गत सप्ताह केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में क्रमश: 5 रुपये और 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती कर दी। इसे दीवाली के दिन लागू किया गया और राजनीतिक रूप से इसे देश को त्योहार के तोहफे के रूप में प्रचारित किया गया। केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने कहा कि इससे खपत बढ़ेगी। यह भी कि रबी सत्र में डीजल का इस्तेमाल करने वाले खेतों को मदद मिलेगी और कमजोर मांग के बीच यह कटौती वृद्धि को गति प्रदान करेगी। आशा थी कि समेकित मांग में तेजी से खपत में सुधार होगा और न केवल ईंधन खपत में सुधार होगा बल्कि सरकारी प्राप्तियों में आने वाली कमी का प्रभाव भी कम होगा। केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थों के उत्पाद शुल्क में कटौती के बाद कई राज्यों ने ईंधन पर लगने वाले मूल्यवद्र्धित कर में भी कटौती कर दी। इनमें से ज्यादातर राज्य सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित हैं। अब पेट्रोल पंपों पर तेल की ऊंची कीमतों की जिम्मेदारी को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है।
मनमाने कराधान के जरिये पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर यह राजनीति खतरनाक है। सरकारी तेल विपणन कंपनियों द्वारा वसूली जाने वाली ईंधन कीमतों पर से नियंत्रण खत्म करने के पीछे भी कारण यही था कि तेल कीमतों और उससे जुड़ी राजनीति को समाप्त किया जाए। यही वजह है कि पेट्रोल पंप पर तेल की कीमतों का बड़ा हिस्सा अब करों से निर्धारित होता है जिसमें आधारभूत उत्पाद शुल्क, विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, सड़क और अधोसंरचना उपकर और कृषि उपकर शामिल हैं। बहरहाल, देश एक बार फिर ऐसी स्थिति में वापस पहुंच चुका है जहां ईंधन कीमतें राजनीति से संचालित होती हैं। इस व्यवस्था के बजाय कहीं अधिक पारदर्शी तरीका अपनाने की जरूरत है। यह बात इसलिए सही है क्योंकि ईंधन कर का मौजूदा स्तर न केवल राजकोषीय प्रबंधन की दृष्टि से समझदारी भरा है बल्कि देश के कार्बन उत्सर्जन की दृष्टि से भी यह महत्त्वपूर्ण है तथा आवागमन के अधिक स्थायी तरीकों की तलाश करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
केंद्र और राज्य सरकारों को मौजूदा ध्वस्त ईंधन कर व्यवस्था से परे जाकर ज्यादा अधिक व्यापक तथा कम मनमाना ढांचा अपनाने पर विचार करना चाहिए। मौजूदा ईंधन कर के बोझ के एक हिस्से को वस्तु एवं सेवा कर के दायरे में लाया जा सकता है जबकि शेष को पारदर्शी कार्बन कर में ढाला जा सकता है जिसे केंद्र और राज्य साझा करें या जो जलवायु संवेदनशील बुनियादी ढांचे की ओर लक्षित हो यानी कृषि या आवागमन आदि। यह आधुनिक व्यवस्था जो देश को 2030 के जलवायु परिवर्तन लक्ष्य हासिल करने में मदद करे और साथ ही यह सुनिश्चित करे कि औसत भारतीय भी यह समझें कि ईंधन कर राजनीतिक चयन का मामला नहीं हैं।
ज्यादा व्यापक होकर बात करें तो सरकारी बजट में आने वाली कमी को पूरा करने के लिए ईंधन करों पर निर्भरता समाप्त होनी चाहिए। उपकर और उत्पाद शुल्क में एक के बाद एक कई बार इजाफा करके सरकार ने वर्ष 2019-20 में ईंधन पर कर से 2.2 लाख करोड़ रुपये जुटाए जबकि 2021-22 में यह राशि और बढ़कर 3.7 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई। इसमें ज्यादातर हिस्सा केंद्र सरकार के खाते में गया। उच्च कर को देश के पर्यावरण के अनुकूल बदलाव को अपनाने की दृष्टि से उचित ठहराया जाना चाहिए, उसे सरकारों के अपव्यय की पूर्ति का जरिया नहीं बनाना चाहिए। यही कारण है कि समस्त कर व्यवस्था को मजबूत बनाने की आवश्यकता है ताकि ईंधन करों पर निर्भरता कम की जा सके, खासकर उपकरों पर। सरकारी व्यय की भरपाई के लिए ईंधन करों पर अधिक निर्भरता सरकार की वित्तीय स्थिति को राजनीतिक दबाव की दृष्टि से संवेदनशील बनाती है और यह बात दीर्घावधि में राजकोष के लिए दिक्कतदेह हो सकती है।