ब्रसेल्स की हाल की यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के वादे को पूरा करने और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के युग में अधिक करीबी आर्थिक और तकनीकी साझेदारी कायम करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
जो बात अभी भी कायम और प्रभावी है वह है इस साझेदारी की भूराजनीतिक प्रेरणा। भारत और यूरोप दोनों ही अमेरिका-चीन द्विध्रुवीय व्यवस्था की संभावना से खतरा महसूस करते हैं। यूरोप को अलग-थलग हो जाने का डर है। भारत में यह आशंका है कि वह रणनीतिक जोड़ जिसने पिछले 25 वर्षों से भारत और अमेरिका को साझेदारी में जोड़े रखा था अब कमजोर पड़ रहा है। लेकिन भारत जहां अपने हित में संप्रभु निर्णय लेता है वहीं यूरोप अब भी एक सुसंगत राजनीतिक इकाई नहीं है और यह भी स्पष्ट है कि प्रत्येक प्रमुख सदस्य देश के दृष्टिकोण में महत्त्वपूर्ण अंतर हैं।
हालांकि, रूस से सुरक्षा के लगातार बने हुए खतरे और यूरोपीय सुरक्षा-व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत को लेकर आम सहमति है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि जब तक उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) ही रूस के खिलाफ एकमात्र विश्वसनीय निवारक बना हुआ है तब तक यूरोपीय संघ की कोई भूमिका होगी या नहीं।
रूस के साथ कूटनीतिक स्तर पर नए सिरे से जुड़ाव पर भी कोई सहमति नहीं है कि यूरोप की ओर से संवाद का प्रतिनिधित्व कौन करेगा और वार्ता का एजेंडा क्या होगा। ईरान युद्ध में शांति लाने के प्रयासों में यूरोप की भूमिका नगण्य रही है। चीन के मामले में भी इसी तरह तालमेल की कमी दिखाई देती है।
यह आशंका बढ़ती जा रही है कि यूरोप प्रतिस्पर्धा में अमेरिका और चीन दोनों से पिछड़ रहा है लेकिन वह कोई प्रभावी रणनीति बनाने में सक्षम नहीं है। मारियो ड्रैगी की यूरोप की प्रतिस्पर्धात्मकता पर रिपोर्ट ने इस महाद्वीप की कमजोरियों और अधिक एकीकरण तथा निवेश की आवश्यकता का एकदम स्पष्ट आकलन किया। लेकिन इस रिपोर्ट ने जिस पैमाने पर परिवर्तन की कल्पना की थी वह अब तक नहीं हुआ जबकि इसे यूरोपीय पुनरुत्थान के खाके के रूप में उद्धृत किया जाता है।
यहां तक कि ड्रैगी रिपोर्ट ने भी चीन के प्रति एक विरोधाभासी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उदाहरण के लिए क्या चीन के साथ मिलकर इलेक्ट्रिक वाहनों और उन्नत बैटरी तकनीकों में पकड़ बनाना बेहतर नहीं होता? क्या यूरोप के लिए यह लाभकारी नहीं होता कि वह कम लागत वाली नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों और उपकरणों से लाभ उठाए? कुछ प्रमुख यूरोपीय देश जैसे जर्मनी चीन से अधिक जुड़े हुए हैं जबकि फ्रांस उतना नहीं है। इसका अर्थ है कि यूरोप अब भी एक चीन रणनीति बनाने में असमर्थ है।
ड्रैगी रिपोर्ट में भारत का एक बार भी उल्लेख नहीं है लेकिन आशा है कि मुक्त व्यापार समझौते के निष्कर्ष के बाद यह बदल सकता है। निश्चित रूप से, ब्रसेल्स से निकला बयान यही संकेत देता है। ऐसे में भारत को क्या करना चाहिए? पहली बात, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वार्ता प्रक्रिया की गति धीमी न हो। मुक्त व्यापार समझौते को यथाशीघ्र अनुमोदित किया जाना चाहिए।
दूसरा, लंबित निवेश संरक्षण समझौते और भौगोलिक संकेतक समझौते को शीघ्र ही अंतिम रूप देकर पूरा किया जाना चाहिए। तीसरी बात, भारत-यूरोपीय संघ व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (टीटीसी) को पुनः सक्रिय कर साझेदारी का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। ब्रसेल्स में हुई बातचीत से यह संदेह होता है कि यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) एक कठिन मुद्दा बन सकता है। आयातित वस्तुओं में कार्बन सामग्री की गणना पूरी तरह से तय नहीं हुई है।
तथाकथित मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (एमआरवी) प्रक्रिया यूरोपीय संघ की ओर से अस्पष्ट है और यह स्पष्ट नहीं है कि भारतीय पक्ष द्वारा स्थापित एमआरवी को ब्रसेल्स स्वीकार करेगा या नहीं। क्या ऐसे सामान्य मानक होंगे जिन पर दोनों पक्षों के एमआरवी को समायोजित कर वास्तव में परस्पर संचालन लायक बनाया जा सके?
इसके अलावा सत्यापन कौन करेगा और नामित एजेंसियों द्वारा किए गए ऐसे सत्यापन की लागत कौन वहन करेगा? कठिन अनुपालन प्रक्रियाएं व्यापार को हतोत्साहित करेंगी, विशेषकर भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एसएमई) से होने वाले निर्यात को।
यह भी स्पष्ट नहीं है कि यूरोपीय संघ अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करते समय अपने सीबीएएम को लेकर अमेरिकी विरोध से कैसे निपटेगा। स्पष्ट है कि किसी को भी ऐसे कठिन और संभवतः महंगे प्रावधान को स्वीकार नहीं करना चाहिए, जिससे अमेरिका को छूट मिली हो। इस पर और गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।
यूरोपीय संघ के लिए इसे गैर-शुल्कीय अवरोध की तरह अपनाने का प्रलोभन मजबूत होगा, खासकर उस समय जब संरक्षणवादी प्रवृत्तियां और तीव्र हो रही हैं। भारत को यूरोप से पूंजी प्रवाह को बढ़ावा देना चाहिए। उसे फ्रांस और जर्मनी जैसे प्रमुख देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों में अधिक सफलता मिली है। पिछले भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों पक्षों के बीच संपन्न रक्षा और सुरक्षा साझेदारी पर काफी जोर दिया गया।
आने वाले वर्षों में यूरोप अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने में बहुत बड़ी राशि का निवेश करेगा। भारत के साथ दीर्घकालिक साझेदारी यूरोप की पूंजी और तकनीक को भारत के कुशल जनशक्ति और पैमाने के साथ जोड़ सकती है। यूरोप पूंजी प्रदान कर सकता है और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए नियामक ढांचा बना सकता है।
वहां यह चिंता बनी हुई है कि संवेदनशील तकनीक रूस तक पहुंच सकती है जिसके साथ भारत का रक्षा उपकरणों का महत्त्वपूर्ण संबंध है। यद्यपि इससे भारत का अमेरिका और व्यक्तिगत यूरोपीय साझेदारों के साथ सहयोग प्रभावित नहीं हुआ है और यूरोपीय संघ के नीति-निर्माताओं को इस मामले में आश्वस्त करना चाहिए। यूरोपीय और सामान्य नागरिक समाज स्तर पर भारत और उसकी आर्थिक व तकनीकी क्षमताओं के बारे में व्यापक अज्ञानता बनी हुई है। भारतीय कूटनीति को इस कमी को यथाशीघ्र दूर करना चाहिए।
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)