इस साल संपन्न विधान सभा चुनावों के बाद तीन राज्यों केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सत्ता बदली है। इनमें दो राज्यों में नई सरकारों ने अपने समक्ष मौजूद चुनौतियां स्पष्ट करने के लिए ‘राज्य की आर्थिक स्थिति’ पर श्वेत पत्र जारी किए हैं। माना जा रहा है कि चुनौतियों की शिनाख्त करना करना उन्हें बेअसर करने के उपाय करने की दिशा में पहला कदम है।
कर्ज का स्तर बढ़ने की चिंता के अलावा ये दोनों दस्तावेज (दोनों राज्यों के) आय और खर्च से जुड़ी कुछ समान चिंताओं की ओर भी ध्यान खींचते हैं। खर्च के मामले में वे राजस्व खर्च में तय देनदारियों के बड़े हिस्से और पूंजीगत व्यय के लिए बची सीमित गुंजाइश की ओर इशारा करते हैं। पूंजीगत व्यय अर्थव्यवस्था में दीर्घ अवधि की वृद्धि का आधार होता है।
केरल ने जिक्र किया है कि उसका तय खर्च (जिसमें वेतन-भत्ते, पेंशन और ब्याज का भुगतान शामिल है) राजस्व आय का 77 प्रतिशत है जबकि तमिलनाडु ने यह आंकड़ा राजस्व आय का 64 प्रतिशत बताया है। इसके उलट, पूंजीगत व्यय केरल के लिए 1.3 प्रतिशत और तमिलनाडु के लिए 1.44 प्रतिशत तक ही सीमित है। दोनों राज्य व्यय के मामले में दो और चिंताओं की ओर इशारा करते हैं यानी सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की देनदारियां और बकाया राशि के रूप में राज्य की मौजूदा देनदारियां पूरी करने में आने वाली चुनौतियां की बात करते हैं।
आय के मामले में श्वेत पत्र इन राज्यों के अपने कर राजस्व की वृद्धि में आई सुस्ती उजागर करते हैं। केरल का श्वेत पत्र अपने कर राजस्व में आई गिरावट की तुलना अपने ही पिछले प्रदर्शन और दूसरे समान राज्यों से करता है। सकल राज्य घरेलू उत्पाद के मुकाबले उसके कर राजस्व का अनुपात वर्ष 2015-16 में 6.94 प्रतिशत से घट कर हाल के वर्षों में 6.41 प्रतिशत हो गया है जो कम वृद्धि को दर्शाता है। इसका मुख्य कारण (राज्य वस्तु एवं सेवा कर) का प्रदर्शन है। तमिलनाडु का श्वेत पत्र भी इस अनुपात में गिरावट की ओर इशारा करता है। वर्ष 2006-07 में यह 8.94 प्रतिशत के उच्च स्तर पर था जो वित्त वर्ष 2025-26 में घट कर 5.45 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गया है।
इन श्वेत पत्रों का अध्ययन करने से कुछ सवाल उठते हैं। पहला, क्या पहचानी गई वित्तीय चुनौतियां केवल इन दो राज्यों तक ही सीमित हैं या यह समस्या और भी व्यापक है? दूसरा, क्या इन चुनौतियों से निपटने के लिए कोई ठोस विकल्प मौजूद हैं?
राज्यों के पास राजस्व प्राप्तियों में बढ़ोतरी के जरिये उपलब्ध वित्तीय गुंजाइश समझने के लिए हम वर्ष 2024-25 तक के जांचे (ऑडिट किए हुए) आंकड़ों और मार्च 2026 (2025-26 के) के कुल मासिक खातों का अवलोकन करते हैं। कोविड-19 महामारी से पूर्व सभी राज्यों की राजस्व प्राप्तियों में सालाना औसत बढ़ोतरी दर 10 प्रतिशत से अधिक थी। वर्ष 2019-21 के दौरान यह दर गिरकर लगभग शून्य प्रतिशत हो गई। अगले दो वर्षों में बढ़ोतरी की दर तेजी आई (वर्ष 2021-22 में 25 प्रतिशत और 2022-23 में 13 प्रतिशत)। इसके बाद स्पष्ट र सुस्ती देखी गई यानी वर्ष 2023-24 में यह दर 8 प्रतिशत थी जबकि वर्ष 2024-25 में यह 6.8 प्रतिशत थी। मासिक खातों के आंकड़ों को देखें तो यह मामूली सुधर कर 7.3 प्रतिशत हो गया है। बड़े राज्यों को मिलाकर भी ऐसा ही रुझान दिखता है।
राज्यों के कर राजस्व की बात करें तो बड़े राज्यों के लिए फिर ऐसा ही रुझान दिखता है। कोविड महामारी से पूर्व के समय में 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी दर, कोविड के दौरान कमी, उसके बाद दो सालों तक तेज बढ़ोतरी और फिर मामूली बढ़ोतरी का दौर (वर्ष 2023-24 में 13 प्रतिशत, 2024-25 में 4 प्रतिशत और 2025-26 में 5 प्रतिशत। इन्हें मिलाकर और पिछले दो सालों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 9 प्रतिशत नॉमिनल बढ़ोतरी दर को देखते हुए यह स्पष्ट है कि राज्यों के अपने कर राजस्व का अनुपात गिरेगा और ऐसा ही राजस्व प्राप्ति के मामले में भी होगा।
उपलब्ध संसाधनों के इस्तेमाल की बात की जाए तो राज्यों की आर्थिक स्थिति पर दबाव इस बात से साफ पता चलता है कि राज्य राजस्व घाटा पूरा करने के लिए अपने राजकोषीय घाटे का कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। इस मोर्चे पर भी महामारी के बाद स्थिति में साफ सुधार दिखाई दे रहा है और वर्ष 2022-23 में राजस्व अधिशेष वाले बड़े राज्यों की संख्या बढ़कर नौ हो गई। मगर इसके बाद स्थिति बदल जाती है। राजस्व अधिशेष दर करने वाले राज्यों की संख्या कम रही। वर्ष 2023-24 में आठ, 2024-25 में छह और 2025-26 में पांच ऐसे राज्य रहे। दूसरी तरफ, राजस्व घाटा पूरा करने के लिए राजकोषीय घाटे का 50 प्रतिशत से अधिक इस्तेमाल करने वाले बड़े राज्यों की संख्या वर्ष 2023-24 में चार से बढ़कर वर्ष 2024-25 में छह और 2025-26 में आठ हो गई है।
दूसरे शब्दों में कहें तो राज्यों की वित्तीय स्थिति पर बढ़ते वित्तीय दबाव के ठोस प्रमाण मिल रहे हैं। राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता फिर सामने आ गई है। विकल्प हमेशा की तरह राजस्व बढ़ाना या व्यय का पुनर्गठन करना है। इस संदर्भ में दो विचार हो सकते हैं। पहला, उभरते वित्तीय जोखिम की इस व्यापक घटना के कुछ अपवाद भी हैं। कुछ राज्य लगातार राजस्व अधिशेष बनाए रखने में सक्षम रहे हैं।
ऐसे राज्यों में गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। इनमें उच्च आय और मध्यम आय वाले राज्य, खनिज संपदा से भरपूर राज्य और कृषि क्षेत्र पर निर्भर राज्य शामिल हैं। दूसरी ओर हरियाणा, महाराष्ट्र और राजस्थान राजस्व के मोर्चे पर लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं जहां राजस्व वृद्धि लगभग 10 प्रतिशत या उससे अधिक है। पिछले अनुभव साझा करना उपयोगी हो सकता है।
दूसरा, हालांकि वित्तीय स्थिति संबंधित व्यापक प्रश्नों को उल्लेख श्वेत पत्रों में किया गया है मगर एक उभरती चिंता पर ध्यान नहीं दिया गया है। अर्थव्यवस्था की व्यापक आर्थिक स्थितियां कुछ चिंताएं पैदा कर रही हैं जिनमें सबसे प्रमुख है पर्याप्त संख्या में उत्पादक रोजगार सृजन की चुनौती। तकनीकी बदलाव इस चुनौती को और भी गंभीर बना सकता है। इस संदर्भ में कल्याणकारी कार्यक्रमों के विस्तार के पक्ष में नीतिगत बदलाव आया है।
इनमें आय पूरक, निःशुल्क भोजन, निःशुल्क बिजली और परिवहन के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाएं भी शामिल हैं। हालांकि, इनमें से प्रत्येक पहल अपने आप में सराहनीय है मगर इनसे वित्तीय लागत जुड़ी हुई है। एक सवाल यह उठाया जा सकता था कि क्या ऐसी योजनाओं के पैमाने और संरचना के लिए कोई ढांचा तैयार किया जा सकता है या बनाया जाना चाहिए। व्यय के किसी भी प्रस्तावित पुनर्गठन में यह एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व हो सकता है।
(लेखिका राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान की निदेशक हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।)