व वाला है।

यह अवधारणा, पूंजीवाद को लेकर राजनीतिक अर्थशास्त्री जोसेफ शुंपीटर के रचनात्मक विध्वंस के विचार से परे है। व्यापक विध्वंस अगर बैंकों में हो तो यह कैसे मददगार होगा? मार्सेलस फंड हाउस के सौरभ मुखर्जी कहते हैं कि मुनाफे का चंद हाथों में सिमटना अप्रत्याशित रूप ले चुका है। बाजार नियामक और प्रतिस्पर्धा आयोग निष्क्रिय नजर आ रहे हैं जबकि यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में तकनीकी कंपनियों से गैर प्रतिस्पर्धी व्यवहार के लिए सवाल किया जा रहा है।

यह केवल महामारी के कारण नहीं है। मंदी और बढ़ती असमानता के कारक कोविड-19 के आगमन के पहले से मौजूद थे और अब ये रुझान अधिक स्पष्ट हैं। सामाजिक कल्याण के मॉडल में सरकारें छोटे और मझोले उपक्रमों की मदद करतीं और पराजितों का ध्यान रखतीं। परंतु जो हालात हैं उनमें सरकारें भी अक्षम हो रही हैं। ऐसे में राजनीतिक और आर्थिक राष्ट्रवाद ही पलायन को प्रोत्साहन दे रहा है। बड़े उद्योगपति हावी हो रहे हैं। जाहिर है राजनीतिक और आर्थिक विजेता एक नहीं हैं। तस्वीर अच्छी नहीं है और 5 फीसदी की दर संभव है।

First Published - September 4, 2020 | 11:31 PM IST

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