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गंभीर होते हालात

Last Updated- December 11, 2022 | 8:52 PM IST

रूस द्वारा पड़ोसी देश यूक्रेन पर आक्रमण की छाया दुनिया भर के बाजार, निवेशक और आर्थिक नीति निर्माता महसूस कर रहे हैं लेकिन अगर यह संघर्ष लंबा चला तो भारत उन देशों में शुमार होगा जो आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। रुपया पहले ही रिकॉर्ड स्तर तक गिर चुका है और अब डॉलर के मुकाबले उसकी कीमत 77 रुपये के पास पहुंच गई है। अकेले सोमवार को ही रुपये की कीमत में करीब 1.1 फीसदी की गिरावट आई। अब रुपया 2022 में एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन वाली मुद्रा बन गया है। ऐसा तब हुआ जबकि भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये की गिरती कीमतों को थामने के तमाम उपाय अपनाए। शेयर बाजार में भी गिरावट का सिलसिला दिखा और सेंसेक्स 2.7 फीसदी गिरकर गत वर्ष मध्य के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ। कच्चे तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच चुकी है और आशंका है कि अगर जंग के हालात यूं ही बने रहे तो कुछ ही सप्ताह में यह 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल का स्तर भी छू सकता है। इन हालात में भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी को लेकर जतायी जा रही आशंकाओं को भी समझा जा सकता है।
जिंस कीमतों में इजाफा होने से हमारी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढऩा लाजिमी है क्योंकि हम अपनी आवश्यकता का 85 फीसदी तेल आयात करते हैं। इस वर्ष केंद्रीय बजट के आकलन इस अनुमान पर आधारित हैं कि तेल कीमतें 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहेंगी इसलिए अब वे आंकड़े भी विश्वसनीय नहीं रह गए। वास्तविक वृद्धि भी अनुमान से कमजोर रहेगी और भले ही सरकारी व्यय में कोई खास बदलाव न आये लेकिन सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में राजकोषीय घाटे का प्रबंधन भी मुश्किल होगा। परंतु इन सबसे बढ़कर सरकार को ईंधन की बढ़ी हुई लागत को वहन करना होगा जिससे उसका व्यय बढ़ेगा। इस बीच बाजारों की हालत बता रही है कि उसकी प्राप्तियां दबाव में रहेंगी। उदाहरण के लिए भारतीय जीवन बीमा निगम का विनिवेश टलता जा रहा है। महामारी के दौर में अनिश्चित राजकोषीय स्थिति और भी खराब नजर आने लगती है।
इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक के सामने कमजोर रुपये की चुनौती है। केंद्र की ओर से वृद्धि का समर्थन करने तथा भारी मात्रा में सरकारी प्रपत्र की बिक्री का प्रबंधन करने का दबाव बढ़ता ही जाएगा। परंतु सोमवार को 10 वर्ष के सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल सात आधार अंक बढ़कर 6.89 फीसदी के करीब पहुंच गया। अभी भी इसमें इजाफा होने की गुंजाइश है और उच्च दरें कर्ज के प्रबंधन को कठिन बनाएंगी। इस बीच न केवल कच्चे तेल की कीमतें बल्कि खाद्य तेल की कीमतें भी मुद्रास्फीति को बढ़ावा देंगी। ये कीमतें पहले ही रिजर्व बैंक के सहजता के दायरे से ऊपर निकल चुकी हैं। सूरजमुखी के तेल की कीमतें बढ़ चुकी हैं और इनमें और अधिक इजाफा होने की संभावना है। ऐसा इसलिए कि दुनिया भर में सूरजमुखी के तेल के कुल कारोबार में यूक्रेन और रूस की हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी है। आपूर्ति को ऐसे झटके के मामले में केंद्रीय बैंक कुछ खास नहीं कर पाएगा और वृद्धि में ठहराव तथा उच्च मुद्रास्फीति की स्थिति को टालना मुश्किल होगा। नये उभरते हालात आरबीआई के लिए नीतिगत चयन की मुश्किल बढ़ाएंगे। सरकार को सन 2012-2013 जैसी विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए जब उच्च जिंस कीमतों और कमजोर वृद्धि ने रुपये, मुद्रास्फीति, वृद्धि और बाह्य खाते को एक साथ प्रभावित किया था। ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि नीतिगत स्थिरता के साथ तूफान से निजात पायी जाए।

First Published - March 7, 2022 | 11:06 PM IST

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